बिहार के लेनिन नहीं, फुले-आंबेडकर थे जगदेव प्रसाद कुशवाहा

मनीष कुमार चाँद

बहुजन समाज में पैदा हुए जाति से कोइरी (कुशवाहा) महामानव जगदेव प्रसाद जिंदगी भर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के सामाजिक और आर्थिक जकडबंदी से सदियों से पीड़ित शोषित बहुजन समाज को मुक्त करने के लिए संघर्ष करते रहे .उन्होंने तेईस वर्ष की उम्र में जब मैट्रिक की परीक्षा फर्स्ट डिविजन से उतीर्ण की थी तो उनके परिवार, समाज के लिए यह गर्व का विषय था. उनके पिता का असामयिक निधन हो चुका था. वे मध्य विद्यालय के शिक्षक थे .श्राद्ध कराने वाला ब्राह्मण आकर बोल दिया कि उनकी असमय मृत्यु में जगदेव प्रसाद का ही दोष है क्योंकि वे अपनी जातिगत पेशा सब्जी उगाना छोड़कर पढने का काम करने लगे हैं. पढ़े-लिखे जगदेव प्रसाद को उस ब्राह्मण की बात नागवार गुजरी और उन्होंने अपने दादाजी के समक्ष अपना विद्रोह दर्ज कराया और उनके उनके पिता जी का श्राद्ध ब्राह्मण द्वारा नहीं कराया गया बल्कि समाज के लोग इक्कट्ठे होकर केवल शोकसभा का आयोजन कर श्राद्ध कर्म किए. यह एक क्रन्तिकारी कदम था.

इकोनॉमिक्स में मास्टर डिग्री लेने के बाद वे समाजवादी नेता उपेन्द्र नाथ के संपर्क में आये. उन्हें सोशलिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘जनता’ में संपादन का कार्यभार सौंपा गया. बाद में उन्हें हैदराबाद भेज दिया गया. वहां उन्होंने पार्टी के मुखपत्र के अंग्रेजी वर्जन ‘सिटिजन’ का संपादन किया. 1957 में उन्हें विक्रमगंज लोकसभा का पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया .मगर वे चुनाव हार गए. 1962 में बिहार विधानसभा का चुनाव कुर्था से लड़े फिर चुनाव हार गए. 1967 में कुर्था विधनासभा से चुनाव जीत गए. 1969 में फिर मध्यावधि चुनाव हुए और वे भारी मतों से जीते. उनकी पार्टी शोषित समाज दल ने भी छः सीटें जीती. सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने जयप्रकाश आन्दोलन का कभी समर्थ नहीं किया. इस आन्दोलन के बारे में उनका यह कहना था हालांकि यह आन्दोलन सही मुद्दों को लेकर चल रहा है लेकिन नेतृत्व गलत लोगों के हाथ में है. जयप्रकाश आन्दोलन की नियति वे पहले ही पहचान गए थे क्योंकि यह आन्दोलन बहुजन समाज में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ उपजे आक्रोश को कैश कर रहा था. इसलिए उन्होंने इस आन्दोलन से अपनी दूरी बनाए रखी और नब्बे प्रतिशत शोषित जनता को गोलबंद कर ब्राह्मणवाद /जातिवाद /सामंतवाद के खिलाफ संघर्ष करते रहे. उन्होंने अपने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व रामनोहर लोहिया के भी खिलाफ आवाज बुलंद किया और नब्बे प्रतिशत शोषित शूद्र/बहुजन समाज के लिए अलग पार्टी का गठन किया शोषित समाज दल. अगर हम शोषित =बहुजन कर दें और दल=पार्टी तो बहुजन समाज पार्टी, शोषित समाज दल की छाया प्रति हो जाएगी. भोजपुर के मास्टर जगदीश, जो भोजपुर के नक्सल आन्दोलन के रचयिता थे, उनसे घनिष्ठ रूप से जुड़े थे. मास्टर जगदीश ने ‘हरिजनिस्तान’ की मांग को लेकर आरा की गलियों में मशाल जुलुस निकाला था . उनकी असामयिक मृत्यु से हमे यह निश्चित करने हमेशा दुविधा हो सकती है कि वे बाबासाहब डॉ. आंबेडकर से कितने प्रभावित थे. लेकिन इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वह बाबा साहब डॉ आंबेडकर से प्रभावित थे. इसका सबूत यह है कि उस समय जब उत्तर भारत बाबासाहब से बिलकुल अनजान था तब जगदेव प्रसाद ने अपने अंतिम सात सूत्री मांगों में दो मांगें यह भी राखी थी :
बिहार के सभी पुस्तकालयों में और सभी दलित छात्रवासों में डॉ आंबेडकर की पुस्तकों को उपलब्ध कराया जाय . सभी मतदाताओं को फोटोयुक्त मतदाता पहचान पात्र उपलब्ध कराया जाय. लेकिन उस समय मनुवादी-सामन्तवादी बहुत मजबूती से सत्ता तंत्र पर अपनी पकड़ बनाए हुए थे. मनुवादी सामंती ताकतों ने जगदेव बाबू की हत्या की साजिश रच दिया.

5 सितम्बर 1974 का दिन था. कुर्था ब्लाक पर आम सभा चल रही थी. भीड़ तक़रीबन बीस पच्चीस हज़ार की रही होगी. साजिश करनेवाले भी भीड़ में ही शामिल थे. जिस तरह ‘बाली’ की पहचान के लिए माला पहनाई गयी थी उसी तरह कहा जाता है की जगदेव प्रसाद को खास मालाओं से लाद दिया गया जिससे भीड़ में पहचान आसान हो जाय. शरारती तत्वों ने पुलिस पर पत्थर बाजी किया. बदले में पुलिस को फायरिंग करना था. राइफलधारी पुलिस ने पहली गोली मारा जो एक दलित युवक को लगा और ऑनस्पॉट उसकी मौत हो गई. दूसरी गोली जगदेव प्रसाद के गर्दन में लगी और वे गिर गए. पुलिस वालों ने उनकी छाती को बूटों से रौंदा, बन्दूक के बट से मारा. जब लोग उन्हें छुड़ाकर अपने जीप से अस्पताल ले जाने लगे तो उनसे उन्हें छीन लिया गया और उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाया गया. इस तरह एक पूर्व मंत्री और विधायक को पुलिस रौंद रही थी. उन्हें पलामू के घने जंगलो में ले जाकर फेंक देने की योजना थी. लेकिन तत्कालीन बीपी मंडल, रामलखन सिंह यादव, भोला प्रसाद यादव, दरोगा प्रसाद राय ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफ्फार पर दबाव बनाया. उनके शव को 6 सितम्बर 1974 को पटना लाया गया और 7 सितम्बर को लाखो लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी. आज लोग फिर एक जगदेव प्रसाद की बाट जोह रहे हैं जो बिहार के मनुवादी-सामंतवादी व्यवस्था में अंतिम कील ठोंक दे. (मनीष कुमार चाँद प्रख्यात श्रमण चिन्तक एवं लेखक हैं.)






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