राजद में मनोज झा के बहाने नया राजनीतिक प्रयोग

दुर्गेश यादव 

मनोज झा का राजद से राज्यसभा में जाना राजनीति में एक नए प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है |इस नए प्रयोग का परिणाम तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन वर्त्तमान इस प्रयोग से असंतोष जाहिर नहीं कर सकता है | राजनीतिक विश्लेषण जाति को शून्य कर के संभव नहीं है लेकिन विश्लेषक की चालाकी जाति को पर्दे के पीछे ठेल सकता है |राजद अपने जन्म काल से ही सामंतवाद और मनुवाद से लड़ते रहा है और इसका उज्जवल भविष्य भी इसी लड़ाई को मजबूती देने में है |हर स्वर्ण सामन्ती और मनुवादी भले नहीं हो लेकिन इस ब्यवस्था के सभी संरक्षक जाति से स्वर्ण ही होते हैं |

ब्राम्हण मतदाता के इस राजनीतिक चरित्र को इमानदारी से स्वीकार करना होगा कि “ब्राम्हण पद के लिए अपनी नीतियों से समझौता नहीं कर सकता है ” वह आपको मत देकर भी अपने सिद्धांत को जीवंत रखने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेगा |झा जी के प्रभाव से कितने लोग पार्टी से जुड़ेंगे इसका आकलन गलत हो सकता लेकिन इनके राज्यसभा में जाने से राजद की विचारधारा से जुड़े सभी जाति के बौद्धिक कार्यकर्त्ता का आत्मविश्वाश बढ़ेगा यह निश्चित है |

वर्त्तमान परिस्थितियों में झा जी को राज्य सभा में भेजना नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav का एक साहसिक कदम है इसकी सफलता पूर्ण रूप से झा जी के इमानदारी पर निर्भर है यदि #manoj_jha जी बौद्धिक लोंगो को पार्टी से जोड़ने और राजद के जमीनी युवा कार्यकर्ताओं को सामजिक न्याय और समाजवाद का पाठ पढ़ाने में कामयाब हो गए तो तेजस्वी यादव राष्ट्रीय स्तर पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हुए भारत के भविष्य बन जांयेंगे। अशफाक करीम राजद के सामाजिक समीकरण और वर्तमान जरुरत हैं।

(दुर्गेश यादव राजद बिहार के तकनीकी प्रकोष्ठ के प्रधान महासचिव हैं)

 






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