बाजार में चाय की ‘औकात’ बढ़ी

वीरेंद्र यादव
पटना के विकास भवन के पास ‘चाय बाजार’ है। साथ में नाश्ता-पानी भी मिलता है। चाय बाजार में चाय पर चर्चा भी खूब होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चाय की ‘औकात’ बढ़ा दी है। पहले कॉफी हाउस में सरकार बनती व गिरती थी। इसके लिए प्रेस क्लब भी उपयुक्त जगह मानी जाती थी। विधान सभा के प्रेस रूम में भी सरकार के भविष्य पर खूब मंथन होता है। लेकिन चाय बाजार में सरकार के बनाने और बिगाड़ने का अपना ही आनंद है।
आज हम भी चाय बाजार में काफी देर तक सरकार के भविष्य पर माथापच्ची करते रहे। साथ में थे एडीआर के राजीव कुमार और पिछले चुनाव में एक पार्टी के वार रुम के मजबूत बांह रहे संतोष कुमार। तीनों व्यक्ति के लिए राजनीति का अपना-अपना अर्थ है। हमारे लिए राजनीति बाजार है। राजीव कुमार के लिए राजनीति भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को जागरूक करने का अभियान है तो संतोष कुमार के लिए राजनीति चुनाव लड़ने वालों के लिए सपोर्ट टीम है। इससे हटकर हम लोगों ने राजनीति के जनसरोकार के मुद्दे पर चर्चा की।
चुनाव में हार या जीत में राजनीति का सिमट जाना सबसे बड़ा खतरा है। राजनीति एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। लेकिन इसका ‘पोलिटिकल इवेंट’ बन जाना खतरनाक है। पार्टियों के ताकतवर बनने और सांसद या विधायकों का अपाहिज हो जाना चिंता का विषय है। एडीआर लगातार अपने अभियान और प्रयासों से राजनीति को पवित्र बनाये रखने का प्रयास कर रहा है। लेकिन इस प्रक्रिया की कमजोरियों को लेकर भी सचेत है। चुनाव में उम्मीदवारों के आपराधिक चरित्र के सार्वजनिक करने की नयी व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय ने की है। छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव के संबंध में बताया गया कि पार्टियों ने काफी छोटे फांट में ऐसे विज्ञापन प्रकाशित करवाये, जिसे पढ़ना भी मुश्किल था। वार रुम वाले संतोष कुमार ने बताया कि विधान सभा चुनाव में फेजवार पार्टी अपनी रणनीति बदलती रही और वोटर की जातीय बहुलता के आधार पर भी नेताओं के प्रोग्राम लगाए जाते रहे।
चाय बाजार में हर कुर्सी, बेंच और टेबुल पर सरकार बनाने-बिगाड़ने के साथ विभागों में कमीशनखोरी से लेकर परेशानियों पर भी खूब मंथन होता है। चाय बाजार में चूल्हा जलने से बुझने तक जनता, सरकार, भ्रष्टाचार पर चर्चा होती रहती है और यह सिलसिला हर दिन जारी रहता है।
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