5 वर्षों में पीएम मोदी 5 बार पटना आये, मंच के साथ बदलता गया भाषण, भाषा और भाव

वीरेंद्र यादव,पटना। पिछले 5 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 बार पटना आये। हर यात्रा का मकसद अलग-अलग था। अक्टूबर 2013 में मोदी पटना के गांधी में मैदान सरकार बनाने के लिए वोट मांगने आये थे और 3 मार्च, 2019 को सरकार बचाने के लिए वोट मांगने आये थे। इसके अलावा उनकी तीन यात्रा गैरराजनीतिक और सरकारी थी। हमने नरेंद्र मोदी के पटना की पांचों यात्राओं को कवर किया। इन यात्राओं में उनका भाषण, भाषा और भाव हर बदलता रहा।
प्रधानमंत्री अपनी पहली यात्रा यानी अक्टूबर 2013 में यदुवंशियों के लिए द्वारिका से भगवान श्रीकृष्ण का संदेश लेकर आये थे। लेकिन यादवों ने उन संदेशों को गोबर में लपेट पर ‘गोइठा’ बना दिया। इसकी आंच ऐसी सुलगी कि 2019 की यात्रा में मोदी श्रीकृष्ण को भूल ही गये। इस बार नरेंद्र मंत्री सवर्णों के लिए ‘मुक्ति का मंत्र’ लेकर आये थे। केंद्र और राज्य सरकारों के सभी बड़े पदों पर 80-90 फीसदी कब्जा जमाने वाले सवर्णों को 10 फीसदी का आरक्षण और दे दिया। ताकि उच्च पदों पर से दलित व पिछड़ों को मुक्त किया जा सके। 2013 में अतिपिछड़ा प्रधानमंत्री का राग अलापने वाले नरेंद्र मोदी अब ‘सवर्ण वेदना’ को बेचते फिर रहे हैं और खुद को सवर्णों का ‘तारणहार’ बता रहे हैं।
प्रधानमंत्री की दूसरी पटना यात्रा 25 जुलाई,15 को हुई थी। उस दिन दो कार्यक्रम था। श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल (एसकेएम) में आयोजित कार्यक्रम को हमने कवर किया था। उस दिन ऐसा संयोग रहा कि जब हम एसकेएम पहुंचे तो प्रवेश के सभी दरवाजे बंद हो गये थे। सिर्फ प्रधानमंत्री के प्रवेश के लिए पुलिस मुख्यालय की ओर का दरवाजा खुला हुआ था। हम प्रवेश की संभावना तलाशते हुए उसी दरवाजे पर पहुंचे। तब तक प्रधानमंत्री का काफिला भी पहुंच गया। उनके साथ दो पत्रकारों की टीम भी चलती है। एक रिकार्डिंग करते हैं और दूसरे फोटोग्राफी के लिए। हम इन्हीं पत्रकारों के साथ एसकेएम में घुसे। वे लोग सीधे मंच के आगे डी एरिया में चले गये। हम कुर्सियों की दूसरी पंक्ति में जगह देखकर बैठ गये। माहौल देखकर बाद में हम भी डी एरिया में चले गये। एसकेएम में कृषि मंत्रालय का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के साथ सीएम नीतीश कुमार बैठे रहे, लेकिन उन्हें बोलने का मौका नहीं मिला। उस समय नीतीश कुमार लालू यादव के समर्थन से सरकार चला रहे थे।
तीसरी बार नरेंद्र मोदी श्रीगुरुगोविंद सिंह जी महाराज की 350वीं जयंती पर प्रकाश पर्व में शामिल होने के लिए 5 जनवरी, 2017 को पटना आये थे। उस समय नीतीश सरकार में राजद और कांग्रेस भी शामिल थी। उस समारोह में नीतीश कुमार ने शराबबंदी की जबरदस्त ब्रांडिंग की और इस पर नरेंद्र मोदी ने भी मुहर लगा दी। मुख्य समारोह के बाद प्रधानमंत्री ने राजद प्रमुख लालू यादव, तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव से मुलाकात की, लेकिन पीएम अपनी ही पार्टी के सुशील मोदी को मिलने के लिए नहीं बुलाया।
चौथी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 अक्टूबर, 2017 को पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में भाग लेने आये थे। इससे पहले जुलाई महीने में सीएम नीतीश कुमार की ‘अंतरात्‍मा’ ने पलटी मारी थी और लालू यादव की डोली से उछलकर नरेंद्र मोदी की डोली में चली गयी थी। सुशील मोदी की भी किस्मत ने पलटी मारी थी और उपमुख्यमंत्री बन गये थे। भाजपा सरकारी पार्टी में शामिल हो गयी थी। नीतीश को लगा कि ‘डोली’ भी अपनी और ‘कहार’ भी अपना। जो मांगों, सब मिल जाएगा। इसी झांसे में आकर मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के सामने पटना वि‍श्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग कर दी। नीतीश ने दोनों जोड़कर पीएम से प्रार्थना की थी और प्रधानमंत्री ने हाथ झटक दिये। पीएम केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने के बजाये ‘श्रेष्ठता का प्रवचन’ देकर चले गये।
पांचवीं बार नरेंद्र मोदी 3 मार्च को गांधी मैदान में नीतीश कुमार के साथ वोट मांगने आये थे। साथ में रामविलास पासवान भी थे। प्रधानमंत्री अपनी पहली यात्रा 2013 में नीतीश की ‘बर्बादी’ का गाथा लिखने आये थे और पांचवीं यात्रा में नीतीश का ‘यशगान’ कर रहे थे। पहली चार यात्राओं के दौरान प्रधानमंत्री की बात सुनने को लेकर उत्सुकता रहती थी, लेकिन पांचवीं यात्रा उब में तब्दील हो गयी थी। पांचवीं यात्रा के भाषण में कोई आकर्षण नहीं था। पुलवामा, सर्जिकल स्ट्राइक, विपक्ष और चौकीदार जैसे विषय ही पीएम के भाषण का केंद्र बिंदु था। उनके भाषणों से भविष्य का सपना गायब था और भाव-भंगिमा में नयापन भी नहीं था।






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