हिंदी दिवस पर जानिये बिहार के सबसे बड़े हिंदी सेवी को

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पुष्यमित्र

क्या आप जानते हैं कि यह तसवीर किनकी है? अगर आप हिंदी प्रेमी हैं तो आपको जानना चाहिए. यह महराजकुमार रामदीन सिंह की तसवीर है, जिन्होंने उन्नीसवीं सदी के आखिर में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए पटना में खड़ग विलास प्रेस की स्थापना की थी. इस खगड़ विलास प्रेस का महत्व आप इसी बात से समझ सकते हैं कि आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र की 80 फीसदी से अधिक किताबें इसी प्रेस से छपी थीं. उनके अलावा उस दौर के ज्यादातर हिंदी साहित्यकार अपनी किताबों का प्रकाशन इसी प्रेस से कराते थे. यह वह वक्त था जब उत्तर प्रदेश के ज्यादातर साहित्यकार ब्रज भाषा में साहित्य लिखे जाने के पक्ष में थे, तब पटना के खगड़ विलास प्रेस और समस्तीपुर में जन्में अपने जमाने के बेस्ट सेलर लेखक देवकीनंदन खत्री ने हिंदी को मजबूती दी थी. तब पटना से हिंदी पत्रिका बिहार बंधु भी छपता था. और आज जब बिहार की भाषाएं अपने अस्तित्व का सवाल उठाती है तो सबसे अधिक विरोध हिंदी की तरफ से ही होता है.

खैर, वह अलग दौर था. तब बिहार में भाषाई अस्मिता का सवाल जोर पकड़े हुए था. बंगाल का हिस्सा होने की वजह से यहां शासन प्रशासन में हर जगह अंगरेजी के साथ बांग्ला का इस्तेमाल होता था. जिससे लोगों को काफी परेशानी होती थी. उस दौर में उर्दू के लोगों ने उर्दू की मांग को आगे बढ़ाया. दिलचस्प है कि 1850 के आसपास के दौर में भी आरा से उस वक्त एक उर्दू अखबार छपता था. मुंगेर के एक उर्दू अखबार ने तो भाषा के साथ-साथ बिहार राज्य को अलग करने की भी मांग कर डाली. 1835 में ही हिंदी का आंदोलन भी शुरू हो गया था. बिहार शरीफ से राज्य का पहला हिंदी अखबार बिहार बंधु छपना शुरू हुआ, जो फिर पटना आ गया. वह दौर भाषा को लेकर इतना चार्ज्ड था कि देवनागरी लिपी में पुस्तकें छापने वाले एक प्रेस की तत्काल जरूरत महसूस हुई.

उस वक्त तक लखनऊ का प्रसिद्ध नवल किशोर प्रेस भी बंद हो चुका था. वह संभवतः भारतीयों द्वारा शुरू किया गया पहला हिंदी का प्रेस था. उससे पहले मिशनरी के प्रेसों में हिंदी में बाइबिल छपा करती थी. तो जब बिहार के इलाके में हिंदी को लेकर भूख जगी और छपने के लिए कोई प्रेस आसपास में नहीं था तो बलिया के महाराजकुमार रामदीन सिंह ने पटना में खड़ग विलास प्रेस की स्थापना की. 1880 में, जो 1926 तक चला. मकसद हिंदी के लिए पाठ्य पुस्तकें छापना था. रामदीन सिंह का ननिहाल पटना था, इसलिए उन्होंने प्रेस की स्थापना यहीं की. इसी प्रेस से साहबप्रसाद सिंह द्वारा लिखित पुस्तक भाषा सार का प्रकाशन हुआ जो पचास वर्षों से अधिक अवधि तक स्कूलों में पढाया जाता रहा.

इस प्रेस से कई पत्र-पत्रिकाएं छपती थीं. इनमें बिहार बंधु, क्षत्रिय पत्रिका, भाषा प्रकाश, हरिश्चंद्र कला, द्विज, ब्राह्मण, विद्या विनोद, कवि समाज और शिक्षा प्रमुख है. पाठ्य पुस्तकों के अलावा यहां से कई साहित्यिक और गैर साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन हुआ. बिहार दर्पण पुस्तक को खास तौर पर याद किया जाता है.

आधुनिक हिंदी के निर्माता कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो खड़ग विलास प्रेस को अपनी रचनाओं के प्रकाशन का एकाधिकार दे दिया था. ऐसा कहा जाता है कि रामदीन सिंह गाढ़े वक्त में भारतेंदु जी की आर्थिक मदद भी किया करते थे. ऐसे कुछ पत्र भी मिलते हैं. बाद में चंद्रकांता वाले देवकीनंदन खत्री ने भी लहरी के नाम से अपना प्रेस शुरू किया. खड़ग विलास प्रेस 1926 तक चलता रहा. यह न सिर्फ बिहार के लिए बल्कि हिंदी के लिए भी एक ऐतिहासिक धरोहर था, मगर सरकार इस धरोहर को बचा नहीं पायी. हिंदी के लोगों की स्मृति में भी अब यह धूमिल हो रहा है. सौभाग्य की बात यह है कि इस प्रेस के योगदान पर डॉ. धीरेंद्र सिंह ने शोध किया है और उनका शोध पुस्तक के रूप में 1985 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपा है. मगर वह पुस्तक भी रीप्रिंट होती है या नहीं, मालूम नहीं.

बहरहाल, हम जैसे बिहारियों के लिए जिनकी मातृभाषा मैथिली, भोजपुरी, मगही वगैरह है, मगर पढ़ने-लिखने, कोट-कचहरी और रोजगार के लिए हिंदी पर आश्रित हैं. इस प्रेस का महत्व इस रूप में है कि इसके बाद बिहार में भी हिंदी स्थापित हो गयी. उससे पहले यहां कैथी लिपी के प्रेस हुआ करते थे. इस प्रेस ने हिंदी को इस तरह स्थापित किया कि आज हमारी अपनी भाषाएं ही अस्तित्व के संकट का मुकाबला कर रही हैं. फिर भी हम मानते हैं कि खगड़ विलास प्रेस हमारी धरोहर है, उस वक्त की जरूरत हिंदी की स्थापना थी. इस प्रेस की स्मृतियों का संरक्षण होना चाहिए और इसके योगदान को याद रखा जाना चाहिए.






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