बिहार में परिवारिक प्यार और हिंसा पर रूला देने वाली हथुआ के सुधीर पांण्डेय की कविता आप भी पढ़िए..

इया ( दादी ) कहती है कि ,
बात तब की है
जब तुम यही कोई बारह – तेरह
महीने के थे
तुम्हारा चाचा जो कंधे पर बैठा कर
घुमाया करता था
तुम बाल नोंचते – नोचते मूत देते थे
उसके सीने से होकर धारा गुजरती थी
और ,
छींटे मुँह में भी चले जाते थे ,
उसे घिन नही आती थी ।
बड़े शान से कहता था की
मेरा बेटा है ।
उसे लोग तुम्हारे नूनू , लाला , काका के रूप में
जाना करते थे ।
उसकी पत्नी .. अरे ! तुम्हारी चाची को
यह लाड़ कभी भी सुहाता नही था ।
फिर भी अपने प्रिये से नजरे चुराता
तुम्हे जी भर के प्यार करता था
तुम्हारी छोटी सी भी जरूरतों को
पूरा करता था ।
पूरा परिवार एक मे था
लेकिन निकम्मा था तुम्हारा चाचा
तुम्हारी माँ भी निकम्मे से ईमानदारी दिखाती थी
तो वह शादी के पहले अधपेट हीं सो जाता था ।
और
तुम्हारे पिता , उसके बड़े भाई भी
अच्छा सहोदर होने का अभिनय कर लेते थे
क्योंकि ,
नायिका के गृहप्रवेश से यह गुण आ जाते है ।
जब उसकी नायिका .. मतलब तुम्हारी चाची आयी
तो ,
उसका भी पेट भरने लगा
अब एक घर मे दो जगह से धुआं निकलता था
डेहरी , बाखार और सब दो – दो हो गये थे ।
अब तुम जवान हो रहे थे
उसकी दाढ़ी पकने लगी थी
घर में लक्ष्मी आयी
तुम्हारी चचेरी बहना …
लेकिन
सोहर छठियार में तुम्हारे परिवार से कोई नही आया
तब तुम्हारे बाप के पैर पकड़ के रोने लगा था
वही चाचा …
और
छे दिन की नन्ही जान अंगना में रो रही थी ।
फिर , एक दिन ..
खेत के मेढ़ पर तुम्हारे पिता और चाचा की कहासुनी हो गयी
बात घर तक पहुँची ।
तुम्हारी माँ ने मातृऋण तुमसे माँगा
अब तुम्हारे लठ प्रहार से पीड़ित वही चाचा
थोड़े खून से भींगा
डरा सा धरा पर लंबवत पड़ा
अपने चिराग से बच नही पा रहा था
चाची दौड़ी .. गोदी में एक साल की तुम्हारी बहना
तीनो प्राणी तुम्हारे तेज में भस्म होने से
डर रहे थे ।
लेकिन ,
अब भी उसके आँखों मे
तुम्हारे लिए घृणा के भाव न थे !
उसे आस थी की ,
उसे जीवनदान मिलेगा ..
या तर्पण … या तर्पण …..

(सुधीर पाण्डेय हथुआ के नयागांव से हैं. इन दिनों दुबई में इंजीनियर हैं, यह कविता उनकी फेसबुक पेज से साभार ली गई है)






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