केरल से आईं सिस्टर जंगल में संवार रहीं बच्चियों की किस्मत

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सुजीत कुमार वर्मा

बिहारशरीफ. केरल से आईं सिस्टर रोज राजगीर के जंगल में रह कर दलित, महादलित और विकलांग बच्चियों की किस्मत संवार रही हैं। सड़क से करीब तीन किलोमीटर अंदर घने जंगल में पहाड़ की तलहटी में 2001 में उन्होंने चेतनालय नामक संस्था की नींव रखी थी। तब ए जंगल नक्सलियों की पनाहगाह था। आज भी जंगल में नक्सलियों के रहने की बात कही जाती है। शुरुआत में हसनपुर गांव की पांच बच्चियों को इन्होंने अपने साथ रखा था और आज यहां डेढ़ सौ से भी अधिक बच्चियां रह रही हैं, जिनमें 105 बच्चियां मुसहर समाज की हैं। इन बच्चियों में 26 विकलांग हैं। इन बच्चियों को रहने-खाने से लेकर पढ़ाई, किताब, कॉपी, कपड़े जैसी सारी आवश्यक जरूरतें सिस्टर रोज पूरा कर रही है। यही नहीं विकलांग बच्चियों का इलाज से लेकर, कृत्रिम अंग और उपकरण तक की व्यवस्था सिस्टर रोज करती हैं।
इनके यहां रह कर पढ़ाई कर रही 57 बच्चियां मैट्रिक पास कर यहां से निकल चुकी हैं। यहां से जाने के बाद भी 24 विकलांग बच्चियों ने आगे की पढ़ाई जारी रखने की इच्छा व्यक्त की थी, जिनका खर्च सिस्टर रोज ही उठा रही हैं। यह सब व्यवस्था उन्होंने अपने दम पर किया है। समाजसेवी लोगों की मदद के बल पर ए ऐसा कर पा रही हैं। आश्रम तक जाने के लिए एक पतली सी कच्ची पगडंडी है। सिस्टर रोज बताती हैं कि कई बार अपराधियों ने उनके संस्थान पर धावा बोला है। वे बताती हैं कि 2000 में वे यहां आई थीं। मोकामा में नर्सिंग के दौरान उन्होंने खास कर विकलांग और वंचित समाज की बच्चियों की परेशानी को महसूस किया था और इनके लिए कुछ करने का जज्बा लेकर यहां आई थीं। 2001 में संस्था की शुरूआत की। उस समय न रास्ता था और न ही बिजली। तीन-चार साल तो लालटेन की रौशनी से ही काम चलाना पड़ा। कई बार डकैतियां हुई । यहां तक की उन पर भी जानलेवा हमला हुआ। रंगदारी की मांग की गई। शुरुआती दौर में इन्होंने विकलांग और गरीब दलित परिवार की बच्चियों को पढ़ा, लिखा कर पैर पर खड़ा करने की दिशा में काम शुरू किया था, लेकिन अब इन्होंने मुसहर समाज की कम से कम 5 सौ बच्चियों को पढ़ा-लिखा कर अपने पैर पर खड़ा करने का संकल्प लिया है। पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था के अलावा ए लड़कियों के रोजगार की व्यवस्था करती हैं। इन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण दिलवाती हैं। प्रिया मांझी सहित कई ऐसी बच्चियां हैं, जो इनकी संस्थान में ही कार्यरत हैं। सिस्टर सरोज का कहना है कि समाज कल्याण के लिए मैंने यह बीड़ा उठाया था। मेरी पहल से लड़कियां अपने जीवन में कामयाब बनें, यही मेरे जीवन का लक्ष्य है। इसके लिए मरते दम तक प्रयास करूंगी।






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