दुनिया में एक ईमानदार और ताकतवर इंसान एक साथ नहीं मिला

यह देश क्या ऐसे ही चलेगा?
पुष्यमित्र
हम रघुवर दास को चुनाव में हरा कर खुश हो जाएंगे और हेमन्त सोरेन के व्यक्तित्व में खूबियाँ तलाशने लगेंगे। हम कहने लगेंगे बन्दा बहुत सहज है, अपना जैसा लगता है। रघुवर दास जैसा एरोगेंट नहीं है, जो अपने कार्यकर्ताओं तक को नहीं तरजीह देता था। हम नीतीश को हरा देंगे और फिर तेजस्वी को सत्ता दे देंगे। मोदी को हरा कर राहुल को ले आएंगे। फिर एक रोज समझ आएगा कि ये लोग ढीले हैं, भ्रष्टाचार को तरजीह देने वाले हैं और फिर हम इनसे ऊब जाएंगे, जैसे 2014 में ऊब गए थे। फिर वापस किसी मोदी या किसी योगी को ले आएंगे कि इस देश को कोई तानाशाह ही ठीक कर सकता है। इस बीच में कोई केजरीवाल, कोई प्रफुल्ल महंत आएगा, जिसे देख कर लगेगा कि वह सब बदल देगा, मगर फिर वह भी सत्ता के रंग में रंग जाएगा, कुर्सी के लिए बेईमानी करने लगेगा। यह देश क्या ऐसे ही चलेगा? क्या थोड़ा भ्रष्ट, थोड़ा अवसरवादी, थोड़ा साम्प्रदायिक, थोड़ा अवसरवादी, थोड़ा जातिवादी, थोड़ा कॉरपोरेट परस्त होना लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासकों की मजबूरी है? क्या हमें कभी कोई शासक ऐसा भी मिलेगा जो सौ टका जनपक्षधर हो? या फिर हमें थक हार कर अपने हिसाब से इनमें से कोई विकल्प चुन लेना होगा और उसकी गलतियों को डिफेंड करते रहना होगा? क्या इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सच्चे, निष्पक्ष, ईमानदार और मजबूत शासक का मिलना असंभव है? काश गांधी ने भी कहीं राज चला कर देखा होता तो समझ पाते। वरना नेहरू के राज पर भी कम सवाल नहीं हैं।
मेरी प्रिय कवि विस्साव शिम्बोर्स्का लिखती हैं-
अफसोस इस दुनिया को एक ईमानदार और ताकतवर इंसान एक साथ नहीं मिला।
(पुष्यमित्र के फेसबुक टाइमलाइन से साभार )
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