एक नागरिक के बयान के आगे ब्रांड एम्बेस्डर और एड गुरू तक फेल

Vineet Kumar
45 वर्षीय कोरोना वायरस के शिकार व्यक्ति ने मीडिया को बताया कि दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में आइसोलेशन में जब रखा गया तो लगा कि मैं किसी फाइव स्टार होटल में हूं. वहां के लोगों ने जिस तरह का मेरे साथ व्यवहार किया, कहीं से नहीं लगा कि मैं किसी सरकारी अस्पताल में हूं.
एक मरीज़ का बयान उस लाखों रूपये के विज्ञापन पर भारी है जो कि निजी अस्पताल और स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी कंपनियां अपनी ब्रांडिंग के उपर खर्च करती है. मैंने चार साल विज्ञापन को बतौर एक विषय के तौर पर पढ़ाया है, इस पर कई महीने लगाकर रिसर्च किया है. मैं ये बात अभी भी दावे के साथ कह सकता हूं कि एक नागरिक का बयान किसी संस्थान या उत्पाद की छवि बनाने के काम आता है, कई बार उसके आगे ब्रांड एम्बेस्डर और एड गुरू तक फेल हो जाया करते हैं.
कोरोना के मरीज़ ने जो कुछ भी कहा, उसके बाद अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि इससे सरकारी अस्पताल,डॉक्टर, कर्मचारी और यहां तक की सरकार की साकारात्मक छवि बनी है. इससे इनमें काम करने का हौसला बढ़ेगा.
हम इस सच से अंजान नहीं हैं कि सभी सरकारी अस्पताल और सभी बीमारियों के लिए सार्वजनिक स्तर पर ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं है. बहुत सारे कारण हैं और बहुत कुछ करने की जरूरत है. लेकिन
ऐसे नाजुक दौर में एक मरीज का ये बयान इस बात की जरूरत को जोर देकर दोहराने की तरफ इशारा करता है कि सारी चीजें निजी कंपनियों के हाथों में देने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य,परिवहन और नागरिक सुरक्षा सरकार के हाथों में रहे तो अच्छा है.
निजी संस्थान अपने मूल चरित्र में मुनाफा और गिव एंड टेक के फॉर्मूले पर टिके होते हैं जबकि सार्वजनिक संस्थान सरकार के एक इशारे पर बेहतर करने की दिशा में जी-जान से जुट जाते हैं. कहना न होगा कि मरीज का बयान इसे सही ठहराता है. निजी अस्पतालों की उदारता अभी तक जाहिर नहीं हुई है.
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