बूढ़ी कांग्रेस में राहुल का मुकुट बचाने की कवायद

राकेश सैन
 अपनी 133 जयंतियां मना चुके और स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्व का दावा करने वाले देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस में नया बदलाव किया गया है। वैसे तो यह बदलाव केवल समाचार के कॉलम तक ही सीमित रहने के योग्य है परंतु इसके पीछे नेहरु-गांधी परिवार में राजनीतिक असुरक्षा की बढ़ती भावना और राहुल गांधी का मुुकुट बचाने के प्रयास के चलते इसने चर्चा का विषय भी बना दिया है। कांग्रेस ने 90 वर्षीय मोतीलाल वोरा को कोषाध्यक्ष पद से हटा कर अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के प्रशासनिक मामलों का महासचिव बनाया गया है और खजांची का पद अहमद पटेल को दिया गया है। इस परिवर्तन पर नई दिल्ली की 24 अकबर रोड पर स्थित कांग्रेस मुख्यालय में ही टिप्पणी करते हुए किसी ने कहा ‘न्यू सीपी बट सेम एपी अर्थात नए कांग्रेस प्रधान परंतु वही अहमद पटेल’। बता दें कि मोती लाल वोरा 90 सालों के तो अहमद पटेल अपने जीवन के 69 फाग खेल चुके हैं। रोचक है कि युवा नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस वयोवृद्ध सेनापतियों के भरोसे राजनीतिक मोर्चे डटी है। कांग्रेस के प्रवक्ता इसे अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को सम्मान देने का उदाहरण भी बता सकते हैं परंतु वास्तविकता कुछ और दिख रही है। कांग्रेस के अघोषित गृहस्वामी नेहरु-गांधी वंशावली के लोगों की इस सदाश्यता के पीछे उनकी असुरक्षा की बढ़ती भावना अधिक दिख रही है। खानदान को लगने लगा है कि तरुण कांग्रेस राहुल गांधी के सम्मुख आज नहीं तो कल चुनौती पेश कर सकती है और थके-मांदे वयोवृद्ध सिपहसालार पार्टी में युवराज के सुरक्षित नेतृत्व की लगभग शतप्रतिशत गारंटी हैं।  
 
कांग्रेस मुख्यालय में जो बदलाव किए गए हैं, उसमें सोनिया गांधी के वफादारों को ही अहम पद दिए गए हैं। ये दोनों ही पद कांग्रेस संगठन में बेहद महत्वपूर्ण हैं। परंपरा रही है कि अखिल भारतीय कांग्रेस समिति सचिवालय में गांधी परिवार के बाद सबसे वरिष्ठ व्यक्ति ही कोषाध्यक्ष हुआ करता है। अहमद पटेल 1985 में राजीव गांधी के बाद के सभी कांग्रेस नेताओं के करीबी रहे हैं तब उन्हें संसदीय सचिव नियुक्त किया गया था। 1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद अहमद पटेल पार्टी में बड़े राजनीति खिलाड़ी बने रहे। पीवी नरसिम्हा राव ने अहमद पटेल को अपने और 10 जनपथ (नेहरु-गांधी आवास) के बीच सेतु की तरह प्रयोग करने की कोशिश की। इस प्रक्रिया में पटेल सोनिया के नवरत्नों में शामिल हो गए। पटेल को पार्टी  का कोषाध्यक्ष बनाया गया। वर्तमान में 69 साल के पटेल और 90 साल के वोरा दरअसल पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव लाए जाने के तमाम तर्कों को धता बता रहे हैं। कई कांग्रेस नेता व राजनीतिक विश्लेषक ये सोच रहे थे कि अब मोती लाल वोरा को विदाई पार्टी दे दी जाएगी और उनकी जगह कनिष्क सिंह, मिलिंद देवड़ा या फिर नई पीढ़ी के किसी और नेता को बिठाया जाएगा। लेकिन पार्टी ने फिर वयोवृद्ध नेताओं पर अधिक विश्वास जताया। देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल बूढ़ी पंचायत बनती जा रही है। पार्टी की नई-नई गठित 23 सदस्यीय कांग्रेस वर्किंग कमेटी की औसत उम्र 69 साल है जिनमें अधिकतर नेता 75-80 साल के बीच के हैं। लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े 75 पार के हो चले हैं। कार्यसमिति का समूह फोटो देखा जाए तो यह वृद्धाश्रम का दृश्य पेश करता है।
दूसरी तरफ कांग्रेस से उसका सुख-चैन छीनने वाली भारतीय जनता पार्टी की टीम युवा दिखती है। अमित शाह 53 साल के हैं जबकि पीयूष गोयल और निर्मला सीतारमण जैसे कई नेता अपेक्षाकृत युवा उम्र में ही केंद्रीय कैबिनेट में रेल, वित्त और रक्षा जैसा अहम मंत्रालय संभाल रहे हैं। अगर भूपेंद्र यादव, कैलाश जोशी, राज्यवर्धन सिंह राठौर, स्मृति इरानी, धर्मेंद्र प्रधान, योगी आदित्यनाथ, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और दूसरे अन्य नेताओं को एक साथ देखें, तो बीजेपी के पास ऐसे युवा नेताओं की एक बड़ी शृंखला है जिनके पास सक्रिय राजनीतिक जीवन के दो और उससे भी ज़्यादा दशक हैं। राजीव-सोनिया काल के चर्चित चेहरों पर राहुल की ऐसी निर्भरता वाकई परेशान करने वाली है क्योंकि उन्हें पार्टी के भीतर से मामूली या कहें न के बराबर कोई चुनौती देनेवाला है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास युवा नेताओं का अकाल है। जयराम रमेश, शशि थरूर, पृथ्वीराज चौहान, सलमान ख़ुर्शीद, मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, रणबीर सुरजेवाला और दूसरे अन्य नेताओं के रूप में कांग्रेस के पास अनुभवी प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है जो जिम्मेदारी वाले पदों को संभाल सकते हैं। और फिर तमाम ऐसे युवा नेता राज्यों में भी मौजूद हैं, जिन्हें चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं सौंपी जा सकती हैं, लेकिन लगता है कि गांधी परिवार अपनी इस नए नेतृत्व को राहुल के लिए चुनौती मानता है। परिवार को भय है कि नए युवा नेता अपनी योग्यता के बल पर राहुल गांधी का खानदानी सिंहासन छीन सकते हैं या जनमत के दबाव के चलते इन युवा नेताओं को मजबरीवश आगे लाना पड़ सकता है, जबकि वयोवृद्ध नेताओं को लेकर इस तरह के खतरे नहीं है। लगता है कि जब तक राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य पूरी तरह सुरक्षित न हो जाए तब तक कांग्रेस मुख्यालय वृद्धाश्रम सरीखा नजारा ही पेश करता रहेगा।
खुद कांग्रेस के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए भी यह अशुभ संकेत है कि जब किसी परिवार के एक नेता को स्थापित करने के लिए बाकी युवा नेतृत्व का यूं गला घोंटा जा रहा हो। संसद में इन युवा नेताओं के समय-समय पर दिए जाने वाले भाषण, वक्तव्य, चर्चाओं में हिस्सेदारी, संसदीय समितियों में दिखने वाली नेतृत्व क्षमता बताती है कि इनमें प्रतिभा की कोई कमी नहीं। आज कांग्रेस के साथ-साथ देश को इन प्रतिभावान युवा नेताओं की बेहद जरूरत है जो युवा भाजपा का मुकाबला कर सके और युवा भारत की अपेक्षाओं पर खरा उतरे। कांग्रेस नेतृत्व को समझना चाहिए कि उसके इस व्यवहार से देश की जनता के साथ-साथ पार्टी काडर में गलत संदेश जा सकता है और इन युवा कांग्रेसी नेताओं में असंतोष भी पैदा कर सकता है जो खतराक साबित होगा।





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