आरएसएस मुखौटे खड़ा कर राजनीति को करता है नियंत्रित : हरिवंश


लोकतांत्रिक देश में शासन-व्यवस्था में पारदर्शिता बरतनी होती है। यदि किसी भी सरकार को कोई नेपथ्य से नियंत्रित करता हो, तो वह स्वस्थ परंपरा नहीं है। केंद्र ने बेशक बिहार के साथ भेदभाव किया हो, लेकिन नीतीश कुमार विकास का पहिया बेधड़क चला रहे हैं। जदयू से राज्य सभा सांसद और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश से कई मुद्दों पर सुभाष चंद्र  ने बात की। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश : 
केंद्र की मोदी सरकार अपना दो वर्ष पूरा कर रही है। इसे किस रूप में देखते हैं? 
-मोदी सरकार को एक अलग नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। मेरी दृष्टि मैं यह पहली शुद्ध गैर-कांग्रेसी भाजपाई सरकार है। इससे पहले अटल जी की सरकार थी, तो वह एनडीए की सरकार थी। उसमें अलग-अलग दलों के विभिन्न विचारधारा के लोग थे। उससे पहले भी जनता पार्टी की सरकार बनी थी, मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री थे। लेकिन, ये लोग मूलत: कांग्रेस से ही थे। इस संदर्भ में यह पहली गैर-कांगे्रसी भाजपाई सरकार है। इस देश के एक वर्ग का सपना था कि इस देश में गैर-कांग्रेसी शासन  व्यवस्था चाहिए। व्यवस्थागत परिर्वतन के लिए विभिन्न क्षेत्रों में वैकल्पिक नीति होनी चाहिए। मसलन, अर्थ, विदेश, वित्त, गृह वगैरह क्षेत्रों में देशज नीतियां। इन कसौटियों पर यदि इस सरकार को आंकते हैं, तो यह सरकार कोई अलग चिन्ह छोड़ नहीं सकी। आप दीनदयाल उपाध्याय जी की बात करते हैं, तो पहले उनको पढ़िए। वे वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति की बात करते हैं। अर्थशास्त्र के बारे में उनका ‘मानव एकात्मवाद’ का अलग सिद्धांत है। जो कांग्रेस संस्कृति को बदलना चाहते थे, उनका तर्क रहा है कि कांग्रेस  ने अंगे्रजों की नीति पर चलते हुए देश पर शासन किया। भाजपा मानती थी कि इसके विकल्प के रूप में देशी और देशज नीति के तहत सरकार चलाई जाए। देशज नीति के तहत तमाम क्षेत्रों में कार्य किया जाएगा, ये बात यह सरकार भी सत्ता में आने से पहले कहती थी। लेकिन, जब सत्ता में आई, तो ऐसा कोई भी काम इनका दिखा नहीं। यह उसी पुरानी कांग्रेसी रास्ते से शासन चला रहे हैं।
दो साल पहले पूरे देश में नारा दिया गया था ‘कांग्रेस मुक्त’ का। अब बिहार से नया नारा चला है ‘संघ मुक्त’ का। कांग्रेस तो राजनीतिक दल है। संघ स्वयं को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कहती है। आखिर राजनेता को संघ मुक्त कहने की नौबत क्यों आई? 
-कांग्रेस मुक्त की बात जिन लोगों ने की, अपनी अवधारणा तो वही बेहतर तरीके से बता सकते हैं। तब की स्थिति में जो कांग्रेस मुक्त की बात हुई, वह 2 जी, कोयला घोटाला या अन्य जो कांग्रेस के कुशासन के जो लक्षण देश में दिखाई पड़ रहे थे, उनसे मुक्ति के लिए ही कांग्रेस मुक्त की बात कही गई होगी। संघ मुक्त की अवधारणा की बात चूंकि बिहार से आई है और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कही है, इसलिए इसके बारे में मैं जरूर कह सकता हूं।
राजनीति में खासतौर से संसदीय राजनीति में आप कोई नीति तय करते हैं, पब्लिक एजेंडा तय करते हैं, तो आपकी कोई एकाउंटबिलिटी होनी चाहिए। आरएसएस नेपथ्य में रह करके अलग-अलग मुखौटों को खड़ा करके राजनीति को नियंत्रित करता है। यानि बात आरएसएस की पूरी हो पर उसकी एकाउंटबिलिटी आरएसएस की नहीं है। भाजपा का शासन सूत्र आरएसएस के हाथ में है। यदि आरएसएस गैर-राजनीतिक संगठन है, तो भाजपा शासित राज्यों के प्रशासन में यह दखल क्यों देता है? तथाकथित क्रांतिकारी परिवर्तन की बात क्यों करता है? आरएसएस की विचारधारा राजनीति में भाजपा के माध्यम से स्पष्ट होती है। गौर करें, ये चुनाव नहीं लड़ते। जनता के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेह नहीं है। लेकिन, चुनाव लड़ने वाले संगठनों का नियंत्रण इनके हाथ में है। नेपथ्य में रह कर ये शासन की बात करेंगे। नीति परिवर्तन की बात करेंगे। उन्हें प्रभावित करेंगे। ऐसा संगठन जो जनता के बीच लोकतांत्रिक चौहद्दी में नहीं है और तमाम बदलाव की बात करे, यह तो जनतंत्र की भावना के खिलाफ है। कांग्रेस ने गलती की तो, सबने कहा हटाओ। ये गलती भी करते हैं, सत्ता में भी दखल देते हैं, लेकिन कोई जिम्मेदारी इनकी नहीं, आखिर यह कैसे हो सकता है? लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि इस तरह के संगठन खत्म हों। कमजोर हों।
लोकतंत्र की बात करें, तो नीतीश कुमार की सबसे बड़ी पूंजी उनकी छवि है। व्यक्तिगत रूप से वे वंशवाद के पोषक नहीं है। तो फिर एक ओर मुख्यमंत्री और दूसरी ओर जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष। कहीं उन्होंने पार्टी को हाईजैक तो नहीं कर लिया है?
-यह बात समझ लीजिए कि वे लोकतांत्रिक तरीके से अध्यक्ष चुने गए हैं। खुद शरद यादव जी , जो तीन बार  जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं, उन्होंने नीतीश कुमार का नाम प्रस्तावित किया। किसी भी दल में जो लोकतांत्रिक पद्धति होती है, उसका पूरा पालन किया गया है। जदयू एक ऐसा राजनीतिक दल है, जो अंदरुनी लोकतंत्र पर खासा ध्यान देता है।  नीतीश कुमार की खूबी आपने भी कही है। उनके परिवार से कोई उनका राजनीतिक वारिस नहीं है। दूसरी ओर आप भाजपा को देख लें। कई राज्यों में भाजपा के बड़े नेताओं के बेटे उनकी राजनीति को संभाल रहे हैं। नीतीश कुमार केवल शब्दों में सबको साथ लेने की बात नहीं करते, बल्कि सीएम रहते हुए उन्होंने काम करके इसे चरितार्थ करके दिखाया है।
एक भी ऐसा राज्य बता दें, जो भाजपा शासित राज्य हो, लोगों ने उसे पहले बीमारु कहा हो, और वह विकास के पथ पर इस तेजी से आगे बढ़ा हो। नहीं मिलेगा। बिहार को पहले बीमारु राज्य कहा जाता था, नीतीश जी ने विकास करके दिखाया है। विकास के नए प्रतिमान गढ़े हैं। देश और विदेश के सामने बिहार का विकास मॉडल दिया है। बीते 10 वर्षों से राज्य में लगातार 10 फीसदी से अधिक विकास दर और इस साल 17 प्रतिशत का ग्रोथ रेट।  मैं आपको बता दूं कि साल 2013-14 में एक रिपोर्ट आई कि काम-काज व्यवसाय की आजादी से कौन सा राज्य कहां है । उस रिपोर्ट को बनाने वाले थे – स्वामीनाथन अंकश्वरेलया, लवलीश भंडारी, विवेक डेबराय – जाने माने अर्थशास्त्री (अभी नीति आयोग के सदस्य हैं)। इन लोगों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बिहार में 2005 के बाद नीतीश कुमार ने वह काम करके दिखा दिया, जो किसी और राज्य में नहीं हुआ। विकास के नए द्वार खोल दिए।
नीतीश कुमार ने अपने पहले और दूसरे कार्यकाल में पंचायत स्तर तक शराब पहुंचा दी। अब तीसरे कार्यकाल में पूर्ण शराबबंदी की बात करने लगे। पूर्ण शराबबंदी कर दी गई। अब विश्लेषक शराब और राजस्व के नुकसान की बात कर रहे हैं। ऐसा विरोधाभास क्यों? कहा जा रहा है कि राजस्व की कमी से अब विकास रूकेगा?
-मैं पहले यह स्पष्ट कर दूं कि जो लोग ऐसा बोलते हैं, सोचते हैं, उन्हें वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं है। जब नीतीश जी ने बिहार में सत्ता संभाली, उस समय शराब से एक्साइज से क्या आमद थी? बिहार और झारखंड जब संयुक्त था, जब शायद तीन सौ करोड़ रुपया था। नीतीश कुमार की आदत है कि वह गर्वनेंस के मुद्दे पर गहराई से सोचते हैं, पड़ताल करते हैं, तब किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। बिहार में शराब की खपत बढ़ी थी, लेकिन उससे  उस अनुपात से राजस्व नहीं आता था। मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार  ने इसके लिए बोर्ड बनाए और देखा कि कितना राजस्व आ रहा है? लेकिन, जहां से भी महिलाएं शिकायत करती थी, शराबबंदी की बात उस दौर में भी नीतीश कुमार ने की। महिलाओं को समर्थ्रन दिया। पिछले वर्ष चुनावों से पहले महिलाओं की मांग पर एक सभा में सार्वजनिक वादा किया कि इस बार हम सत्ता में आएंगे, तो पूर्ण शराबबंदी करेंगे, राजस्व का कितना भी नुकसान हो, हम उठाएंगे, यह कोई विलक्षण आदमी ही कर सकता है। उन्होंने साहसिक निर्णय लिया। साल-दो साल बाद देखिएगा, लोग जो पैसा शराब पर खर्च करते थे, वह स्वास्थ्य पर करेंगे। बच्चों की शिक्षा पर करेंगे। विकास तो होगा।
नीतीश कुमार को अभी से ही पीएम मैटेरियल कहा जाने लगा है। आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के मुकाबले वे कैसे खड़े होंगे?
-मोदी जी जिस तरह से राजनीति में आए। उनके पीछे जो संगठन की ताकत रही। भाजपा का बड़ा सांगठनिक ढांचा है। आरएसएस की शाखा है। कई बड़े आर्थिक घरानों की ताकत लगी रही। और इस सब के अलावा कांग्रेस ने जो देश के अंदर हालात पैदा कर दिए थे, उससे नरेंद्र मोदी का रास्ता बन गया।  जब ये सत्ता में आए, तो किए गए वादों का इन्होंने क्या किया? क्या 15 लाख लोगों के खाते में आए? क्या एक बिलकुल अलग और स्पष्ट प्रशासन देश को मिला? जो-जो वादे इन्होंने किए थे, ये पूरा नहीं कर रहे हैं। इस कारण धीरे-धीरे देश का मोह भंग हो रहा है इनके प्रति। इस मोहभंग की स्थिति में नीतीश् कुमार के रूप में एक आदमी दिखाई दे रहा है, जो काम करने में विश्वास करता है। इस तरह के व्यक्ति की ओर पूरा देश ताक रहा है।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन की बात हुई थी। कई पार्टियों की विलय की बात थी। लेकिन नहीं हुआ। ऐसे में कैसे मान लें कि नीतीश कुमार की स्वीकार्यता गैर-भाजपा दलों में बनेगी?
– लोकतांत्रिक संसदीय राजनीति में हालात चीजों को बदल देते हैं। सत्तर के दशक में भला कोई सोच सकता था कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी हराई जा सकती है? मोरारजी और चरण सिंह जैसे प्रधानमंत्री बनते हैं। बोफोर्स के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बनते हैं। गुजराल, देवगौड़ा सरीखे कई नाम हैं। हालात ऐसे बनेंगे कि नीतीश कुमार स्वीकार्य होंगे। क्यों शरद पवार नीतीश का नाम लेते हैं। क्यों अजित सिंह, बाबू लाल मरांडी नीतीश की बात करते हैं। माहौल में ताकत होती हैं ऐसे गठबंधनों और दलों को जन्म देने की।
बिहार में पलायन का दर्द आज भी। बाहर का आदमी क्यों नहीं जाता है बिहार? न तो पढ़ने, न घूमने और न शिक्षा के लिए?
-बीते दस साल में बिहार जितना बदला है और विकास किया है, इस देश का शायद ही कोई राज्य इतना विकास किया हो। नीतीश जी के कार्यकाल में पंजाब में बिहार के मजदूर काम करने आए, इसके लिए होड़ मच गई। मजदूर पंजाब नहीं जाने लगे। बिहार में ही उन्हें रोजगार मिलने लगे, तो पंजाब में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए। लुभावने वादे किए गए। आज की तारीख में बिहार में कई संस्थान खुले हैं। आईआईटी, मैनेजमेंट। बच्चे आ रहे हैं पढ़ रहे हैं। दो-दो सेंट्रल यूनिवर्सिटी खुले। बिजली के उत्पादन में बिहार ने जिस तरह से अपना स्थान बनाया है, वह विलक्षण है। ऐसे ही 17 प्रतिशत ग्रोथ रेट नहीं हुआ। लड़कियों के साइकिल ने तो बिहार की तस्वीर बदल दी है। लेकिन याद रखिए, बिहार जैसे बड़े और जटिल राज्य में विकास करना आसान नहीं है। केंद्र ने शुरु से ही इसके साथ ही भेदभाव किया है। कोई भी सृजन और बदलाव का कार्य तुरंत नहीं होता है। with thankx शुक्लपक्ष





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