मणिपुर : शासन सरकार का, ऑर्डर अलगावादियों का

(नोट : यह ग्राउंड रिपोर्टिंग संजय स्वदेश ने 2009 में मणिपुर में इंफाल, ईस्ट इम्फाल और सेनापति के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जा कर की थी. )

शासन सरकार का, ऑर्डर अलगावादियों का

मणिपुर से लौटकर संजय स्वदेश  (दिसंबर, 2009)
देश में लोकतंत्र है। हर राज्य की लोकतांत्रिक सरकार है, पर देश के पूर्वोत्तर राज्य विशेषकर मणिपुर राज्य की लोकतांत्रिक सरकार वहां की अलगाववादी तत्वों के सामने बेबस है। मजबूरी में उग्रवादी संगठनों के साथ जियो और जीने दो की नीति के साथ लोकतांत्रिक सरकार चल रही है। स्थितियों से स्पष्ट लगता है कि अलगाववादियों के साथ युद्ध विराम के बाद भी उनकी समानांतर सरकार चल रही है।

प्रतिबंध और युद्ध विराम के बाद भी यूजी (अंडरग्राऊंड मिलिटेंट) के विभिन्न संगठन खुलेआम वसूली करते हैं। निजी और सरकारी क्षेत्र में कार्यरत हर व्यक्ति को उसके वेतन के अनुसार एक सालाना रकम यूजी के संगठनों को देना पड़ता है। यहां तक की इंफाल में व्यवसाय कर रहे, गैर मणिपुरी

मणिपुर में एक बंद पुस्तकालय

लोगों से भी वसूली होती है। जिन संगठनों के साथ सरकार ने समझौता कर रखा है, उसके सदस्य दूसरे संगठन के नाम पर पैसे उगाही करते हैं। जहां नगालैंड में नगा जनजाति बहुमत में हैं वहीं मणिपुर में नगा अल्पसंख्य हैं। जिन क्षेत्रों में नगा जनजाति ज्यादा है, वहां बसने वाली दूसरी जनजाति के लोग नगा संगठनों के सामने बेबस है। वहीं मैतेयी और कुकी जनजाति जहां अधिक संख्या में हैं, उनके संगठन नगा लोगों से वसूली करते हैं। नगा,कुकी और मैतेयी के आपसी वर्चस्व के त्रिकोणिय संघर्ष में राज्य का संपूर्ण विकास थम सा गया है।

सेनापति जिले का ख्वाई तांगुल नगाओं की बस्ती है। यहां के मुखिया (गामवुडा) आखुई के बेटे को यूजी के एक संगठन ने गत 16 नवंबर को अपहरण कर लिया था। 3 लाख की

स्थानीय नागरिक

फिरौती के बाद उसे छोड़ा गया। ऐसी घटनाएं यहां आए दिन होती है। पुलिस में मामला बहुत कम जाता है। आखुई कहते हैं कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने से क्या फायदा। यहां पुलिसकर्मी स्वयं साल में एक बार अपने वेतन से एक रकम यूजी संगठनों को देते हैं। पूर्वी इंफाल में तैनात सेना के एक अधिकारी ने बताया कि यूजी द्वारा अपहरण या दूसरी तरह की घटनाओं में पुलिस हस्तक्षेप नहीं करती है। जब कोई यूजी के खिलाफ किसी तरह की शिकायत करता है तो पुलिस शिकायकर्ता को सेना पास जाने की सलाह देती है। स्थिति यह है कि यहां आए दिन मोबाइल कंपनियों से यूजी संगठन पैसे वसूलते हैं। ऐसा कई बार होता है कि जब मोबाइल कपंनियों को रकम देने के लिए धमकाया जाता है, तो वे दो-चार दिन तक अपना नेटवर्क बंद कर देते हैं। पूर्वी इंफाल में तैनात 19 असम राइफल की पोस्ट के पास ही

असम रायफल की एक पोस्ट

भारत संचार निगम का दफ्तर है, पर दफ्तर पूरी तरह से बंद है। स्थानीय लोगों के टेलीफोन कनेक्शन कटे हुए हैं। पोस्ट के पीछे ही एक बीएसएनएल का टावर लग रहा है।

बीएसएनएल का टावर

लेकिन ठेकेदार को जब रकम के लिए एक यूजी संगठन ने धमकाया तो काम बंद हो गया। जब कोई एक संगठन किसी से वसूली करता है और इसकी जानकारी जब दूसरे संगठनों को होती है तो वे भी वसूली के लिए धमका जाते हैं। यहीं कारण है कि यहां बाहरी लोग व्यवसाय के लिए आने से डरते हैं। जो पुराने व्यवसायी हैं, वे डरे-सहमे अपना धंधा चला रहे हैं। सीमा सड़क संगठन के लिए ठेके पर माल आपूर्ति करने पहली बार दिल्ली से इंफाल आए वाई प्रसाद और उनके एक साथी ने बताया कि जब उनकी कंपनी को यह ठेका मिला, तो किसी ने यहां आने तक की हिम्मत नहीं दिखाई। माल आपूर्ति के लिए उन्होंनें हामी भरी। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने यहां आने के लिए कंपनी को हामी भरी थी, तब मणिपुर के हालत के बारे में पता नहीं था। दिमापुर आते ही स्थिति की जानकारी मिली। इसलिए इंफाल में डरे-सहमे हैं। किसी ने उन्हें समझाया कि वे किसी को न बताये कि ठेकेदार कंपनी की माल आपूर्ति के लिए इंफाल आए हैं। अन्यथा उनसे वसूली की मांग आ सकती है।

तीन माह तक बंद रहे शिक्षण संस्थान
जिस मणिपुर के सैकड़ों बच्चे राजधानी दिल्ली और देश के दूसरे महानगरों में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, उसी मणिपुर में अक्सर स्कूल तीन तीन महीने के बंद रहते हैं.

मणिपुर के एक बंद स्कूल

स्कूल कॉलेज बंद करने वाले कोई और नहीं यहां के अलगाववादी (यूजी) हैं। शहरी क्षेत्र विशेषकर राजधानी इंफाल में जहां पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था अच्छी है, वहां इक्का-दुक्का स्कूल खुल रहने की सूचना मिली। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में में तो यूजी की धमकी का इतना खौफ है कि कोई स्कूल प्रबंधक स्कूल खोलने का साहस तक नहीं कर रहा है। कुछ स्कूलों में बच्चों को बिना स्कूल ड्रेस में चोरी-छिपे खेलने के बहाने पढ़ाया जा रहा है।

मणिपुर में स्थानीय बच्चे

पिछले दिनों पूर्वी इंफाल के एक गांव में यूजी की धमकी के विरुद्ध जब एक स्कूल ने बच्चों को पढ़ाने की हिम्मत दिखाई तो उसे जला दिया गया। पूर्वी इंफाल के टाइगर कैंप गांव में रहने वाले लिटिल रोज स्कूल के प्रधानाध्यापक पोमिंग थॉंग ने बताया कि उनके स्कूल में करीब 350 विद्यार्थी हैं। गत तीन माह से स्कूल नहीं खुला। अब पता नहीं बोर्ड परीक्षा का क्या होगा?

लिटिल रोज स्कूल के प्रधानाध्यापक पोमिंग थॉंग

हालांकि अभिभावकों से स्कूल बंद होने के बाद भी पहले माह का फीस ले लिया गया। लेकिन शिक्षकों को वेतन नहीं दिया गया। उनका कहना है कि जब अभिभावकों से दूसरे महीने की फीस नहीं मिली तो शिक्षकों से वेतन कैसे दें। लिहाजा, निजी स्कूलों के कई शिक्षक चोरी-छिपे ट्यूशन पढ़ाकर गुजारे लायक धन जुटाने की जुगत में रहे। इसी गांव में निवास करने वाले एक सेवानिवृत सैनिक थॉंग जॉम ने बताया कि बच्चों का भविष्य चौपट हो रहा है। स्कूल जलाने की घटना के बाद चोरी-छिपे ट्यूशन पढ़ाने में भी कई अभिभावक जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। बच्चों का समय खेल-कूद में निकल रहा है। मजबूरी और बेबसीं के सामने हम लाचार हैं।

यूजियों के चंगुल में मीरा पाइजी
उपरी पहाड़ी क्षेत्रों पर भांग की खेती होती है। इस पर अधिकतर नगाओं का अधिकार है। भांग की खेती करने वाले एक नगा किसान ने बताया कि छोटी-सी जगह पर पांच छह करोड़ सलाना की आमदनी हो जाती है। लेकिन इसके लिए विभिन्न संगठनों के साथ सामंजस्य भी रखना पड़ता है।

पूर्वी इंफाल के मीरा पाइजी संगठन की सचिव चोग बाई एक आर्मी अफसर से बात करती हुई

मणिपुर में शराब पर पाबंदी है। पर चावल से बनी शराब यहां खूब मिलती है। इंफाल स्थित होटल थांबा के एक असमी वेटर ने बताया कि वह पैसे देने पर अंगरेजी शराब की भी व्यवस्था कर सकता है। मणिपुर में पुरुषों में शराब की लत को रोकने के मीरा पाइजी नाम का महिलाओं का एक संगठन बनाया गया। कुछ समय तक तो यह संगठन अपने उद्देश्यों के लेकर जोर-शोर से सक्रिय रहा। पर धीरे-धीरे संगठन का जोश-खरोश शांत हो चुका है। कई लोगों ने बताया कि अब मीरा पाइजी भी यूजियों से मिलकर काम करती है। एक तरह से कहें तो महिलाओं का यह संगठन पूरी तरह से यूजियों के नियंत्रण में हैं।

नशे की खेती

कई महिलाएं अब यूजियों के लिए मुखबीर का काम करती है। वहीं सेना के अधिकारी कहते हैं कि यूजियों ने अपने संरक्षण के लिए मीरा पाइजी का उपयोग करना शुरू कर दिया है। जब भी कोई यूजी पकड़ा जाता है। उनकी शह पर मीरा पाइजी पूरी तरह से विरोध में उतर जाती है। सेना के वाहन के सामने लेट जाती हैं और कहती हैं कि वह निर्दोष और आम आदमी है।

एक दो स्थानीय महिलाओं ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र की कोई भी बस्ती हो, हर खुबसूरत युवतियों पर यूजी अपना अधिकार समझते हैं। वे कभी भी उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। उनका उपभोग कर उन्हें छोड़ देते हैं। यहां की महिलाओं में ज्यादा एचआईवी के प्रमाण पाने का एक कारण यह भी हो सकता है। पूर्वी इंफाल के मीरा पाइजी संगठन की सचिव चोग बाई ने बताया कि उसका पति सेना में जवान है। उन्हें हर साल दो हजार रूपये एक यूजी संगठन को देना पड़ता है। यह देना इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि जीना जरूरी है।

अधर में लटका बांध का कार्य
राज्य के सेनापति जिले के मफाऊ में भी अंसल कंपनी एक बड़ी बांध परियोजना पर कार्य कर रही है। बांध थोबल नदी से जोड़ कर बनाया जा रहा है। इसमें राज्य की सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग डैम बनाने में सहयोग कर रहा है। इस

जो डैम बनाना था उसकी गति सुस्त

परियोजना को शुरू हुए बीस साल हो चुके हैं। अभी तक बांध का 25 प्रतिशत कार्य भी पूरा नहीं हो पाया है। सरकार की तमाम सुरक्षा के बाद भी यह परियोजना अधर में है। नगा और कुकी समुदाय के संगठन बार-बार परियोजना में वसूली के लिए टांग अड़ा देते हैं। पैसे नहीं देने पर यहां काम करने वाल कर्मचारियों का अपहरण कर लिया जाता है। यहां तैनात असम राइफल के एक अधिकारी ने बताया कि बीच-बीच में जैसे ही ठेके की रकम ठेकेदार को मिलती है, यूजी उसके पास रूपये देने की मांग कर देते हैं। ठेके की मंजूरी की आधी रकम यूजी वसूल लेते हैं। इसलिए काम धीरे-धीरे चल रहा है। डैम पर कार्यरत इंजीनियर प्रेस से अधिकारिक रूप से तो दूर अनौचारिक चर्चा के लिए भी तैयार नहीं हुए।

90 करोड़ की परियोजना 2200 करोड़ की हो गई
पूर्वी इंफाल जिले में पेयजल की समस्या गंभीर है। पेयजल की स्थिति को देखते हुए मणिपुर सरकार ने 1996 में इस क्षेत्र में 90 करोड़ रूपये की लागत से एक बांध बनाने की परियोजना शुरू की थी। तेरह साल हो गए। बांध का दस प्रतिशत कार्य भी पूरा नहीं हो पाया। डैम के सिविल अभियांत्रिकी के उप प्रबंधक डी. सरकार ने बताया कि काम में न केवल देरी हुई है, बल्कि इसका बजट 90 करोड़ से बढ़ कर 2200 करोड़ रुपये का हो गया। कब पूरा होगा कुछ कहा नहीं जा सकता है। अभी तक बांध का ड्राईंग भी नहीं मिल पाया है। यह डैम केवल पानी जमा करने के लिए होगा। सरकार ने बताया कि जब बांध का कार्य शुरू हुआ तो उग्रवादियों (यूजी) के एक समूह ने यहां पास ही बने कर्मचारियों के क्वार्टर को जला दिया। काम रूक गया। फिर सरकार ने मणिपुर रिजर्व पुलिस बल को तैनात कर वर्ष 2002 में कार्य शुरू किया। बांध में काम करने वाले स्थानीय मजदूर है। मजदूरों को हर दिन 130 रूपये की दर से मजदूरी मिलती है।

डैम पर तैनात इंजीनियर सैन्य अधिकारी से बात करते हुए0

दो ठेकेदार मणिपुर के हैं और एक ठेकेदार बिहार के सुमन कुमार चांद हैं। जैसे-जैसे ठेकेदार यूजी को अनुदान देते है कार्य की गति बढ़ती जाती है।
जल संरक्षण के लिए सचेत मणिपुरी
मणिपुरी गांवों के भ्रमण से लगता है कि यहां के ग्रामीण लोग जल का मूल्य अच्छी तरह से जानते हैं। साफ-सफाई के छोटे-मोटे कार्यों के लिए ये बरसात के पानी पर निर्भर है। अनेक स्थानीय निवासियों ने घर के सामने गढ्ढा खोदकर छोटा-सा तलाब बना लिया है। इसमें बरसात का पानी जमा होता है।

स्थानीय बस स्टैंड

छोटे से तलाब में किनारे से पानी की ओर तक दो-तीन फुट की बांस की पुलिया बना ली है। उस पर बैठ कर तलाब के पानी में कपड़े-बर्तन आदि धोने का काम करते हैं। कुछ ग्रामीण इस छोटी से तलाब में ही बत्तख पाल लेते हैं। इससे उन्हें न केवल अंडा मिलता है, बल्कि इसका मांस भी प्राप्त करते हैं। इस तरह के अनउपयोगी जगह को उपयोग करने का एक और उदाहरण इंफाल में मिला। देश के दूसरे शहरों में जहां फुटपाथ पर छोटे-मोटे दुकान सजे होते हैं। वैसा ही नजारा यहां भी है। लेकिन फटपाथ पर ज्यादातर राहगीर ही चलते हैं। फुटपाथ से पहले नाला गुजरता है। फुटपाथी दुकानदार इसी नाले पर बांस की चाचर बिछाकर उस पर दुकान सजाये दिखे। फुटपाथ पर चलने के लिए राहगिरों के लिए पर्याप्त जगह मिल जाती है।

जापान के सहयोग से निर्मित झोपड़े अलगावादियों के कब्जे में
मणिपुर के अधिकतर पहाड़ों के तल में आदिवासियों के पुनर्वास के लिए जापान के सहयोग से खूबसूरत झोपड़े बनाए गए थे। ये झोपड़े आज भी है।

जापान के सहयोग से बने झोपड़े अलगाववादियों के कब्जे में

सड़कों से करीब 200 से 300 मीटर की दूरी पर ये झोपड़े देखने में बेहद खूबसूरत लगते हैं। पर जिस मकसद से ये झोपड़े बनाए गए थे,वह पूरा नहीं हो पाया। पूर्वी इंफाल के एक गांव के निवासी हेन-नी-पाउ कहते हैं कि जहां ये झोपड़े बनाए गए, वहां पानी और दूसरी कई आवश्यक चीजों की कमी है। इसके साथ ही पहाड़ के तल में होने के कारण ये आवाजाही के मुख्य सड़क से दूर है। इसलिए लोगों ने वहां जाने में रुचि नहीं दिखाई। सेना की एक कंपनी के कमांडर ने बताया कि पहाड़ की तलहटी और मुख्य मार्ग से दूर होने के कारण इन झोपड़ों में कभी-कभी यूजी भी आते हैं। इनकी कई बैठके यहां होती है, पर ये यहां हमेशा नहीं होते है। जब इन झोपड़ों पर छापा मारने के लिए ऑपरेशन चलाए जाते हैं, तो सैन्य बलों के आने की भनक लग जाती है। ये अपने हथियार और अन्य अवैध चीजे छिपा देते हैं। पूछ-ताछ पर सामान्य नागरिक बताते हैं। लिहाजा, यहां से यूजी को दबोचने के ऑपरेशन सफल नहीं हो पाते हैं।

 

(नोट : यह ग्राउंड रिपोर्टिंग संजय स्वदेश ने 2009 में मणिपुर में इंफाल, ईस्ट इम्फाल और सेनापति के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जा कर की थी. )






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