बिहार : पलायन का दर्द न जाने कोय! है कोई जवाब किसी के पास ???

अजित कुमार तिवारी
पलायन का दर्द क्या होता है उससे पूछो जो अपना घर-परिवार छोड़ कर हजार दो हजार किलोमीटर दूर तिनका-तिनका पाई-पाई जोड़ रहा है, कदम-कदम पर लोकल लोगों के ताने सुन रहा है, रोजगार शिक्षा या चिकित्सा के लिए दर-दर भटक रहा है, अपनी मेहनत के बल पर अपना पेट भरता है फिर भी उपहास का पात्र बना हुआ है, सिने पर हमेसा अपमान का पहाड़ ढो रहा है कराहते हुए सिर्फ इसलीये की आजादी के 70 वर्षों के बाद भी हम बिहार मे एक भी गुडगाँव, बंगलौर या कम से कम नॉएडा जैसा रोजगार देने वाला सहर नहीं बना सके, इतने बड़े राज्य में ढंग के दो-चार इंजीनियरिंग मेडिकल कॉलेज नहीं बना पाए, एम्स जैसे एक-दो बड़े हास्पिटल नहीं बना पाए, यदि ये सब किये होते तो आज दर-दर की ठोकरें नहीं खाते अन्य राज्यों में और अपमान का घूंट पीकर नहीं जीते लाखों-करोड़ो बिहारी सपूत वैसे और क्या कमी थी हमारे गौरवशाली बिहार में?

इसका सबसे बड़ा कारण है राजनितिक इक्षा शक्ति की कमी, भारत के सभी राज्य एक ही साथ आजाद हुए थे, बिहार में समुन्द्र का किनारा नहीं होना पिछड़ेपन के कारण का पैमाना नहीं हो सकता. राजनितिक इक्षा शक्ति हो तो फिर कोई कमी आड़े नहीं आती है. और इस घटिया राजनीती के लिए जनता भी उतना ही जिम्मेदार है जो आजादी के 70 वर्षों के बाद भी जातिवाद से ऊपर नहीं उठ पाई है, वार्ड से लेकर मुख्यमंत्री तक सब अपनी जाती का ही चाहिए सभी को विकास जाये भाड में, जबकि हर घर में चार में तिन पलायन के शिकार हुए है, जब प्रवासियों पर हमले किये जाते है तो वहा जाती नहीं पूछी जाती है, फिर भी समझ नहीं आ रहा है की कब तक दुसरे राज्यों में दो वक्त की रोटी के लिए भटकते रहेंगे और अपमानित होते रहेंगे. क्यों नहीं हम लोग विकास और रोजगार को प्राथमिकता देने वाला जन प्रतिनिधि चुनते है चाहे वो किसी भी जाती का हो???

एक अन्य अहम् कारण है की जितने भी बड़े-बड़े IAS/IPS अधिकारी या बिजनेशमैन हुए वो सब वही बस गए, भुल गए अपने मातृभूमि को और #मातृभूमि के कर्ज और फर्ज को, और तो और अपने को बिहारी कहने में भी शरमाते है, #बिहार में क्यों नहीं कुछ करते पुछने पर बोलते है की कौन जायेगा उस कचड़ा में…. क्या है वहा? वाह बेटा वाह, शाबास!!! जिस मिटटी में पैदा हुए जिसमे पले-बढे तुम और तुम्हारे पूर्वज…. जिस मिट्टी से तुम्हे पहचान मिली गौरव मिला वही मिट्टी साहब सेठ बनते ही अब कचड़ा बन गयी तुम्हारे लिए, चुल्लू भर पानी में डूब मरो. अगर कचड़ा मानते हो अपने घर को तो फिर साफ करने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी है, कोई दुसरे देश से नहीं आएगा साफ करने, खुद साफ करो और मिट्टी का कर्ज अदा करो, नाक-मुंह क्यों सिकोड़ रहे हो बेटा??

आखीर हम कब तक #पलायन की #प्रसव #पीड़ा झेलते रहेंगे है….आखीर कब तक…. है कोई जवाब किसी के पास ???
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अधिकतर प्रवासी बोलते है की क्यों जाएँ #बिहार में? क्या रखा है वहा? कुछ नहीं है वहा… वैगरह…वैगरह.

भाई आप जहा हो वही रहो कोई नहीं बुला रहा है आपको. आपके जैसे लाखों है प्रवासी जहा कमाए वही बस गए आप अकेले नहीं हो ऐसे. बाहर बैठे बैठे इंतजार करो, आसमान से कंपनी बरसंगे, फक्ट्रियां टपकेंगी, आईटी कोम्पनियों की बाढ़ आ जाएँगी, #अमेजन, #फ्लिप्कार्ट, #विप्रो, #इनफ़ोसिस घर घर से पिक एंड ड्राप करेंगे, हर गाँव-सहर में पांच सितारा होटल खुल जायेगा, हर सहर में हवाई अड्डा बन जायेगा… छपरा सिवान दरभंगा आरा बक्सर जब बंगलोर टोक्यो न्यूयार्क बन जायेगा तब आप जाना बिहार, अभी जाने की कोई जरुरत नहीं है, बैठे रहो हाथ पर हाथ धरे दुसरे राज्यों की मेहरबानी पर और इंतजार करो बिहार जापान बनने का पर खुद एक तिनका भी इधर से उधर मात करना तुम तो पांच साल पर कभी वोट देने भी नहीं जाते अच्छी सरकार बानाने के लिए तो फिर बिहार की आलोचना किस मुंह से करते हो? किस हक़ से जब की कोई योगदान नहीं है बिहार की कमी दूर करने में तुम्हारा ?
जैसा भी है….लव यू बिहार…लव यु भारत…

(अजित कुमार तिवारी गोपालगंज से हैं. दिन दिनों दिल्ली में आईटी इंजीनियर हैं] यह आलेख उनके फेसबुक पेज से ज्यो का त्यो साभार लिया गया है)






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