कुशहा त्रासदी के तेरह साल और उसके सबक

पुष्यमित्र

आज कुशहा त्रासदी के 13 साल हो गये। 2008 में आज के ही दिन नेपाल के कुशहा में पूरी की पूरी कोसी नदी तटबंध को तोड़ कर नये इलाके में बहने लगी थी। वह बाढ़ की सामान्य घटना नहीं थी। वह कोसी नदी की बगावत थी। वह तटबंधों के बीच नहीं बहना चाहती थी। उसने नया रास्ता चुन लिया था।

पहले नदी भीमनगर से भपटियाही, नवहट्टा, महिषी, कोपरिया होते हुए खगड़िया जिले की सीमा को छूते हुए 70-80 डिग्री का कोण बनाती थी और फिर गंगा नदी के समानांतर तकरीबन 50 किमी बहती हुए कटिहार जिले के कुरसैला में गंगा में मिलती थी, इस तरह कोसी नदी भारत के इलाके में 260 किमी की लंबाई में बहती थी। मगर उस साल उसने सीधा रास्ता चुन लिया था, यह रास्ता अब सिर्फ 150 किमी लंबा रह गया था। तब कोसी नदी बीरपुर, बलुआ, छातापुर, मधेपुरा जिले के कुमारखंड, मुरलीगंज और आलमनगर होते हुए सीधे कुरसैला पहुंचने लगी थी। उसने पुराने अर्धचंद्राकार रास्ते को छोड़ दिया था। अब उसका रास्ता बिल्कुल सीधा था, जिस रास्ते से कोसी नदी बीसवीं सदी की शुरुआत में बहा करती थी। इस नयी नदी का बहाव 15 से 20 किलोमीटर चौड़े रास्ते में हो रहा था। मगर वह रास्ता निर्जन नहीं था, वहां बस्तियां थीं, लोग रह रहे थे, मकान थे। लिहाजा जो भी उसकी राह में आया वह बह गया।

यह तो शुक्र था कि कोसी नदी का बहाव उस वक्त महज एक लाख 66 हजार क्यूसेक था, जो आम दिनों के लिहाज से भी कम था, नहीं तो इस आपदा का कहर इससे भी कई गुणा अधिक होता, क्योंकि इस नदी में 1968 में 9.13 लाख क्यूसेक का बहाव दर्ज किया जा चुका है। अगर उस वक्त तीन लाख क्यूसेक से अधिक रफ्तार से नदी बह रही होती तो न जाने क्या होता। हालांकि कम पानी के बावजूद वह आपदा जो 2008 में आयी उसे भी सूनामी की तरह ही देखा समझा गया. उसके सामने जो-जो आया, इंसान या मकान वह हर चीज को अपने साथ बहाकर ले गयी। जो बच गये वे समझ नहीं पा रहे थे कि अब करें तो क्या करें।

इस इलाके के पांच जिले सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया और पूर्णिया में इस प्रलयंकारी बाढ़ का असर दिखा। बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के वेबसाइट पर इस बाढ़ से संबंधित विस्तृत आंकड़े दिये गये हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक इन जिलों के 35 प्रखंडों में बाढ़ का पानी पहुंचा. 412 पंचायतों के 993 गांव प्रभावित हुए। कुल 527 लोगों की मौत हुई उनमें सबसे अधिक मौत सुपौल और मधेपुरा जिले के लोगों की हुई. सुपौल में 211 और मधेपुरा में 272 लोग मारे गये। क्योंकि यही दो जिले कोसी की मुख्य धारा के ठीक सामने थे, सहरसा, अररिया और पूर्णिया जिले के कुछ हिस्सों में नदी का पानी किनारे से फैलकर पहुंचा था। इस पूरी परिघटना के बारे में मैंने विस्तार से अपनी किताब कोसी के वटवृक्ष में लिखा है। एक पूरा अध्याय ही है।

मैं फिर लिख रहा हूं, वह सामान्य बाढ़ नहीं थी। नदी की बगावत थी। कोसी अब तटबंधों के बीच बहना नहीं चाहती थी। कोसी नदी हमेशा से ऐसा करती रही है। अपने ढाई सौ साल के ज्ञान इतिहास में वह दो दर्जन से अधिक बार अपना रास्ता बदल चुकी है। हिमालय के सबसे ऊंचे शिखरों से बहकर आने वाली यह नदी अपने प्रचंड वेग और गाद की भरपूर मात्रा के लिए जानी जाती रही है। हर 10-20 साल में उसके गाद से उसका बेड भर जाता है और वह रास्ता बदल लेती है। यही इस नदी का सामान्य व्यवहार है। 1954 में बराज और तटबंध बनाकर सरकार ने इसे आठ किमी के दायरे में नियंत्रित करने की कोशिश की। मगर नतीजा क्या निकला। वह 54 साल भी कैद नहीं रखी जा सकी। इन 54 वर्षों में भी इसने कई दफा अपने तटबंध को तोड़ा। 2008 में बागी ही हो गयी।

मगर सरकार ने इस अनुभव से क्या सीखा? उसने फिर बागी नदी को पुराने रास्ते में धकेल दिया और कैद कर दिया। तटबंधों को मजबूत कर दिया। उस पर कोलतार की सड़क बना दी। तात्कालिक समाधान कर दिया। आगे जो हो सो हो।

क्या बिहार सरकार ने इस हादसे के असल कारणों को समझने की कोशिश की? इसके वजहों का पता लगाने के लिए एक जांच आयोग गठित हुई। मगर वह लगभग किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। जबकि रिटायर अभियंता विनय शर्मा जी ने उस आयोग को थोक के भाव से सुबूत उपलब्ध कराये थे। आज लगभग हर पर्यावरणविद यह मानता है कि नदियों को आजाद बहने देने चाहिए। मगर बिहार सरकार बाढ़ का समाधान नदियों को तटबंधों में कैद करके रखने में तलाशती है। वह खारिज हो चुकी पिछली सदी की तकनीक पर भरोसा करती है। वह नेपाल में हाईडैम बनाने की बात बार-बार करती है।

मैं उस जगह पर जा चुका हूं, जहां हाईडैम प्रस्तावित है। जिसके आगे दर्जनों गांव इस बांध के डूब में आने वाले हैं। नेपाल के लोग इस बांध के पक्ष में नहीं हैं। 1897 से ही नेपाल के साथ इस बांध को लेकर बातचीत चल रही है। नेपाल के धरान में 2004 से ही एक दफ्तर काम कर रहा है, जिसमें दोनों देशों के 72-72 विशेषज्ञ बैठकर हाईडैम की संभावना को तलाश रहे हैं। नेपाल को सी-लिंक का चुग्गा दिया जा रहा है। पिछले साल नेपाल सरकार को इसके डीपीआर को तैयार करने के लिए करोड़ों रुपये का बजट भी दिया गया है। मगर नेपाल तैयार नहीं है।
सवाल यह भी है कि क्या हाईडैम बना देने के कोसी नदी काबू में आ जायेगी। जानकार कहते हैं कि दो से तीन दशक में वह हाईडैम भी गाद से भर जायेगा। बार-बार दरवाजों को खोलकर पानी बहाना पड़ेगा।

सबसे बड़ी बात है कि वह हाईडैम एक बम की तरह होगा, जो नेपाल के इलाके में होगा और इन दिनों नेपाल पर चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। ऐसे में खुद भारत सरकार अपने देश के लिए एक संकट खड़ा करने में बहुत दिलचस्पी नहीं ले रही। मगर इन सबसे बड़ी बात यह है कि आज मान लिया गया है कि बड़े बांध किसी काम के नहीं। इसलिए जगह-जगह बांध तोड़े जा रहे हैं। अगर इस बारे में जानना चाहते हैं तो गूगल कर लें।

जब खुद बिहार सरकार मानती है कि फरक्का के बराज से बिहार में बाढ़ की घटना बढ़ रही है तो क्या वह यह नहीं समझती कि कोसी हाईडैम बाढ़ के खतरे को और बढ़ा ही देगा। मगर सरकार फिर भी नेपाल में हाईडैम की बात करती है। क्योंकि इसका जिक्र कर देने से वह अपनी जिम्मेदारी से बच जाती है। मौजूदा सवालों को टाल देती है। जबकि सरकार में बैठे लोग भी यह बखूबी जानते हैं कि बाढ़ की समस्या का हल नदियों को आजाद छोड़ देने में है, बांधने में नहीं।

खैर, यह तो दीर्घकालिक समाधान की बात है। एक बड़ा सवाल कोसी पीड़ितों के पुनर्वास का भी है। 2008 की बाढ़ के वक्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दावा किया था कि कोसी का ऐसा पुनर्वास करेंगे कि लोग उस आपदा को भूल जायेंगे। कोसी को स्वर्ग बना देंगे। मगर क्या हुआ।

13 साल बाद भी कोसी जस की जस है। जबकि इसको स्वर्ग बनाने के नाम पर बिहार सरकार वर्ल्ड बैंक से एक हजार करोड़ डॉलर का लोन ले चुकी है। इसके कोसी पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण सोसाइटी भी बनी। मगर इस सोसाइटी और अरबों के लोन से कोसी के लोगों को भला नहीं हुआ। भला सिर्फ इस सोसाइटी में काम करने लोगों का हुआ, जिन्हें मोटी पगार मिलती रही।

आज भी इस योजना के तहत बनने वाले आधे-अधूरे मकान इस इलाके में यहां-वहां बने दिखते हैं। कुछ सड़क जरूर बने हैं, मगर ऐसे सड़क तो पूरे राज्य में बने हैं। सुपौल के इलाकों में आज भी खेतों में बालू भरे नजर आते हैं। वह रेत जो 2008 में कोसी अपने साथ लेकर आयी थी। सरकार इतने सालों में इन खेतों को बालू से मुक्त नहीं करवा पायी है। यहां वहां किसी वैकल्पिक रोजगार के उपाय नहीं किये गये। कुछ मिलाकर एक हजार करोड़ डॉलर कहां खर्च हो गया, पता भी नहीं चला।

नीतीश कुमार का सपना था कि कोसी का पुनर्वास ऐसा करेंगे, जैसा 2001 के भूकंप के बाद भुज का किया गया था। मगर सरकारी मशीनरी उनके सपने को शुरू करने में भी विफल रही। यह कहानी सिर्फ कोसी की नहीं, बिहार के जल संसाधन विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग की कार्यप्रणाली, उनके विजन और उनकी विफलताओं की भी है। बाकी कोसी का इलाका तो जैसा पहले था, वैसा ही है। अभी भी वहां बाढ़ आती है और अभी भी लाखों लोग हर साल पंजाब-हरियाणा में धान-गेहूं की खेती में शामिल होने मजदूर बनकर जाते हैं। यह भारत के सबसे गरीब इलाकों में से एक है, जो देश भर को सस्ते मजदूर की आपूर्ति करता है। 2008 के महाप्रलय ने इस इलाके के दर्द को और बढ़ाया है और उसकी दवा आज तक नहीं हुई।

तसवीर- Ajay Kumar Koshi Bihar

( पुष्यमित्र के फेसबुक टाइमलाइन से साभार)






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