डॉ. सुनील “हरिचाँद ठाकुर-गुरुचाँद ठाकुर सम्मान” से सम्मानित

डॉ. सुनील “हरिचाँद ठाकुर-गुरुचाँद ठाकुर सम्मान” से सम्मानित

 वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ को दलित-आदिवासी एवं पिछड़े समाज के लिए किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए ‘‘हरिचाँद ठाकुर-गुरुचाँद ठाकुर सम्मान’’ से सम्मानित किया गया । हावड़ा, पश्चिम बंगाल स्थित रामगोपाल मंच सभागार में मूलनिवासी कर्मचारी कल्याण महासंघ (मक्कम) की प. बंगाल ईकाई, बाबासाहेब डॉ. बी.आर.अम्बेडकर मिशन, हुगली, भारतीय दलित साहित्यकार मंच (प.बं.) तथा पश्चिम बंगाल सफाई कर्मचारी एकता संघ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक भव्य अभिनंदन समारोह में डॉ सुनील को यह सम्मान प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम का कुशल संचालन लेखक व कवि रामजीत राम ने किया। इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित भंते रखित श्रमण, समाजसेवी शारदा प्रसाद, वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘पैरोकार’ पत्रिका के संपादक अनवर हुसैन, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के राजभाषा अधिकारी डॉ. ब्रजेश कुमार यादव, महाराजा श्रीश चंद्र कालेज के राजनीतिशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ प्रेम बहादुर मांझी, सहायक प्रोफ़ेसर एवं युवा आलोचक डॉ. कार्तिक चौधरी, आईसेक्ट विश्वविद्यालय, हजारीबाग के मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ. ललित कुमार, मक्कम के राज्य सचिव एवं शिक्षक-एक्टिविस्ट विनोद कुमार राम, कोषाध्यक्ष शशिकांत प्रसाद, मूलनिवासी संघ के अध्यक्ष विष्णु पाल, रामचंद राम, रामवचन यादव, राजेश कुशवाहा, अम्बेडकर मिशन (प.बं.) के अध्यक्ष ई. वीरा. राजू, धर्मराज राम, गौतम पासवान तथा शंकर सिंह आदि गणमान्य वक्ताओं ने डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ. सुमन की सक्रियता एवं मार्गदर्शन से बंगाल के बहुजन समाज को वैचारिक ऊर्जा व ताकत मिली। इस अवसर पर शॉल भेंट करके डॉ. सुनील की पत्नी श्रीमती पूजा का भी स्वागत किया गया।
अपने संबोधन में डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ ने आयोजकों का धन्यवाद देते हुए कहा कि बंगाल के दो महापुरुषों के नाम पर स्थापित इस अमूल्य सम्मान को हासिल करना मेरे लिए बहुत ही गौरव की बात है।

उल्लेखनीय है कि डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ मूलतः अरेराज, पूर्वी चंपारण, बिहार के निवासी हैं। ये पिछले पाँच वर्षों से वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र प्रभारी के रूप में अपना योगदान दे रहे थे और अभी ये मुख्य परिसर वर्धा में कार्यरत हैं।






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