वीआईपी इलाके में सेवक के घर जैसा है ‘चौबे बाबा’ का बंग्ला

डेढ़ घंटे मोदी के मंत्री चौबे बाबा के आवास पर

पियुष ओझा
केजी मार्ग जिसे कस्तूरबा गांधी मार्ग के नाम से भी जानते हैं, दिल्ली का सबसे पॉस एरिया. इसी खास एरिया में एक आम सा मकान है सांसद से मंत्री बने अश्विनी कुमार चौबे का. पंडित रविशंकर लेन बंग्ला नंबर -19, मकान के आस-पास बधाई संदेश के लगे बड़े-बड़े पोस्टर हैं. सुबह के 8 बज रहे होंगे, गेट के बाहर सुरक्षा गार्ड के जवान तैनात थें, वहां अंदर आते लोगों के हावभाव को मैंने महसूस किया. लोग पहले आवास के अंदर आते समय थोड़ा हिचिकिचाये और घबड़ाये नजर आते लेकिन गेट के पास जाते ही बडे़ ही सहज और सरल ढंग से सुरक्षाकर्मी उन्हें अंदर बुला लेते. किसी मंत्री के घर जाने में इतनी सहजता इस बात का प्रतिक है कि एक खास आदमी होते हुए भी अश्विनी कुमार चौबे व्यवहार काफी आम है. सुबह 8 बजे ही वहां लोगों की अच्छी-खासी भीड़ थी, मैं अचरज में था कि इतनी सुबह मंत्रीजी से मिलने इतने लोग. बरामदे में टहलते मंत्रीजी की सेक्रेटरी लोगों को बता रहे थें कि बाबा अभी पूजा पर हैं जल्द ही आपसे मिलेंगे. आस-पास के लोग मंत्रीजी की दिनचर्या को लेकर काफी चर्चा कर रहे थें. लोगों की बातचीत से ये पता चला कि अश्विनी कुमार चौबे अपनी व्यस्तत दिनचर्या में से पूजा के लिये समय जरूर निकालते हैं. मंत्रालय में भी पदभार संभालने से पहले उन्होंने वहां पूजा पाठ किया था.
बंग्ला नंबर-19, परिसर में बाबा-बाबा की गुंज सुनाई दे रही थी. दरअसल अश्विनी कुमार चौबे को लोग बाबा कहकर पुकारते हैं. घड़ी में 10 बजने वाले थें, धोती पहने, सर पर तिलक लगाये एक शख्स बाहर निकलता है. पूरे परिसर में हलचल सी मच जाती हैं लोग आतुर हो जाते हैं मिलने को. वो शख्स बड़े ही प्यार से मुस्कुराते हुए सबसे मिलता है उनका हाल जानता है. कुछ मीडियाकर्मी बाहर बाईट के लिये बोलते हैं और वो बड़े ही विनम्रता से समय ना होने का हवाला देकर अपनी गाड़ी में बैठ जाते हैं. गाड़ी जब तक गेट से बाहर नहीं हो जाती लोग उनकी कार के पिछे-पिछे चलते रहते हैं. महज चंद मिनट की ही मुलाकात होती है लेकिन वो चंद मिनट अपनेपन से भरा लगता है. वहां मौजूद लोगों के चेहरे पर खुशी अपने आप आ जाती है जब वो मुस्कुरा कर उनका हाल पूछते हैं. कुछ ऐसी मुलाकत थी मंत्री अश्विनी कुमार चौबे से.
अपनी समस्या लेकर पहुंचते हैं लोग
आवास पर ही एक कार्यालय हैं जहां बगैर धर्म, उनकी पहचान, उनका निवास पूछे वहां मौजूद कर्मचारी उनकी सहायता करने को तत्पर रहते है. वहां मेरी मुलाकात होती है मनोरंजन सिंह से. 10-20 लोगों के बीच घिरा ये आदमी अश्विनी कुमार चौबे के पीएस हैं, जो वहां आने वाले लोगों की समस्या सुनकर उसे सुलझाने की कोशिश में लगा रहता है. आस-पास ढेरो काम, लोगों की लंबी भीड़ के बावजूद भी मनोरंजनजी बड़े ही सहजता के साथ लोगों से बात करते हैं. किसी को इलाज के लिये सांसद महोदय का लेटर चाहिए, किसी को ट्रेन की टिकट कंफर्म करवाना है तो किसी को कोई और काम. मनोरंजन जी बड़े इत्मीनान से सबकी समस्या को सुनते हुए उसे हल करते हैं. आवास पर करीब डेढ़ घंटे मैं रूका रहा. वहां लगातार लोगों का आने-जाने का सिलसिला चलता रहा. लोग आकर पूछते कि मंत्रीजी कहां है, और फिर उनसे मुलाकात कब होगी ये पूछकर या तो बैठ जाते या फिर बाद में आने को कहकर चले जाते.
जरा इनसे भी मिलिये-
इतने लोगों के बीच व्यवस्था संभालते एक और शख्स नजर आया. नाम अविरल शास्वत जो माननीय सांसद महोदय के पुत्र हैं. वहां आस-पास लोगों का ख्याल भी रखते हैं और लगातार फोन पर व्यस्त नजर आते हैं. काफी व्यस्तता के बीच वो लोगों से मिलते हैं और उनका हाल-चाल जानते हैं. अविरलजी अपने पिता अश्विनी कुमार चौबे की तरह ही मिलनसार और शालिन हैं. भागम-भाग वाली लाइफ में तड़क-भड़क से दूर अविरल का अलग अंदाज है, वो अंदाज जो एक सेवक का होता है. यकिन मानिये बग्ला नंबर 19 आपको मंत्रीजी का नहीं बल्कि एक सेवक का बंग्ला लगेगा, जहां लोग जुटे हैं जनता की सेवा में. अविरलजी ने पहली ही मुलाकात में बड़े ही विनम्र अंदाज में मुझसे कहा कि आपका कॉल आ रहा था लेकिन मैं उठा नहीं सका, उनकी विनम्रता और वय्कत्तिव पहली मुलाकात में ही मन को भाने वाला था.
कार्यालय में एक बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ है. वो पोस्टर है सांसद महोदय की लिखी हुई किताब ‘त्रिनेत्र’ की. अपनी किताब त्रिनेत्र में उन्होंने उत्तराखंड में आई आपदा से जुड़ा अनुभव शेयर किया है. बताते चलें कि अश्विनी कुमार चौबे उन लोगों में से एक हैं जिन्होंने इस आपदा मे अपनों को खोया है.
एक बात जो मंत्रीजी के आवास पर अजीब लगी वो ये थी कि वहां आस-पास कई ऐसे लोग थें जो महज चाटुकारिता के लिये वहां पहुंचे थे. उस परिसर में मुझे कुछ ऐसे पत्रकार भी नजर आये जिन्हें पत्रकार नहीं चाटुकार कहना बेहतर होगा. वहां एक शख्स मुझे ऐसा मिला जो लगातार झूठ पर झूठ बोला जा रहा था. परिचय में उसने बताया कि वो एक पत्रकार है और मुझे पहले से जानता है. मैं महाशय की बात सुन रहा था उन्होंने मेरी इतनी तारीफ की जितना मुझे भी खुद के बारे में नहीं पता. साहब मुझसे दोस्ती बढ़ाना चाहते थे और बार-बार निवेदन कर रहे थें कि बाबा के साथ मैं उनकी एक फोट क्लीक कर लूं.
बहरहाल, सांसद से मंत्री पद मिलने के बाद अश्विनी कुमार चौबे और उनके साथ काम कर रही टीम काफी व्यस्त नजर आ रही है. लेकिन इस व्यस्तता के बीच वहां जिस भाव और अंदाज से लोगों की बात सुनी जा रही थी वो काबिले तारीफ थी. ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि अश्विनी चौबे जिस तरह काम कर रहे हैं वो जनप्रतिनिधियो के लिये आदर्श हैं । (उपरोक्त वृतांत पियुष ओझा के फेसबुक टाइमलाइन से साभार) 






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