आखिर अखबारों में क्यों नहीं दिखती ग्राउंड रेपोर्टिंग !

पुष्यमित्र

नौ बज गये, अभी तक अखबार का बंडल बंधा पड़ा है। छुआ नहीं है। परसों तक सुबह सबसे पहले अखबार चेक करता था। सबसे पहले यह देखने कि अपने काम में कोई गलती तो नहीं रह गयी, दिन की मीटिंग में क्लास तो नहीं लगेगी। फिर यह देखने कि प्रतिद्वंद्वी अखबार ने किसी खबर में बढ़त तो नहीं ले ली है।

आज दोनों में से कोई काम नहीं है। इसलिये, अखबार देखने की कोई उत्कंठा नहीं है। इसके बावजूद कि आज शनिवार है और मैं भी फुल टाइम फुरसतिया हूँ। क्योंकि क्या छपा होगा यह मालूम है। यह भी मालूम है कि शायद ही कोई एकाध पीस ऐसा मिले जो पूरी खबर पढ़ने की उत्सुकता जगा पाये।

ऐसे में उनलोगों की बातें याद आ रही है, जो कहते थे, हमारे घर में चार चार अखबार आते हैं मगर अखबार का बंडल सिर्फ शनिवार और रविवार को खुलता है। वस्तुतः इन दिनों जब हम टीवी चैनलों के अतिरेक की बातचीत कर रहे हैं, हिंदी अखबारों का यही हाल है।

दुःखद है, हरेक प्रखंड में एक रिपोर्टर रखने के बावजूद हम हिंदी अखबार वाले ऐसा कोई करिश्मा नहीं कर पाते जिससे आम पाठकों के लिये अखबार पढ़ना जरूरी हो जाये। उसकी वजह यह है कि हम पूरी तरह पीआर एजेंटों की गिरफ्त में हैं। पूरे अखबार के न्यूज़ सेक्शन में आपको 80 फीसदी खबरें पीआर की मिलेंगी।

जी हां, सरकारी खबरें भी पीआर की खबरें ही हैं, क्योंकि वे अपने पीछे सरकारी विज्ञापनों की सौगात लाते हैं। बाकी बड़ी राजनीतिक पार्टियां जो समय समय पर थोक में विज्ञापन देती हैं। फिर शहर में होने वाले इवेंट्स। ये इवेंट्स भले विज्ञापन न ला पाएं, मगर हर शाम इनके लोग प्रेस रिलीज और फोटो लेकर अखबारों के दफ्तर में घूमते हैं। अब तो मेल और वाट्सएप पर भी रिलीज आने लगे हैं। पत्रकारों का काम सिर्फ कॉपी पेस्ट करना है और गिना देना है आज हमने इतनी खबरें लिखीं।

इसलिये आपको ज्यादातर अखबारों में एक जैसी हेडिंग और एक जैसे कंटेंट दिखेंगे। अखबारों में छपने वाली स्पेशल स्टोरीज भी आजकल पीआर वाले ही प्लांट कराते हैं, बड़े अधिकारी आईडिया देते हैं। जिनकी प्लांट की गई खबरें छप जाती हैं, वह अगले दिन अखबार की क्लिपिंग फेसबुक पर पोस्ट करता है और अखबार-पत्रकार को क्रांतिकारी बताता है।

इसलिये निगेटिव खबरे कम दिखती हैं। खोजी खबरें और ग्राउंड रिपोर्टिंग तो रेयर हो गयी हैं।

दिलचस्प है हमलोग सुबह की मीटिंग में यही चर्चा करते हैं कि फलां खबर में हम आगे हैं, फलां खबर हमसे मिस हो गयी। फलां खबर का हमारा ट्रीटमेंट अच्छा है, फलां खबर को हमने अंडरप्ले कर दिया। कुल मिलाकर हमलोग रोज सारे अखबार पढ़ते हैं और रोज दूसरों जैसा बनने की कोशिश करते हैं। हम कुल मिलाकर एक जैसा बनना चाहते हैं, एक ही राह पर चलते हैं।

अंग्रेजी में अगर चार अखबार हैं तो चारों का टेस्ट अलग है। टाइम्स ऑफ इंडिया और टेलग्राफ बिल्कुल अलग अखबार है, हिन्दू और इंडियन एक्सपेस में कोई समानता नहीं है। यहां तक कि TOI और HT भी एक जैसे नहीं हैं। इनका पहला पन्ना भी एक जैसा नहीं होता। मगर हिंदी के चार अखबार एक साथ बिछा लीजिये। कई रोज बिल्कुल एक जैसे लगेंगे। हेडिंग तक मिल जाएंगी। अंदर की खबरों में भी यही हाल होगा। फोटोग्राफ तक एक ही एंगल से ली जा रही हैं।

आजकल दो दो फ्रंट पेज छापने का फैशन शुरू हुआ है। वह भी हर अखबार करने लगे हैं। पटना में पहला फ्रंट पेज मोदी जी को समर्पित रहता है, मतलब उनको खुश करने वाली खबरें रहती हैं। दूसरे पर नीतीश जी की चापलूसी। दोनों को साधना है। बाकी अखबार बेचने के लिये तो बाल्टी, मग, कैसरोल, डब्बे हैं ही। लिहाजा अखबार तो बिक रहे हैं, उनका बंडल नहीं खुल रहा।

दिलचस्प है कि इसकी फिक्र अब विज्ञापनदाताओं को भी होने लगी है, जो अखबारों के जजमान हैं। आदित्य विजन जब एक पन्ने का विज्ञापन देता है तो उसे दिन भर में 20-25 फोन कॉल आते हैं। वे भी बिक्री में कन्वर्ट नहीं होते, क्योंकि उनमें से दस फर्जी कॉल तो अखबारों के कस्टमर केयर वाले करते हैं।

स्थिति विकट है। अखबार वाले अब विज्ञापन छाप कर पाठकों को एसएमएस कर रहे हैं, आप घर खरीदना चाह रहे हैं तो फलां पेज पर विज्ञापन छपा है। अब अखबारी दुनिया की कितनी बातें बताऊँ। विशेष जानकारी के लिये मेरा उपन्यास भुतखेला टाइम्स पढ़िये।😀 अमेजन किंडल पर मिलेगा।






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