क्‍या श्‍याम रजक विधान सभा से इस्‍तीफा देने के लिए बाध्‍य थे?

वीरेंद्र यादव, पटना।
किसी भी विधान सभा की अंतिम बैठक और चुनाव के बीच विधायकों की घुड़दौड़ शुरू हो जाती है। विधायक अपनी-अपनी सुविधा और समीकरण के हिसाब से खूंटा और नाद बदल लेते हैं। कुछ स्‍तबल के मालिक भी घोड़ों के ‘टाप’ के हिसाब से निर्णय लेते हैं। 16 अगस्‍त को राजद के प्रदेश अध्‍यक्ष जगदानंद सिंह ने विधायक प्रेमा चौधरी, फराज फातमी और महेश्‍वर यादव को पार्टी विरोधी गतिविधि के आरोप में बर्खास्‍त कर दिया तो उधर जदयू के प्रदेश अध्‍यक्ष वशिष्‍ठ सिंह ने अपने विधायक श्‍याम रजक को पार्टी से बर्खास्‍त कर दिया। इसके साथ ही उन्‍हें मंत्रिपरिषद से भी बर्खास्‍त कर दिया गया।
17 अगस्‍त को श्‍याम रजक ने विधान सभा अध्‍यक्ष विजय कुमार चौधरी से मिलकर विधान सभा से इस्‍तीफा दे दिया और इसके बाद राजद की सदस्‍यता ग्रहण कर ली। श्‍याम रजक का विधान सभा का कार्यकाल अभी लगभग चार महीना शेष था। जदयू से बर्खास्‍त होने के बाद भी विधान सभा की सदस्‍यता पर कोई आंच नहीं आ रही थी। उन्‍हें असंबंध सदस्‍य की हैसियत प्रदान कर दी जाती। लेकिन श्‍याम रजक ने इस्‍तीफा देना ही उचित समझा। इसका भी तकनीकी पक्ष है। इसके साथ नीतीश का खौफ भी।
दलबदल कानून के प्रावधान के अनुसार, कोई भी असंबंध सदस्‍य किसी पार्टी में शामिल नहीं हो सकते हैं। चुनाव होने वाला है और श्‍याम रजक को फिर चुनाव लड़ना है। उन्‍हें राजद की सदस्‍यता ग्रहण करनी थी। यदि वे विधान सभा से इस्‍तीफा नहीं देते तो उनके लिए वैधानिक समस्‍या खड़ी हो सकती थी। बिना इस्‍तीफा के वे राजद में शामिल होते तो उनके खिलाफ दलबदल कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती थी। स्‍पीकर उनकी शेष अवधि की सदस्‍यता समाप्‍त कर सकते थे। यह एक प्रकार की सजा होती। इसके साथ ही स्‍पीकर और भी सजा दे सकते थे। जैसे पिछली विधान सभा में तत्‍कालीन स्‍पीकर उदय नारायण चौधरी ने 8 सदस्‍यों की सदस्‍यता समाप्‍त करने के साथ ही उस कार्यकाल का उनका पेंशन भी रोक दिया था। बाद में इसी मुद्दे पर मेरे साथ चर्चा में उदय नारायण चौधरी ने कहा था कि ऐसे मुद्दों पर निर्णय करते समय मुख्‍यमंत्री की इच्‍छा और सत्‍तारूढ़ दल के हितों का ख्‍याल भी रखना पड़ता है।
नीतीश कुमार दुश्‍मनों को सलटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। दलबदल कानून की आड़ में कई विधायक और विधान पार्षदों की सदस्‍यता समाप्‍त की गयी है। इसमें स्‍पीकर और सभापति ने मुख्‍यमंत्री की इच्‍छा का खूब ‘सम्‍मान’ भी किया।
श्‍याम रजक इसी कानूनी दावपेंच और नीतीश के खौफ के कारण दस नंबर में पहुंचने से पहले एक नंबर का दाग छुड़ा आये। चार महीने के वेतन और अन्‍य सुविधाओं के रूप में कम से कम 8 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन बिना विधान सभा से इस्‍तीफा दिये राजद में शामिल होते तो और भारी खामियाजा भुगतना पड़ता। इसीलिए विधानसभा से इस्‍तीफा देने को बाध्‍य हुए।
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