लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण क्यों खत्म होना चाहिए

सीटें आरक्षित होने की वजह से अनुसूचित जाति और जनजाति के जो प्रतिनिधि चुनकर आ रहे हैं, वे समुदाय का कोई भी भला नहीं कर सकते. वे पूना पैक्ट की विकलांग संतानें हैं!
दिलीप मंडल 
3 जुलाई, 2009 को उस समय की बीजेपी सांसद सुमित्रा महाजन अगर लोकसभा में उपस्थिति रही होंगी तो उन्होंने भी अपनी पार्टी के बाकी सांसदों के साथ 95वें संविधान संसोधन विधेयक के समर्थन में वोट डाला होगा. ये संशोधन तमाम दलों की आम सहमति से पारित हुआ था. इस संशोधन के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण दस और साल के लिए बढ़ा दिया गया.
रांची में सुमित्रा महाजन ने यह सार्वजनिक वक्तव्य भी दिया है कि आरक्षण सिर्फ दस साल के लिए था और हम इसे हर दस साल पर बढ़ाते रहे. सुमित्रा महाजन लोकसभा की स्पीकर है और आरक्षण के बारे में वे जो कह रही हैं, वह सच है. लोकसभा और विधान सभाओं का आरक्षण सचमुच सिर्फ दस के लिए था. सुमित्रा महाजन ने आरक्षण की उपयोगिता पर टिप्पणी भी की है, जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है.
लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण के लिए संविधान में अनुच्छेद 330, 332 और 334 है. संविधान के मूल पाठ में लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण 10 साल के लिए था. लेकिन इस हर दस साल पर दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है और इसके लिए संविधान संशोधन किया जाता है. 95वें संविधान संशोधन के जरिए संसद और लोकसभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जाति के लिए सीटों का आबादी के अनुपात में आरक्षण दस और साल के लिए बढ़ा दिया गया.
अब यह आरक्षण 2020 तक लागू रहेगा. कोई भी राजनीतिक दल इस आरक्षण के खिलाफ नहीं है. इसलिए सुमित्रा महाजन जब इस आरक्षण की निरर्थकता पर बात करती हैं, तो उसे उनकी मूल पार्टी बीजेपी का विचार नहीं माना जा सकता. वैसे भी लोकसभा के स्पीकर से उम्मीद की जाती है कि वो दलगत भेदभाव से ऊपर रहें.
यहां एक स्पष्टीकरण आवश्यक है. उम्मीद है कि सुमित्रा महाजन जब दस साल की समय सीमा वाले आरक्षण की बात कर रही हैं तो उनके दिमाग में लोकसभा और विधानसभाओं का आरक्षण ही रहा होगा. उम्मीद है कि वे शिक्षा और नौकरियों के आरक्षण की बात नहीं कर रही हैं क्योंकि इस आरक्षण की संविधान में कोई समय सीमा तय नहीं की गई है. शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण संविधान की प्रस्तावना तथा अनुच्छेद 15(4), 16(4), 46 और 355 से आया है और इन अनुच्छेदों में आरक्षण की समय सीमा के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है.
ओबीसी आरक्षण का आधार अनुच्छेद 340 है और समय की सीमा उसमें भी नहीं है. जातिवाद और जातियां खत्म होने की कोई समय सीमा रखी भी नहीं जा सकती. इसलिए जातिवाद और उसका असर जब तक समाज में कायम है, तब तक शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान जारी रहेंगे या फिर संसद आगे चलकर कभी उचित समझे तो इस बारे में पुनर्विचार या समीक्षा करेगी.
बहरहाल, लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण पर चूंकि हर दसवें साल संसद विचार और समीक्षा करती है, इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है अगर संसद के बाहर भी इस बारे में चर्चा हो. इस बारे में चर्चा के लिए चार प्रमुख बिंदु हो सकते हैं.
1. एससी और एसटी के लिए अलग सीटों का प्रावधान क्यों किया गया
आजादी से पहले 1932 के कम्युनल अवार्ड में भारत में विधायिका के गठन के लिए, सवर्ण हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों आदि के साथ ही अनटचेबल्स यानी तत्कालीन अछूत जातियों के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट यानी पृथक निर्वाचन का प्रावधान किया था. इसके तहत अछूत जातियों के लोग अपना वोट डालकर अपने प्रतिनिधि चुनते. इसके अलावा वे सामान्य सीट पर भी वोट डालने के हकदार थे.
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर इससे पहले लंदन में हुए राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में सेपरेट इलेक्टोरेट के समर्थन में अभियान चला रहे थे, क्योंकि उनका मानना था कि इन वर्गों का हित सवर्ण हिंदुओं के हाथों में सुरक्षित नहीं है. कम्युनल अवार्ड में अछूतों के सेपरेट इलेक्टोरेट को गांधी ने हिंदू एकता के खिलाफ माना और इसके खिलाफ वे आमरण अनशन पर बैठ गए.
उनकी तबियत बिगड़ने की वजह से जब ये खतरा हो गया कि देश भर में दलितों के खिलाफ हिंसा हो सकती है, तो बाबा साहेब को मजबूरी में गांधी की बात माननी पड़ी और सेपरेट इलेक्टोरेट की मांग छोड़नी पड़ी. अछूतों और सवर्ण हिंदुओं के बीच हुए पूना पैक्ट या पूना समझौते में तय हुआ कि सेपरेट इलेक्टोरेट नहीं होगा बल्कि दलितों के लिए सीटें रिजर्व की जाएंगी, जिसमें सभी जाति और वर्गों के मतदाता वोट डालेंगे. बाद में इस व्यवस्था में आदिवासी यानी अनुसूचित जनजाति को भी शामिल कर लिया गया. बाबा साहेब इस व्यवस्था के सख्त विरोधी थे जिसमें सभी समुदायों के लोग दलित प्रतिनिधि चुनें.
2. बाबा साहेब अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटें आरक्षित किए जाने के खिलाफ क्यों थे
दरअसल सुरक्षित सीटों पर कैंडिडेट तो सिर्फ आरक्षित वर्ग के होते हैं, लेकिन अक्सर ज्यादातर वोटर अन्य तबकों से होते हैं. यानी सुरक्षित सीटों से जो चुना जाएगा, वो बेशक आरक्षित वर्ग से होगा, लेकिन उसके चुने जाने में अनारक्षित वर्ग की भूमिका अहम होगी. मिसाल के तौर पर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किसी सीट पर अलग अनुसूचित जाति का 20 फीसदी वोट है तो उस सीट का फैसला वे 80 फीसदी वोटर करेंगे तो अन्य समुदायों से होंगे.
जाहिर है कि ऐसे कैंडिडेट अपने तबकों के हित की बात खुलकर नहीं कर पाएंगे, क्योंकि ऐसा करते ही उसके ज्यादातर वोटर नाराज हो जाएंगे. अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए जोरदार तरीके से आवाज उठाने वाला कोई भी नेता सुरक्षित सीट से चुनाव जीत पाए, इसकी उम्मीद कम ही होगी.
आरक्षित सीटों से चुने गए लोगों को ‘पूना पैक्ट की दुर्बल या विकलांग संतान’ कहा जा सकता है. इस आरक्षण की वजह से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग संसद और विधानमंडलों में पहुंच पा रहे हैं, लेकिन ये प्रतिनिधि अपने वर्गों के हितों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं. ऐसा देखा गया है कि आरक्षण या वंचित तबकों के हित में ये जनप्रतिनिधि मुंह नहीं खोलते.
3. दलबदल निरोधक कानून ने इस आरक्षण की रही-सही उपयोगिता भी खत्म कर दी है
दलबदल निरोधक कानून, 1985 ने अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों और विधायकों की बची-खुची उपयोगिता और स्वायत्तता भी नष्ट कर दी है. इस कानून की वजह से सांसद और विधायक दलों के अनुशासन में इस कदर बंध गए हैं कि वे अपने समुदाय के हितों के बारे में उसी हद तक जा सकते हैं, जहां तक जाने की इजाजत दल उन्हें देते हैं.
दलबदल संबंधित 52वें संविधान संशोधन के बाद जनप्रतिनिधियों की स्वायत्तता खत्म हो गई है क्योंकि किसी भी विधेयक या अन्य सवाल पर वोटिंग करते समय उन्हें वही पक्ष लेना होता है, जिसका निर्देश (ह्विप) दल की ओर से होता है. ऐसा न करने पर उनकी सदस्यता छीन ली जाती है. इसका एक दिलचस्प उदाहरण 15वीं लोकसभा में देखा गया जब एससी-एसटी के प्रमोशन में आरक्षण के विधेयक का समाजवादी पार्टी ने विरोध किया और इस विधेयक को फाड़ने के लिए अनुसूचित जाति के ही एक सांसद को आगे कर दिया और उक्त सांसद ने अपनी जाति के हित का विधेयक फाड़ भी दिया क्योंकि उसे मालूम था कि उसका चुना जाना उसकी जाति के लोग तय नहीं करते. और फिर वह दल से भी बंधा था.
4. ये आरक्षण माइनॉरिटी विरोधी भी है
जो भी सीट अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए आरक्षित होती है, उस सीट पर इन समुदायों के लोग ही चुनाव लड़ सकते हैं. राष्ट्रपति के 1950 के एक आदेश की वजह से अनुसूचित जातियां सिर्फ हिंदुओं, सिखों, और बौद्धों में हो सकती हैं. चूंकि मुसलमान या ईसाई धर्म मानने वाले का अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट नहीं बन सकता, इसलिए मुसलमान या ईसाई इन सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकते.
अगर कोई दलित धर्म बदलकर मुसलमान या ईसाई बनता है तो वह इन सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बन जाएगा. कई बार मुस्लिम बहुल सीटों को भी रिजर्व कर दिया जाता है. ऐसी सीटों पर ज्यादातर वोटर मुसलमान हो सकते हैं, लेकिन इस सीट का जनप्रतिनिधि मुसलमान नहीं हो सकता. यह लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है.
इस आरक्षण पर बहस के कई और पहलू हो सकते हैं. लेकिन आश्चर्यजनक है कि इस आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ाने का संविधान संशोधन विधेयक जब कभी आता है, उस पर कोई बहस नहीं होती और लगभग आम राय से इसे पारित कर दिया जाता है. यह आम धारणा है कि यह आरक्षण एससी-एसटी के हित में है. लेकिन वास्तविकता में इस आरक्षण से इन समुदायों का कोई भला नहीं हो रहा है.
ये सवाल जरूर है कि अगर इन समुदायों को लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण नहीं होगा, तो क्या इन समुदायों के लोग सामान्य सीटों से चुनकर आ पाएंगे. हो सकता है कि आरक्षण खत्म होने से लोकसभा और विधानसभाओं में इन तबकों की मौजूदगी घट जाएगी. इसलिए आरक्षण खत्म करने से पहले तमाम पहलुओं पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है.
( दिलीप मंडल लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.यह आलेखhindi.firstpost.com से साभार लिया गया है)






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