भावनाओं की भाषा हिंदी !

भावनाओं की भाषा हिंदी !
ध्रुव गुप्त
आज 14 सितम्बर को हर साल मनाया जाने वाला हिंदी दिवस 1949 में आज ही के दिन भारत की संविधान सभा द्वारा लिए गए उस निर्णय का उत्सव है जिसमें भारत की राजभाषा के रूप में देवनागरी में लिखी हिंदी को मान्यता दी गई। उसके साथ शर्त यह थी कि कि अगले पंद्रह सालों तक हिन्दी के साथ अंग्रेजी भी राजकाज की भाषा रहेगी और बाद में समीक्षा के बाद सिर्फ हिंदी को यह दर्ज़ा दिया जाएगा । ‘हिंदी दिवस’ तब से राजभाषा हिंदी के प्रति हम हिंदीभाषियों की मौसमी भावुकता का अवसर बनकर रह गया है। इस दिन सरकारी और गैरसरकारी मंचों से हिंदी की जमकर प्रशस्तियां भी गाई जाएंगी और उसकी उपेक्षा का रोना भी रोया जाएगा। हमारी उन कमियों की बात शायद ही कोई करेगा जिनकी वजह से हिंदी आजतक राष्ट्रीय स्तर पर राजकाज की अकेली भाषा नहीं बन पाई या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसे अपेक्षित गौरव हासिल नहीं हो पाया । वह कल भी भावनाओं की भाषा थी, आज भी भावनाओं की ही भाषा है ! हमारे दिलों में ठहरी हुई। उसके बारे में दिमाग से सोचने की जरुरत ही नहीं महसूस की हमने। हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या आज देश-दुनिया में हमेशा से ज्यादा है और अपनी भाषा में हमने कुछ अच्छा साहित्य भी रचा है, लेकिन आज के वैज्ञानिक और अर्थ-युग में किसी भाषा का सम्मान उसे बोलने वालों की संख्या और उसका विपुल साहित्य नहीं, ज्ञान-विज्ञान को आत्मसात करने की उसकी क्षमता तय करती है।
सच तो यह है कि अपनी हिंदी में साहित्य के अलावा शायद ही कुछ काम का है। विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, अभियंत्रणा, चिकित्सा, प्रशासन, कानून जैसे विषयों की शिक्षा में हिंदी अंग्रेजी का विकल्प आज भी नहीं बन पाई है। निकट भविष्य में इसकी कोई संभावना भी नहीं दिखती। हमारे जो युवा तकनीकी या व्यावसायिक विषयों की पढ़ाई करना चाहते हैं उनके पास अंग्रेजी के निकट जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं। इन विषयों पर हिंदी में आजतक कायदे की किताबें नहीं लिखी जा सकीं। जो इक्का-दुक्का किताबें उपलब्ध भी हैं, उनकी भाषा और तकनीकी शब्दों का उनका अनुवाद इतना जटिल और भ्रष्ट है कि उनकी जगह अंग्रेजी की किताबें पढ़ लेना आपको ज्यादा सहज लगेगा।
किताबों की बात तो छोड़िए, अंग्रेजी के वैज्ञानिक, तकनीकी शब्दों का हम आजतक स्वीकार्य हिंदी अनुवाद भी नहीं करा सके हैं। देश की आज़ादी के बाद सरकार ने भाड़े के कुछ अनुवादकों द्वारा अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों के जैसे अनुवाद कराए हैं, वे इतने यांत्रिक हैं कि उन्हें पढ़कर हंसी छूट जाती है। ऐसे अनुदित शब्दों से बेहतर था कि मूल अंग्रेजी शब्दों को ही हिंदी में आत्मसात कर लिया जाता। आज की पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों से ज्यादा व्यवहारिक है। शिक्षा की भाषा का चुनाव करते वक्त वह भावनाओं के आधार पर नहीं, अपने कैरियर और भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए फैसले लेती है। हिंदी की समय के साथ न चल पाने की कमी के कारण हममें से ‘हिंदी हिंदी’ करने वाला शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो अपनी संतानों को आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में नहीं पढ़ा रहा है। हम हिन्दीभाषी अपनी भाषा के प्रति जितने भावुक हैं, काश उतने व्यवहारिक भी हो पाते ।
तेजी से भागते के इस समयमें वे वही भाषाएं टिकी रह जाएंगी जिनमें विज्ञान और तकनीक को आत्मसात करने की क्षमता है। इस कसौटी पर रूसी, चीनी, फ्रेंच, जापानी जैसी भाषाएं अंग्रेजी को चुनौती दे रही हैं। हिंदी ही नहीं, अपने देश की तमाम भाषाएं इस दौड़ में बहुत पीछे छूट गई हैं। यक़ीन मानिए कि अगर अगले कुछ दशकों में हिंदी को ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की भाषा के रूप में विकसित नहीं किया जा सका तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे गंवारों की भाषा कहकर खारिज कर देंगी।
साभार अखबार ‘सुबह सवेरे’, भोपाल
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