पूर्वी चंपारण में एक ऐसा गांव, जहां हर घर के लोग है सेना में

बिहार कथा (पूर्वी चम्पारण )
पूर्वी चंपारण. विविधताओं से भरे भारत-नेपाल के सीमावर्ती पूर्वी चंपारण जिले के बंधु बरवा गांव में पहुंचते ही राष्ट्रीयता का भाव हिलोरे मारने लगता है। 3200 की आबादी वाले इस गांव के हर घर में सैनिक पैदा होता है। कोई देश की सीमा पर होता है तो गांव की पगडंडी पर सेना में जाने की कसरत करता है। गांव के दर्जनों लोग सेना में काम कर चुके हैं। करीब चार दर्जन से अधिक युवा सेना की अलग-अलग इकाइयों में काम कर रहे हैं। यहां के युवक देश के लिए शहादत भी दे चुके हैं।
थल सेना के जवान संतोष कुमार, दिग्विजय सिंह, सर्वे कुमार सिंह, संजीव कुमार सिंह के अलावा वायुसेना में जवान नवीन कुमार सिंह और नौसेना में कार्यरत अविनाश कुमार चौबे आदि का कहना है कि देश सेवा से बढ़कर कोई सेवा नहीं है।
इनका कहना है कि गांव के आलोक पांडेय मार्च 2000 में कारगिल में देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। गांव के लोगों के बीच आलोक आज भी एक हीरो के रूप में स्थापित हैं। लोग सुबह के साथ इस गांव के वीरों की सलामती की दुआ मांगते हैं। शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देते हैं।
बचपन से ही राष्ट्रभक्ति का भाव
गांव की पगडंडी पर दौड़ लगाने वाले विशाल सिंह, पिंटू सिंह, मंटू, विनय, मनीष और बबलू का कहना है कि हमारे माता-पिता ने बचपन से ही राष्ट्रभक्ति का भाव जगाया है। हमें सेना में शामिल होकर राष्ट्र की सेवा करनी है।
स्वतंत्रता संग्राम के वक्त से ही राष्ट्रभक्ति

यहां के रहने वाले और भारत सरकार के कृषि कल्याण मंत्रालय के ङ्क्षहदी सलाहकार समिति के सदस्य अर्जुन सिंह भारतीय बताते हैं कि गांव से हर साल आधा दर्जन युवा सेना में जाते हैं। हमारे गांव के कण-कण में स्वाधीनता संग्राम के वक्त से ही देशभक्ति भरी है। यहीं के युवा स्व. राधा पांडेय ने 1942 के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी। पहली गिरफ्तारी उनकी हुई थी। स्वतंत्र भारत में वे रक्सौल विधानसभा के पहले विधायक बने थे। आज युवा पीढ़ी राष्ट्र सेवा की मशाल को आगे बढ़ा रही है।






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