झारखंड विधानसभा 2005 में उड़ा था लोकतंत्र का मजाक

Vijay Tiwari
भाजपा गठबंधन को 36 और कांग्रेस गठबंधन को 26 सीटें मिली थी । लेकिन तत्कालीन राज्यपाल सिब्ते रजी ने यूपीए को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था ।
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भाजपा जद यू गठबंधन और कांग्रेस झामुमो गठबंधन के बहुमत को लेकर जारी विवादों के बीच राज्यपाल ने शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी और 15 मार्च तक बहुमत साबित करने को कहा था ।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था और कोर्ट ने 11 मार्च तक बहुमत साबित करने को कहा था । लेकिन फिर विधायी मामलों में अदालती हस्तक्षेप का मामला गर्मा गया था ।
झारखंड में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 36 सीटें मिली थी जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगियों को 26 एवं राजद को 7
81 सदस्यीय विधानसभा में 12 निर्दलीय विधायक थे और बहुमत के लिए 41 सदस्यों की दरकार थी ज़ाहिर है कि स्वतंत्र विधायकों का महत्व बढ़ गया था ।
यूपीए खेमे में बेचैनी थी क्योंकि राज्यपाल सिब्ते रज़ी को सौंपी 42 नामों की सूची में से तीन विधायकों ने शपथ नहीं ली थी ।
साथ ही दो विधायकों एनोस एक्का, मधु कोरा और हरिहरेन राय अब भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ ही नज़र आ रहे थे । जबकि उनके नाम शिबू सोरेन ने अपनी सूची में राज्यपाल को सौंपे थे ।
जिन तीन विधायकों ने शपथ नहीं ली थी। वे थे कमलेश सिंह (एनसीपी), अपर्णा सेनगुप्ता और भानुप्रताप साही ( फॉरवर्ड ब्लाक) । एनसीपी और फॉरवर्ड ब्लाक केंद्र में यूपीए गठबंधन के सदस्य थे। फॉरवर्ड ब्लाक ने घोषणा की थी कि उसके विधायक शपथ लेंगे और सोरेन का समर्थन करेंगे । एनसीपी ने अपने विधायक कमलेश सिंह के लिए सोरेन का समर्थन करने के लिए व्हिप जारी कर दिया था । एनडीए का दावा था कि उसके साथ पाँच निर्दलीय विधायक हैं और वे उसके पक्ष में मतदान करेंगे ।
भाजपा के नेता राष्ट्रपति के सामने 41 विधायकों को पेश कर चुके थे । राज्य में सरकार बनाने के लिए ठीक इतने ही विधायकों के समर्थन की आवश्यकता थी ।
यूपीए का कहना था कि इन निर्दलीय विधायकों को भाजपा ने ज़बर्दस्ती अपने पास रखा है और इनमें से तीन विधायक यूपीए के पक्ष में वोट देने वाले हैं ।
इधर प्रोटेम स्पीकर प्रदीप कुमार बालमुचु ने विधायक एक्का को कारण बताओ नोटिस भेजा कि पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करने के लिए क्यों न उन्हें अयोग्य क़रार दिया जाए।
एक्का झारखंड पार्टी के सदस्य के रूप में जीत कर विधानसभा पहुँचे दो विधायकों में से एक थे और पार्टी ने यूपीए को समर्थन करने का फ़ैसला किया था ।
यदि एक्का अयोग्य क़रार दिए जाते तो एनडीए के 40 सदस्य ही रह जाते ।
लेकिन यूपीए के एक सदस्य के प्रोटेम स्पीकर बनने से उसके समर्थक सदस्यों की संख्या 39 ही रह गई थी ।
दोनों पक्षों के बराबर रहने पर ही प्रोटेम स्पीकर अपना मत का प्रयोग कर सकता है ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले पर कड़ी टिप्पणियाँ की थीं और बहुमत साबित करने की तिथि को 15 से घटाकर 11 मार्च कर दिया था।
इसको लेकर विधायिका के मामले में न्यायपालिका के हस्तक्षेप को लेकर एक नई बहस शुरू हो चुकी थी ।
यह मामला संसद में भी छाया रहा । तत्कालीन लोक सभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इस पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई । लेकिन भाजपा ने इसका यह कह कर बहिष्कार किया कि दोनों के अपने कार्यक्षेत्र हैं और दोनों को अपने दायरे में रह कर काम करना चाहिए।






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