अब सीवान, अरवल, गोरखपुर जैसे शहरों से कोई पत्रकार कैसे बनेगा?

बिहार के अरवल में राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार पंकज मिश्रा को आज गोली मार दी गई। एक अपराधी गिरफ्तार भी हुआ है। एसपी ने तुरंत कारण भी पता कर लिया। बोले कि निजी दुश्मनी में ऐसा किया गया…। पंकज को गोली विधायक के पीए के बेटे ने मारी है। इसके बाद भी कारण यह नहीं कि सामने वाला उनकी लेखनी से डर गया था, या उन्हें चुप कराने की नीयत थी। यह न फासीवाद है, न लोकतंत्र की हत्या है, यह थानों में दर्ज तमाम एफआईआर में एक और एफआईआर का जुड़ जाना भर है। घटना में सत्ता से जुड़े लोगों के सीधे तौर पर शामिल होने के बाद भी यह निजी दुश्मनी में अंजाम दी गई एक आम घटना है और ऐसी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। जी हां, जब भी छोटे शहरों में किसी पत्रकार को गोली लगती है तो कारण उनकी निजी दुश्मनी ही होता है…!

अब सीवान, अरवल, गोरखपुर जैसे शहरों में होकर भी कोई पत्रकार कैसे हो सकता है? उसमें भी पंकज, जो न संघी, न वामपंथी, सिर्फ पत्रकार तो ऐसों के लिए कोई क्यों उठाए आवाज? बहुत दिन नहीं हुए इसलिए घटना काफी लोगों को याद होगी। गोरखपुर क्षेत्र में एक पत्रकार को जिंदा फूंक दिया गया था। शिकायत एक मंत्री के खिलाफ थी। ‘हत्या’ के पहले पोस्ट में पत्रकार ने अपनी हत्या की आशंका तक जताई थी लेकिन किसी ने यकीन नहीं किया। कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। किसी ने पत्रकार के लिए, इंसाफ के लिए कोई आवाज नहीं उठाई। अब क्या कीजिएगा भाई? कोई आवाज उठाए भी क्यों? पत्रकार तो सिर्फ दिल्ली टाइप बड़े शहरों में केबिन में बैठने वाले होते हैं, छोटी जगहों पर फील्ड में संघर्ष करने वाले पत्रकार थोड़ी ना होते हैं, वे तो सिर्फ ‘प्रतिनिधि’ होते हैं…!

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(मृत्युंजय त्रिपाठी के फेसबुक टाइमलाइन से ज्यो का त्यो साभार)






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