बिहार में इंडिया का इकलौता जेल, जहां तैयार होती है फांसी की रस्सी

रोहित ओझा धुरान.बक्सर.
बक्सर महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि रहा है, मानव रूपी भगवान श्री राम का ज्ञान स्थली भी और बरतानिया हुकूमत और अवध के नवाब के बीच सबसे निर्णायक युद्ध का गवाह भी बक्सर की ज़मीन रही है। इतिहास की ना जाने कितनी घटनाओं को ओढ़े, माँ गंगा के पावन तट पर बसा बक्सर आज भी अपनी धरोहरों को खुद के भीतर समेटे हुए अपनी धुन में मग्न है।
बक्सर केवल अपने इतिहास के लिए ही नहीं जाना जाता है बल्कि देश के गुनहगारों को फांसी पर झुलाने के लिए भी जाना जाता है। देश के किसी भी कोने में यदि किसी को फांसी की सजा दी जाती है तो उसका फंदा बक्सर के सेंट्रल जेल में तैयार किया जाता है, बक्सर के अलावा पूरे देश में इस क्वालिटी की र बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध है। साल 1844 में ई. में अंग्रेज शासकों द्वारा केन्द्रीय कारा बक्सर में मौत का फंदा तैयार करने की फैक्ट्री लगाई गई थी। इससे पहले यह रस्सी फिलीपिंस के मनीला जेल में बनती थी, इसलिए इसे मनीला रस्सी भी कहा जाता था। यहां तैयार किए गए मौत के फंदे से पहली बार सन 1884 ई. में एक भारतीय नागरिक को फांसी पर लटकाया गया था।
168 किलोग्राम की एक मनिला रस्सी बनाने में 172 धागे को मशीन में पिरोकर घिसाई के बाद इसे बनाया जाता है। सबसे बेहतर धागा के लिए जे-34 रूई का इस्तेमाल किया जाता है। कुल आठ लच्छी को रात में गंगा नदी के किनारे से आने वाली नमी और ओस से मुलायम किया जाता है। कुल तीन रस्सी को एक साथ मशीन में घुमाकर मोटी रस्सी बनती है। इस प्रक्रिया से गुजर कर कुल 20 फीट लंबी रस्सी बनाई जाती है जो एक शख्स को फांसी देने के लिए पर्याप्त है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, मार्च 2013 से अभी तक 27 मनिला रस्सी देश के विभिन्न जेलों में भेजा जा चुका है।
सबसे बड़ी बात यह है कि बक्सर का यह सेन्ट्रल जेल गंगा नदी के किनारे होने के कारण फांसी का फंदा यानी की मनिला रस्सी बनाने में ज्यादा कारगर है। फंदा बनाने के दौरान नमी की बहुत जरूरत होती है, जिससे रस्सी मुलायम और मजबूत होती है।
कैदी ही तैयार करते हैं फांसी का फंदा
ब्रिटिश काल से ही बक्सर जेल के कैदी मौत का फंदा तैयार कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि वहां के कैदी इसे तैयार करने में माहिर माने जाते हैं। सजायाफ्ता कैदियों के लिए तय काम और प्रशिक्षण में एक मौत का फंदा तैयार करने का हुआ करता था। पुराने कैदी नए कैदियों को जूट और रस्सी के अन्य उपयोग की चीजों के अलावा फंदा बनाने का प्रशिक्षण देते थे। बक्सर जेल में यह सिलसिला अब भी जारी है।
(BuxarBytes के फेसबुक पेज से साभार )






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