लखपति नहीं अरबपति हैं पटना जंक्शन वाले बजरंग बली

बुधनमा : नवल किशोर कुमार
सच में यदि देश में दलित और पिछड़े गरीब और सवर्ण अमीर हैं तो इसकी वजह केवल यह नहीं है कि जमीन और उत्पादन के संसाधनों पर सवर्णों का कब्जा है। समझे बुधनमा। असल मामला तो यह है कि दलित और पिछड़े अपनी कमाई से अधिक दान करते रहते हैं जीवन भर।

उ कैसे नवल भाई। जब कमाई ही नहीं होगी तो कोई दान कैसे करेगा। आप भी न एकदम हमको नीतीशे कुमार समझे हैं।

सही बोल रहे हैं बुधनमा। अब देखो न कि देश भर में दस गो मंदिर के पास इतनी संपत्ति है कि यदि सरकार उसको अपने नियंत्रण में ले ले और उसका उपयोग कर ले तो कम से कम 50 प्रतिशत भूमिहीनों को जमीन मिल जाएगी। यदि सरकार मंदिरों की संपत्ति के साथ मस्जिद और गिरजाघरों की संपत्ति का भी राष्ट्रीयकरण कर दे तो देश में कोई भूमिहीन नहीं रहेगा। सरकार यदि स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश कर दे तो हर प्रखंड में एक ठीकठाक अस्पताल खुल जाय। शिक्षा के क्षेत्र में खर्चा हो तो हर तीसरे गांव पर एक अमेरिका टाइप स्कूल बन जाय।

अरे बाप रे। इतना पैसा है इ सब मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों के पास? एतना पैसा आता कहां से है?

आएगा कहां से। सब दान में देता है। जितना जिसकी श्रद्धा, उतना दान। अब तो सरकारें भी दान देती हैं। बिहारे सरकार पिछले पांच वर्षों में मंदिरों के लिए करीब 288 करोड रुपए दान में दे चुकी है। इसके अलावा भी इ मंदिर सबके अपना इनकम है।

इनकम कैसन? भीख या दान कहिए।

ठीक कह रहे हो बुधमना। लेकिन तुम जिसको भीख या दान कहते हो सवर्णों के लिए वह कमाई है। बिना पूंजी के शुद्ध कमाई। चलो हम तुमको समझाते हैं। जे है से कि पटना के महावीर मंदिर तो गये ही होगे तुम। एकदम पटना जंक्शन के सामने।

हां देखे हैं। ओही न जिसका निर्माण कोई एसपी कुणाल करवाया था। सुने हैं कि वहां पहिले एगो छोटा मंदिर था।

सही पकड़े तुम। किशोर कुणाल आजकल आचार्य हो गए हैं। एगो बड़का निजी स्कूल के मालिक तो हैं ही और पूरे बिहार के मंदिर-मठों के मालिक भी। खैर छोड़ो, कौन क्या हो गया और कौन क्या नहीं है, इ बहस तो खूब लंबा हो जाएगा। तो हम तुमको बता रहे थे कि महावीर मंदिर की कमाई क्या है। जानते हो 2017-2018 में महावीर मंदिर का बजट 225 करोड़ रुपए का था। इसमें 214 करोड़ रुपए तो उसकी कमाई का आकलन किया गया था और शेष 11 करोड़ के लिए बैंक से लोन लिया गया।

आयं। भगवानो के लोन देता है बैंक? हमनी के लोन देवे में तो…

हां सही कह रहे हैं बुधनमा। देखे नहीं हो तो जाकर देख आओ। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का बोर्ड टांगा है वहां।

अच्छा नवल भाई। आपने कमाई की बात कही। मंदिर की कमाई तो भीख वाले बक्सा में डाले गए सिक्के और नोट ही हो सकते हैं।

धत्त। ऐसा थोड़े है। जो भीख में मिलते हैं, उसका कोई हिसाब-किताब थोड़े न होता है। उ सब तो गंगा जी के अंडा में जाता है। असल कमाई तो दूसरी है।

त का सब वहां जेतना पुजारी सब रहता है, दू नंबर का धंधा करता है का?

नहीं बुधनमा। आजकल सब एक नंबर से काम होता है। मेनू तय हो गया है। सब चीज का।

मतलब? मंदिर है कि कोई बीयर बार जो कि मेनू होगा?

बुधनमा जादे मत बोलो न तो कोई ठोक देवेगा केस कि मंदिर को बीयर बार बोलता है। लेकिन इ सच है। महावीर मंदिर के एगो वेबसाइट है। वहां सब लिखा है। ध्वजारोहण के 1500 रुपए। बजरंग बली को लड्डू खिलावे के 1101 रुपैया। आउर जानते हो रामनवमी के दिन बजरंग बली 5500 रुपया से एको आना कम में मुंह नहीं खोलते हैं। पहले पैसा फिर लड्डू उनके मुंह में समाएगा। समझे?

अरे बाप रे।

यार बुधनमा तुम तो एकदम नीतीशे कुमार हो। सब कर्मकांड है। कर्मकांड करोगे तो फीस नहीं दोगे? वहां जो पंडित है जिसका कनेक्शन है भगवान से उ तुम्हारा पैरवी मंगनी के करेगा? वकील सब को नहीं देखते हो।

सब कर्मकांड के रेट है भाई। मंगलवार के अखंड ज्योति के 501 रुपए और शनिवार के दिन 351 रुपए और बाकी दिन 251 रुपए। एतना ही नहीं महावीर मंदिर में साधु सेवा का भी पैसा लगता है। इसके लिए 501 रुपए खर्च करने पड़ते हैं लोगों को। तब जाकर होती है साधु सेवा। दरिद्रनारायण भोज के लिए बजरंग बली 2100 रुपए चार्ज करता है।

से ही हम कहें कि इ मंदिर दिन पर दिन एतना भव्य कैसे हो रहा है। जाए दिजीए। बगल वाला जामा मस्जिद से तो उंचा हो गया न अपना महावीर मंदिर। हिंदू सबके शान उंचा रहे। बाकी हमनी के दलित-पिछड़ा सब कर्मकांड करें तो भी ठीक और न करें तो भी ठीक। कौन बजरंग बली हमलोग के खाएला दे देता है।

यार बुधनमा। तुम समझते काहे नहीं हो। हिंदू धर्म ही भारत के विकास में सबसे बड़ा बाधक है। इसे डायनामाइट से उड़ा देना चाहिए। यह डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का विनाश) में कहा था। तुम तो अच्छे इंसान हो बुधनमा। धर्म वही जो इंसान को इंसान बनाए। वह धर्म ही क्या जो नफरत फैलाए। हिंदू धर्म से बढ़िया तो हमनी के दोस्ती है। है कि नहीं?






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