फिर कमजोर टीम के भरोसे मोदी की मजबूत सरकार

Pushya Mitra

तीन साल तक देश की सबसे चर्चित (विवादित भी) सरकार चला चुके मोदी आज अपनी टीम में आखिरी फेरबदल करने जा रहे हैं। वैसे तो अपनी इच्छा की टीम बनाना हर प्रधानमंत्री का संवैधानिक अधिकार है, इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। मगर टीका टिप्पणी तो की ही जा सकती है। क्योंकि इस टीम के साथी उनके स्लॉग ओवर के सहयोगी होंगे। इनके ही ताबड़तोड़ कामकाज के बदले वे 2019 में या जैसा कि कहा जा रहा है, इससे पहले ही चुनाव मैदान में उतरेंगे।

वैसे तो विपक्ष विहीन चुनावी जंग में उनके विरोधी भी मन ही मन मान चुके हैं कि 2019 मोदी का ही है। मगर जब भी कभी इतिहास में मोदी के इस कार्यकाल की समीक्षा होगी तो क्या कुछ लिखा जाएगा वह इसी टीम के कामकाज पर निर्भर करेगा। क्योंकि आज की तारीख तक मोदी सरकार की उपलब्धियों के बारे में मुझसे पूछा जाए तो मुझे गिनाने लायक बहुत महत्वपूर्ण कोई बात नहीं मिलती। खास कर ऐसी बात जिससे आम जनता को राहत की सांस लेने का मौका मिला हो।

महंगाई और भ्रष्टाचार को खत्म करने के नारे के साथ यह सरकार अस्तित्व में आई थी। महंगाई बढ़ी ही है और भ्रष्टाचार में भी कोई कमी नजर नहीं आती। काला धन पर लगाम लगा या नहीं यह साबित नहीं हुआ है। वैसे भी आम लोगों को इससे बस मानसिक संतोष ही हो सकता है। रोजगार के अवसरों में कमी ही आयी है। किसानी का संकट भी और गहरा हुआ है। फसल बीमा योजना को ठीक से लागू नहीं किया जा सका है। अगर यह हुआ होता तो आज बिहार के बाढ़ पीड़ित किसान पलायन की तैयारी नहीं कर रहे होते।

शौचालय निर्माण की योजना भी गरीबों को ही परेशान करने वाली है। रेलवे ने ऐसे फैसले लिये जिससे रेल यात्रा की तकलीफें बढ़ती चली गयी। हां, विदेश मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय ने कुछ बेहतरीन काम किये हैं। मगर इससे लोगों के जीवन में कुछ खास फर्क नहीं पड़ा है।

मनमोहन सिंह सरकार की नाकामियों का ढिंढोरा पीट कर सत्ता में आई यह सरकार कुल मिलाकर उसी की नीतियों को अधिक क्रूरता के साथ आगे बढ़ा रही है। और यह नीति है, कारपोरेट को फलने-फूलने के बेहतर अवसर प्रदान करना। चुकी मनमोहन सरकार के पास जनसमर्थन नहीं था, तो उनमें ऐसे जनविरोधी फैसले लेने की हिम्मत नहीं थी। मोदी सरकार अपने अंध समर्थकों की पीठ पर सवार है, तो यह खुल कर सब्सिडी खत्म करने, किराया बढ़ाने, श्रम कानून को मजदूर विरोधी बनाने जैसे फैसले ले पा रही है।

मगर फिर भी यह सरकार असफल है, क्योंकि यह अब तक ऐसा पब्लिक परसेप्शन भी नहीं बना पा रही कि सरकार जन समर्थक काम भी करती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मोदी की टीम बहुत कमजोर है। उनके पास न एक अच्छा वित्त मंत्री है, न रक्षा मंत्री, रेल मंत्री तो फेल हो ही चुके हैं। यह तीन सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का हाल है। वजह यह भी है कि अच्छे और कारगर लोग टीम मोदी का हिस्सा भी नहीं बनना चाहते।

मोदी समर्थकों से माफी मांगते हुए कहना चाहूंगा कि ऐसा इसलिये है कि वे अच्छे टीम लीडर नहीं है। वे सक्षम से सक्षम व्यक्ति को अपनी मर्जी से काम करने नहीं देते। इसी वजह से कई प्रतिभाशाली लोग उनकी टीम छोड़ कर जा चुके हैं। जो हैं, वे बुझे बुझे हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है, उनके किसी काम का क्रेडिट उन्हें मिलने वाला नहीं, हां असफलता का ठीकरा उनके सर पर फोड़ा जाएगा। मोदी ऐसे टीम लीडर हैं कि बजट के बाद वित्तमंत्री के बदले खुद ही बयान जारी करते हैं। विदेश मंत्री का काम खुद कर रहे हैं, दुनिया भर में घूम घूम कर। वे एक ऐसे कप्तान हैं, जिसे लगता है कि वे बोलिंग भी खुद कर सकते हैं और अपनी बोलिंग पर कीपिंग भी खुद कर सकते हैं और थर्ड मैन बाउंड्री पर जाकर कैच भी ले सकते हैं।

वे बिल्कुल अर्णब की तरह हैं, जो रोज शाम प्राइम टाइम डिबेट में एक दर्जन लोगों को बुलाते हैं और किसी को बोलने नहीं देते। अकेले ही सबकुछ कह डालते हैं। एक टीम लीडर कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, यह उसकी सबसे बड़ी खामी मानी जाती है। अच्छा टीम लीडर अटल बिहारी बाजपेयी जैसा होता है, जो एक बेहतर टीम बनाता है और फिर अपनी टीम के साथियों पर सब कुछ छोड़ देता है। उसके कामकाज का क्रेडिट उसी को देता है और असफ़लता में उसके साथ खड़ा हो जाता है। इसी वजह से एक लचर गठबंधन की सरकार चलाने के बावजूद उनके कार्यकाल को आज भी सफल माना जाता है।

खैर, मोदी ऐसे ही हैं। इसलिये उनकी टीम में कमजोर लोगों की भरमार दिखती है। जो सिर्फ यस-यस कहते रहें। सारा काम पीएमओ के निर्देशन में हो। यह नई टीम भी कमोबेस उसी का प्रतिरूप है। इसलिये किसी भी नाम में कोई उम्मीद नहीं। खट्टर और फड़नवीस जैसे गुमनाम चेहरे हैं, जो सफल हुए तो मोदी की जय जय। नाकाम रहे तो खट्टर की तरह गालियां सुनेंगे।

मुमकिन है, तबाही की कगार पर पहुंच गए विपक्ष की वजह से 2019 जीतना मोदी के लिये बहुत आसान हो। मगर 50 साल बाद ही सही, जब मोदी के कामकाज की व्याख्या होगी तो क्या गिनाया जाएगा यह भी मोदी को ही सोचना पड़ेगा। फिलहाल तो नई टीम निराश ही कर रही है।






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