कांग्रेस-लालू युक्त विपक्षी एकता के सशक्त मंच की उम्मीद कहां है?

विष्णुगुप्त (वरिष्ठ पत्रकार)
प्रश्न यह नहीं कि पटना में लालू की बहुचर्चित रैली सफल थी या असफल थी? प्रश्न यह है कि उस बहुचर्चित रैली का राजनीतिक संदेश क्या था? क्या यह रैली नरेन्द्र मोदी विरोधी एक सशक्त राजनीतिक मंच तैयार करने में कामयाब हुई है?लालू की रैली का संदेश देश में मोदी के खिलाफ एक सशक्त मंच तैयार करना और 2019 के लोकसभा चुनावों में मोदी को हराना है। रैली में कांग्रेस, कम्युनिस्ट सहित ममता बनर्जी और अखिलेश यादव की उपस्थिति जरूर रही है पर मायावती की अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि अभी विपक्षी एकता को बहुत दूरी तय करनी होगी और नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक सशक्त मंच बनाने के पूर्व कई राजनीतिक विसंगतियों को दूर करना होगा, कई अहंकार भरी राजनीतिक मानसिकताओं को समाप्त करना होगा। सबसे बडी बात यह है कि नरेन्द्र मोदी विपक्षी एकता मंच का अगुआयी कौन करेगा? लालू प्रसाद यादव भ्रष्टचार के प्रश्न पर सजायाफ्ता हैं, उनके बेटों पर भी भ्रष्टचार के आरोप हैं, शरद यादव की राष्ट्रव्यापी छवि नहीं है और न ही उनके गुट का किसी भी एक प्रदेश में कोई खास जनाधार है। रही बात कम्युनिस्टों की तो इनकी कोई खास सक्रियता या फिर चुनावी सफलता के केन्द्र में ये हैं ही नहीं। राहुल गांधी खुद कांग्रेस का सफल नेतृत्व नहीं कर सके तो विपक्षी एकता मंच का नेतृत्व कैसे कर सकते हैं, खुद उनकी कांग्रेस के अंदर में जगहसांई होती रही है। ममता बनर्जी को कम्युनिस्ट नेता मानेंगे नहीं। नवीन पटनायक जैसे पूरोधा न तो मोदी के साथ है और न ही मोदी विरोधी मंच में खडे होने वाले हैं। बिहार में भी यह बात फैली हुई है कि यह मोदी विरोधी रैली न होकर लालू की भ्रष्टाचार को दबाने वाली रैली थी। यानी कि लालू अपनी भ्रष्टाचार की कहानी को दबाने के लिए यह रैली आयेाजित की थी। सही भी यही है कि लालू अपने और अपने परिवार पर लगे भ्रष्टचार के आरोपों के घेरे में हैं और इनके परिवार पर कानूनी मार की उम्मीद है, इसीलिए लालू रैली के माध्यम से नरेन्द्र मोदी विरोधी रैली का आयोजन कर एक राजनीतिक ढाल खडा करने की कोशिश में हैं। विपक्ष के पास तब कौन सा तर्क होगा जब लालू और उनका परिवार सजायाफ्ता के तौर पर सामने होगे।(वरिष्ठ पत्रकार विष्णुगुप्त के फेसबुक टाइमलाइन से साभार)






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