बिहार जैसी जात की राजनीति देशभर में कहीं नहीं

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पटना. आपको 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव याद होगा। तब हर वोटर की जुबान पर एक नाम था-केजे राव। तत्कालीन चुनौतियों पर पार पाते हुए बिहार में सफलतापूर्वक चुनाव कराकर एक नया आयाम गढ़ने वाले पूर्व चुनाव आयुक्त केजे राव शुक्रवार को राजधानी में थे। हिन्दुस्तान संवाददाता ने उनसे बिहार की मौजूदा परिस्थितियों में चुनाव आयोग की चुनौतियों पर बातचीत की। प्रस्तुत है श्री राव से चंदन द्विवेदी की बातचीत के कुछ अंश:

बिहार में चुनाव आयोग की चुनौतियां क्या हैं और 2005 के चुनाव में आपने अपने कार्यकाल के दौरान क्या खास किया?


2005 के चुनाव से पहले बिहार में बूथ कैप्चर करने की घटनाएं ज्यादा होती थीं। स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव कराने की चुनौती थी। पिछले चुनावों में जिन बूथों पर गड़बड़ी हुई थी व जिन्होंने गड़बड़ी कराई थी उनको आइडेंटीफाई किया। बाहुबलियों व धनबलियों के डर से बूथों तक कम लोग पहुंचते थे। उन पर नियंत्रण जरूरी था। उन्हें नियंत्रित करने में कुशल अधिकारियों का साथ मिला और फिर नतीजा सामने था। बूथ कैप्चर लगभग खत्म सा हो गया। चुनाव में धांधली रुकी।  2005 का असर 2010 के चुनाव में भी दिखा। बिहार में धनबल, बाहुबल और जात-पात की राजनीति पर अंकुश लगाकर वोटरों को मतदान केंद्र तक लाना अब भी बड़ी चुनौती है।
वर्तमान चुनाव को लेकर आपकी क्या राय है? कैसे प्रभाव मुक्त व आकर्षण मुक्त चुनाव हो?

चुनावी सुधार जरूरी है। सभी दल एक जैसे हैं। 2008 में इलेकटोरल रिफॉर्म के लिए जो प्रस्ताव भेजा गया उसपर किसी राजनीतिक दल ने समर्थन नहीं दिया। 2005 में प्राइवेट प्रॉपर्टी पर चुनावी बैनर व प्रचार की इजाजत नहीं थी लेकिन सरकार ने 2010 में एक्ट में संशोधन कर दिया। इससे राजनीतिक दलों के चाल व चरित्र का साफ पता चलता है।

चुनाव में काफी पैसे खर्च होते हैं। इसे रोकने में सफलता क्यों नहीं मिल रही?

सभी रोगों की एक ही दवा है। चुनाव आयोग द्वारा भेजे गए प्रस्तावों को अमल में लाया जाए। धनबल और बाहुबल पर तो दो मिनट में नियंत्रण हो जाएगा। चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पवित्र हो जाएगी। चुनाव व्यवसाय बन गया, एक करोड़ लगाओ दस करोड़ कमाओ। पॉलिटिकल पार्टी को खुद में सुधार लाने की जरूरत है। दागियों व बाहुबलियों को टिकट बेचकर पार्टियां लोकतंत्र की धार कुंद करने में लगी हैं। ब्लैकमनी का इस्तेमाल चुनाव में खूब होता है।

वोटिंग के प्रतिशत में सुधार हुआ है लेकिन इसे शत प्रतिशत तक कैसे पहुंचाया जाए?

यही तो बड़ी चुनौती है। युवाओं व महिलाओं को आगे आना होगा। स्वीप (सिस्टेमेटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेकटोरल पार्टिसिपेशन) कार्यक्रम को और गति देनी चाहिए। सबकी भागीदारी से ही मतदान का प्रतिशत बढे़गा। जिन्हें प्रत्याशी पसंद नहीं, वे नोटा दबाएं। इसके लिए बूथ तक आने की जरूरत है। नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के उपाय हों। वोटर निडर होकर बूथ तक पहुंचे और अपने पसंद का बटन दबाएं।

साफ-सुधरे चुनाव की क्या कसौटी है?

धनबल, बाहुबल व बूथ कैप्चरिंग को रोकना। भयमुक्त वातावरण में मतदान। जिस दिन बूथों पर जवानों की तैनाती की जरूरत नहीं पड़ेगी, उस दिन लोकतंत्र का असली जश्न दिखेगा। हर वोटर को मत देने का मौका, दागियों पर प्रतिबंध, घोषणा पत्र को अमली जामा पहनाने की अनिवार्यता राजनीतिक दलों के लिए लागू हो।

जाति फैक्टर को कैसे निष्प्रभावी किया जाए?

उत्तर प्रदेश व बिहार इससे सबसे ज्यादा ग्रसित हैं। वोटर यह तय करें। उन्हें शिक्षा, रोजगार, विकास, बुनियादी सुविधाएं, परिवहन के बेहतर साधन चाहिए या अपनी जाति का सांसद या विधायक। जिस दिन यह वोटर समझ जाएंगे जाति फैक्टर खत्म हो जाएगा।
यूृथ कांग्रेस के चुनाव में आपकी कार्ययोजना इतनी सफल क्यों नहीं रही?
हम चुनावी प्रक्रिया का सुपरविजन करते हैं। किसी पार्टी के लिए काम नहीं करते। पार्टी अपने संविधान के अनुसार काम करती है। कार्ययोजना चुनावी प्रक्रिया पर आधारित थी जो सफल रही।

बिहार के वोटरों से क्या अपील करना चाहेंगे?

2005 से 2015 के हालात में बहुत अंतर नहीं। यहां अब भी कई समस्याएं हैं। वोटर बूथ तक निर्भिकता से पहुंचें और बेहतर उम्मीदवार का चयन करें। युवा आगे आएं। क्रिमिनल को वोट न दें। कोई उपाय न हो तो नोटा दिखाएं। बाहुबली और धनबली के लिए नोटा महाबली है। बाहुबली डराएं तो आप उन्हें नोटा से डराएं।

from livehindustan.com






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