बिहार का गांव, यहां गूंजती है कृष्ण की बांसुरी की धुन

पूर्णिया. शैलेष। कोई भी कला, कोई भी विधा, जाति-धर्म में बंधी नहीं होती। खासकर भगवान कृष्ण की बात करें तो वो प्रेम का प्रतीक हैं। उन्हें हर धर्म-संप्रदाय के लोग मानते हैं। उन्होंने लोगों को प्रेम का मार्ग दिखाया और प्रेम करना सिखाया। एेसे ही कृष्ण को मानने वाले कुछ मुसलमान हैं जो प्रेम को ही अपना धर्म मानते हैं और कृष्ण की मुरली को बनाना और बजाना ही उनका पेशा है।
पूर्णिया जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर स्थित श्रीनगर प्रखंड में मुस्लिम समुदाय के लोग गुम हो रही बांसुरी की धुन को जीवंत करने में जुटे हुए हैं। ये जितनी अच्छी बांसुरी बना लेते हैं उतनी ही अच्छी भक्ति और फिल्मी धुन बजा भी लेते हैं। इनकी बांसुरी की धुन जहां सूफी संप्रदाय से ओतप्रोत है तो वहीं धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटने वाले लोगों के लिए ये लोग मिसाल है।
धर्म से परे है कला  
गांव के लोगों के मुताबिक इस्लाम धर्म में बांसुरी बजाने की इजाजत नहीं लेकिन इन मुस्लिम संप्रदाय के लोगों के लिए यह भगवान की भक्ति है। ये लोग बांसुरी से कृष्ण भजन और कई सूफी गानों की धुन बजाते हैं। खासकर जन्माष्टमी में इनकी बनाई बांसुरी मंदिरों के पास खूब बिकती है। ये लोग मंदिर के पास जाकर अपनी बांसुरी से भजन बजाया करते हैं और अपनी जीविकोपार्जन के लिए बांसुरी बेचा करते हैं।
बासुरी बजाना और बेचना ही है पेशा
इस गांव के  लोगों का कहना है कि इनके पूर्वज कुश्ती पहलवानी किया करते थे लेकिन बाद में सूफी संगत से प्रेरित होकर वे बांसुरी बजाने लगे और साथ ही बांसुरी बनाने और उसे बेचना ही अपना व्यवस्या बना लिया। बांसुरी बेचने के लिए बांसुरी बजाना भी पड़ता है। उसके लिए बांसुरी बजाने का अभ्यास भी करना पड़ता है। इस गांव के लोगों की बांसुरी की धुन इतनी मनभावन है कि रेडियो में अक्सर इनके कार्यक्रम प्रसारित होते हैं।
तीन तरह के बांसुरी निर्माण में है महारत हासिल
यहां के लोगों को तीन तरह के बांसुरी निर्माण में महारत हासिल है, जो है-नगीना, कृष्णा और कन्हैया। इन बांसुरी की मांग बिहार के कई जिलों से लेकर नेपाल के काठमांडू तक है। इनकी बनाई बांसुरी और उनकी बांसुरी की धुन के लोग सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
प्रखंड क्षेत्र स्थित कदगमा, बसगढ़ा, लठोरा और बालूगंज में बसे करीब 25-30 परिवार के लोग बांसुरी और मुरली निर्माण कला में माहिर माने जाते हैं। ये लोग पुस्तैनी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए निर्माण कार्य कर अपनी पहचान बनाए हुए हैं। ये लोग बांसुरी निर्माण कर ही अपना जीविकोपार्जन करते हैं।
हरिप्रसाद चौरसिया और फहीमुल्लाह हैं प्रेरणास्रोत
बांसुरी बनाने वाले मोहम्मद आरिफ बताते हैं कि हमने ये कला अपने पूर्वजों से सीखी है और उसे जिन्दा रखना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि गांव के लोग संगीत सम्राट हरिप्रसाद चौरसिया और फहीमुल्लाह खान को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। उनकी बजाई धुन को हम रेडियो में सुनते हैं और उनकी तरह बजाने की कोशिश करते हैं। हम प्रतिदिन इसका अभ्यास करते हैं।
बांसुरी बजाना एक योगक्रिया है, श्वास संबंधी बीमारियां नहीं होतीं
शाह मोइम बताते हैं कि बांसुरी बजाना एक योगक्रिया है, जिससे सांस संबंधी बीमारियां ठीक हो जाती हैं। जो सुबह उठकर बांसुरी बजाता है उसे सांस संबंधी परेशानी नहीं हो सकती।
मंदिरों के बाहर बजाते और बेचते हैं बांसुरी
वहीं मोहम्मद आरिफ आज भी कुश्ती का दांव आजमाते हैं। वो बताते हैं कि हमलोग फकीर हैं और हम कृष्ण को मानते हैं। हम ज्यादातर मंदिरों के बाहर बांसुरी बजाते हैं और इसे बेचते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि भगवान कृष्ण स्वयं आए हैं और बता रहे हैं कि इस धुन को एेसे बजाओ। हमारी बांसुरी सबसे ज्यादा होली और सावन में बिकती है। आज कंप्यूटर का युग है बच्चे वीडियो गेम में लगे रहते हैं और अपनी परंपरा से दूर हो रहे हैं। इसने हमारे व्यवसाय को भी प्रभावित किया है।
मांग के साथ-साथ आय भी हो गई है कम 
आरिफ बताते हैं कि अब हमारे बच्चे भी इस विधा को नहीं सीख रहे हैं। वे दूसरी पीढ़ी हैं जो इस कार्य से जुड़े हुए हैं। अब धीरे-धीरे आधुनिक युग में मांग कम होने से उनके बच्चों का मोहभंग हो रहा है और वे बांसुरी एवं मुरली निर्माण काला सीखने से मुंह मोड़ रहे हैं, ये देखकर दुख होता है। इस क्षेत्र के मु. नसीम, मु. जहीर, मु. मोईन, सद्दीक, युसूफ सहित अन्य कलाकार हैं जो बांसुरी निर्माण करते हैं।
असम से मंगाते हैं बांस
बांसुरी निर्माण में मूलत: असम के मकोर बांस का उपयोग होता है। जिसका स्वर और तान काफी अच्छा होता है। हालांकि देसी बांस से भी बांसुरी निर्माण कर लेते हैं जिसे बनाने में भी अधिक मेहनत पड़ता है और स्वर भी सही नहीं बज पाता है। देसी बांस सूखने के साथ फट जाता है और स्वर खराब हो जाता है।
असम के मकोर बांस को कटिहार जिला के मिरचाईबाड़ी के थोक विक्रेता से खरीदकर लाते हैं। जिससे ए ग्रेड, बी ग्रेड और सी ग्रेड की बांसुरी व मुरली बनाते हैं। ए ग्रेड सबसे बड़ा, बी ग्रेड मीडियम और सी ग्रेड सबसे छोटा होता है। अमूमन एक दिन में सी ग्रेड का 100 और ए एवं बी ग्रेड की 50 बांसुरी का निर्माण कर लेते हैं। एक बड़ी बांसुरी के निर्माण में 40-50 और छोटी बांसुरी के निर्माण में 15-20 रुपये खर्च पड़ता है।
मेला एवं कंपनी को सप्लाई कर बेचते हैं बांसुरी
बांसुरी एवं मुरली के निर्माता परिवार के सदस्य स्वयं मेला में घूम-घूमकर बेचते हैं एवं कुछ कंपनी को सप्लाई करते हैं। इसके अलावा अॉर्डर पर कलाकारों को बांसुरी बनाकर उपलब्ध कराते हैं। निर्मित बांसुरी को कृष्णाष्टमी मेला, झूलन मेला, कोसी पूर्णिमा मेला, माघी स्नान मेला में बेचते हैं।
बिहार के पूर्णिया, भागलपुर, बांका, खगड़िया, मानसी, मुजफ्फरपुर, बांका, सोनपुर, पटना व झारखंड के देवघर एवं नेपाल के काठमांडू तक जाकर बेचते हैं। बेचने के दौरान घूमते-फिरते लोगों को बांसुरी बजाना सिखा भी देते हैं। आरिफ बताते हैं कि बिहार भागलपुर और नेपाल के काठमांडू में अधिक बिक्री होती है। बताते हैं कि बांसुरी की कीमत अलग-अलग होती है। छोटी बांसुरी 25-35 और बड़ी बांसुरी 60 रुपये से लेकर 150 रुपये तक बेच लेते हैं। (जागरण डॉट कॉम से साभार)
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