‘हिंदी दिवस’ का कर्मकांड ?

ध्रुव गुप्त

आज हिंदी दिवस है। हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अश्रु-विगलित भावुकता का दिन। हर सरकारी या गैर सरकारी मंच से हिंदी की प्रशस्तियां गाई जाएंगी, लेकिन जिन कमियों की वज़ह से हिंदी आजतक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना अपेक्षित गौरव हासिल नहीं कर पाई है, उनकी बात कोई नहीं करेगा। हिंदी कल भी भावनाओं की भाषा थी, आज भी भावनाओं की ही भाषा है ! आज के वैज्ञानिक और अर्थ-युग में किसी भी भाषा का सम्मान उसे बोलने वालों की संख्या और उसका साहित्य नहीं, विज्ञान को आत्मसात करने और रोज़गार देने की उसकी क्षमता तय करती है। हम अपनी हिंदी को न विज्ञान की भाषा बना पाए, न रोज़गार की! विज्ञान, तकनीक, अभियंत्रणा, चिकित्सा, प्रबंधन, प्रशासन, विधि जैसे विषयों की शिक्षा में हिंदी के अंग्रेजी का विकल्प बनाने की सार्थक कोशिशें ही नहीं हुई। युवा विज्ञान, मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विधि की पढ़ाई करना चाहते हैं तो अंग्रेजी के बगैर कोई चारा नहीं है। विधि के अलावा इन विषयों पर हिंदी में कायदे की किताब ही नहीं लिखी गई। इन विषयों की जो इक्का-दुक्का किताबें हिंदी में उपलब्ध हैं उनका अनुवाद इतना जटिल और भ्रष्ट है कि अंग्रेजी की किताबें पढ़ लेना आपको ज्यादा सहज लगेगा। आज तक अंग्रेजी के वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों का ठीक से हिंदी अनुवाद भी हम नहीं करा सके। भारत सरकार के किराए के कुछ अनुवादकों द्वारा अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों के जैसे अनुवाद गढ़े गए हैं, उन्हें पढ़कर बरबस हंसी छूट जाती है। हम हिन्दीभाषी अपनी भाषा के प्रति जितने भावुक हैं, अगर उतने व्यवहारिक भी होते तो आज यह स्थिति नहीं आती। हालत यह है कि हममें से ‘हिंदी हिंदी’ करने वाला शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो अपनी संतानों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में नहीं पढ़ा रहा हो। हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं की दुर्दशा के लिए अंग्रेजी को गाली देना बंद करिए ! चलिए अपनी हिंदी के लिए कुछ सार्थक सोचते और करते हैं ! भले आपको बुरा लगे, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि अगर अगले एक-दो दशकों में हिंदी को विज्ञान, तकनीकी शिक्षा और रोज़गार की भाषा के रूप में विकसित नहीं किया जा सका तो आने वाली पीढ़ियां इसे गंवारों की भाषा कहकर खारिज कर देंगी। #HindiDiwas






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