कामसूत्र के देश में मीटू

पुष्यमित्र
इस बार मीटू अभियान चल निकला और असर दिखाने लगा है. सवाल कई कथित रूप से समझदार लोगों के दागदार होने का नहीं है. मसला यह है कि लोग अब समझने और सचेत होने लगे हैं कि स्त्रियों के मामले में उनकी हद क्या है. यह अभियान उसी हद को अपने तरीके से परिभाषित कर रहा है.

दुखद तथ्य यह है कि भारत जैसे देश में जहां दो हजार साल पहले ही कामसूत्र लिखा चला गया था, वहां यह सब हो रहा है. लोग इतने अनाड़ी हैं कि ठीक से प्रणय निवेदन भी नहीं कर पाते और इनकार के बावजूद जबरदस्ती करने पर लगे रहते हैं. कामसूत्र किताब का नाम पढ़कर नाक भौं न सिकोड़िये. मैंने कहीं पढ़ा है कि उस किताब में यह बताया गया है, कब और कैसे प्रणय निवेदन करना चाहिए और कैसे समझना चाहिए कि स्त्री भी आपके प्रेम में आसक्त है. और यह भी कि प्रणय निवेदन का शालीन तरीका क्या है और अस्वीकार किये जाने के बाद जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए.

स्त्रियां यही तो बता रही हैं. वे कह रही हैं, ठीक है प्रणय निवेदन आपका हक है, मगर इनकार के बाद जो आप जबरदस्ती करते हैं, वह गलत है, वही एट्रोसिटी है. इसकी वजह यही है कि हम उस पाठ को भूल गये हैं, जो प्रेम को सुंदर और संभ्रांत बनाता था. हम पशुवत जोर जबरदस्ती करते हुए, ‘कब तक रूठेगी, चीखेगी, चिल्लाएगी, दिल कहता है एक दिन हसीना मान जायेगी’, वाले बॉलीवुडिया सिद्धांत पर चलते रहते हैं.

हो सकता है, आपको यह बात प्रतिगामी लगे, मगर यह सच है कि पिछले कुछ दशक में बॉलीवुड की चीप और सिद्धांतहीन फिल्मों ने ही हम भारतीय युवाओं के मानस को गढ़ा है. उसे सिखाया है, ‘कोई हसीना कदम पहले बढ़ाती नहीं’. हमने फिल्मी नायकों से सीखा है, ‘पटती है लड़की, पटाने वाला चाहिए’. नायक नायिका को छेड़ता है, जबरदस्ती करता है और एक दिन नायिका के मन में इस छेड़खानी करने वाले नायक के प्रति प्रेम जग जाता है.

इन फिल्मों से हासिल ज्ञान के आधार पर हर पुरुष यह मान कर चलता है कि उसे अपने तरीके से भरपूर कोशिश करना चाहिए. क्योंकि स्त्रियों के मन में किसी कोने में प्रेम दबा रहता है, उसे निकालना पुरुष की जिम्मेदारी होती है. उसे यह भी सिखाया जाता है कि स्त्रियों की ‘ना’ में भी कई बार ‘हां’ छिपी होती है. हमारी फिल्मों ने तो रेपिस्टों से प्रेम करने वाली कथाएं भी दिखा दी हैं.

इसलिए हम सब मानते हैं कि राह चलती लड़की को छेड़ने से वह पट सकती है. उसके सामने अश्लील हरकत करने से वह रीझ सकती है. ‘देगी क्या’ कहने से वह तैयार हो सकती है. जो नहीं मानता है, वह इस काम को फ्रस्ट्रेशन में करता है. क्योंकि उसे मालूम है कि वह एक पुरुष के रूप में जिस तरह की छवि में कैद हो चुका है, उसके लिए कोई लड़की सहजता से तैयार होगी नहीं. इसलिए वह ताकत के बल पर, अपने उज्जड़पन के दम पर यौन सुख को हासिल कर लेना चाहता है. वहीं पावरफुल लोग समझते हैं कि वह घूस देकर यौन सुख खरीद सकते हैं.

मामला हमारी पारिवारिक शिक्षा का भी है और सामाजिक व्यवस्था का भी. हर लड़कों और लड़कियों में भेद तो करते ही हैं. यौन उत्पीड़न की घटनाओं के सामने आने पर चुप-चुप करने लगते हैं. हम यह सोचकर लड़कियों को लड़कों से दूर रखते हैं कि दोनों साथ रहेंगे तो उम्र से पहले सेक्स करने लगेंगे. इस व्यवस्था ने लड़कियों और लड़कों को एक दूसरे के लिए अजनबी बना दिया है.

ऐसे में लड़कियां इसलिए परहेज करती हैं, क्योंकि उसके लिए किसी के साथ कैजुअल रिश्ता रखने का मतलब है, शादी से लेकर जीवन की तमाम बेहतर संभावनाओं का खतरे में पड़ जाना है. जबकि सेक्स के भूखे कई लड़के स्त्री लिंग नाम की हर चीज से सेक्स करने के लिए 24 घंटे तैयार रहते हैं. वे हर अकेली लड़की से एक बार पूछ लेना अपना फर्ज समझते हैं कि क्या वह उसके साथ सेक्स के बारे में तो नहीं सोच रही.

अपने देश में आज भी लड़के और लड़कियां दो अलग-अलग ग्रहों के प्राणी हैं. जब तक उन्हें बचपन से ही आपस में घुलने मिलने न दिया जायेगा, ये चीजें खत्म नहीं होगी. और साथ ही हमें अपने बच्चों को काम की शिक्षा हासिल करने के लिए भी प्रेरित करना पड़ेगा.

यहां काम का अर्थ सिर्फ बायोलॉजिकल सेक्स एजुकेशन नहीं. आदर्श में रूप में आदिवासियों की घोटुल जैसी प्रथा को लागू कराना है. हम खुशनसीब थे कि भले परफैक्ट न हो, मगर ओशो को पढ़कर हमने समझा कि यौनेच्छा कोई अपराध नहीं.

सच तो यह है कि काम क्रीडा एक अद्भुत अनुभव है, अगर उसमें शामिल दोनों लोग बराबरी के स्तर पर इच्छुक और सक्रिय हों. मगर अक्सरहां हम यौनेच्छा में इतने असंतुलित हो जाते हैं कि सामने वाली की इच्छा का सम्मान करना भूल जाते हैं. मीटू अभियान का मकसद हमें प्रेम या प्रणय निवेदन से वंचित करना नहीं है, बल्कि तरीके से प्रणय निवेदन करना और सामने वाले की इच्छा का सम्मान करना सिखाना है.

नोट- कमेन्ट में मित्रों ने कामसूत्र के बारे में नकारात्मक टिप्पणियां की हैं। इसलिये इसे पढ़ते वक्त आंख कान खुली रखें।






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