भीड़ बनता भारत

  1. अरुण कुमार त्रिपाठी
    इक्कीसवीं सदी में भारत भीड़ में बदल रहा है। उसकी नागरिकता अगर राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक धर्म, सेना के प्रति समर्पण, काल्पनिक कथाओं व अफवाहों को सत्य मानने का हठ, निरंतर शत्रुओं की पहचान और उन्हें सबक सिखाने की भावना से परिभाषित हो रही है तो स्थानीय स्तर पर वह `हम और वे’ बीच बंट रही है। भावनाओं के इस घटाटोप ने `हम भारत के लोग’ नामक उस प्रत्यय को बहुत छोटा कर दिया है जिसने अपने आपको एक संविधान दिया और अफवाहों और हिंसा से दूर सत्य और अहिंसा के मूल्यों से अनुप्राणित होकर कानून का राज स्थापित किया। विडंबना है कि हम राष्ट्रीयता के लिए सीमा पर तैनात फौजी और सुदूर केरल और मणिपुर की राजनीतिक हिंसा में मारे जाने वालों के साथ खड़े होते हैं लेकिन देश के भीतर का वह नागरिक एक अपरिचित शत्रु बन जाता है, जिसकी पहचान भीड़ से अलग है और जो अफवाहों का समुचित खंडन नहीं कर सकता।
    पिछले एक साल में दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से लेकर पूर्वोत्तर राज्य असम तक भीड़ ने 15 वारदातों में 27 लोगों की पीट-पीट कर हत्या(लिंचिंग) कर दी। जो मारे गए उनको भीड़ पहचानती नहीं थी। उनका निकट अतीत में कोई आपराधिक इतिहास नहीं था। वे सब अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार रोजी रोटी के दायित्व निर्वहन के लिए निकले थे या उसकी तलाश कर रहे थे। इन सबका दोष इतना ही था कि वे भीड़ के दिमाग में बैठी इस अफवाह का जवाब नहीं दे सके कि बच्चा उठाने वाले गिरोह के सदस्य हैं या इस देश के निर्दोष नागरिक। इन सभी मामलों में राज्य उन निर्दोष लोगों को सुरक्षा देने में विफल रहा और उस उग्र भीड़ का मुकाबला नहीं कर सका जो लगातार फैलाई जा रही अफवाहों से अपना विवेक खो चुकी थी और कानून और पुलिस के भय से मुक्त होकर हत्यारी हो गई थी।
    *एक जुलाई 2018 को महाराष्ट्र के धुले जिले के रैनपाड़ा गांव में घुमंतू गोसवी समुदाय के पांच लोगों को इस शक में मार डाला कि वे बच्चा उठाने वाले गिरोह हैं। मारे गए लोग एक ही परिवार के थे। पुलिस का मानना है कि भीड़ को बर्बर बनाने में व्हाटसैप पर डाले गए उस वीडियो का योगदान है जिसमें छोटे बच्चों का विकृत शव पड़ा हुआ है। विडंबना देखिए कि पुलिस थाना वहां से 20 किलोमीटर की दूरी पर है और पुलिस सूचना मिलने के एक घंटा बाद पहुंचती है। तब तक भीड़ हत्या कर चुकी है, लेकिन वह इतने से भी शांत नहीं हुई और पुलिस को शव उठाने पर धमकाया और वहीं आग लगाकर मारे गए लोगों को जला दिया।
    *औरंगाबाद में उग्र भीड़ ने 3 और गोंदिया में 1 व्यक्ति की हत्या भी बच्चा चोर के आरोप में की गई। इसमें भी पिछले तीन महीनों से चल रहे उस वीडियो का योगदान था जिसमें हिजाब पहनने वाली एक औरत को बच्चा चोर बताया जा रहा था।
    *पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा राज्य में अलग-अलग घटनाओं में पांच लोग मारे गए। पश्चिमी त्रिपुरा में बर्बर भीड़ का शिकार होने वाला एक युवा फेरीवाला था। वह एक वैन में अपने साथियों के साथ सामान बेच रहा था। भीड़ की ढिठाई देखिए कि फेरीवाला और उसके साथी जब पुलिस चौकी में घुस कर जान बचाने लगे तो चौकी पर भी हमला बोल दिया गया। पुलिस ने बचाने के लिए हवाई फायरिंग की लेकिन `भीड़ का इंसाफ’ भारी पड़ा।
    *दक्षिणी त्रिपुरा में 2000 की भीड़ ने तीस वर्षीय उस युवक की हत्या कर दी जो अफवाहों से समाज को बचाने के लिए पुलिस व्दारा 500 रुपए रोज के मेहनताने पर पुलिस व्दारा किराए पर लिया गया था।
    *इसी तरह एक अनजानी औरत को भी बच्चा चोर समझ कर मार दिया गया। इसके पीछे उन दिनों व्हाटसैप पर चलने वाली वह अफवाह थी जिसमें 26 जून को मरे पाए गए एक बच्चे का गुर्दा चुराने का आरोप था। बाद में पोस्टमार्टम में वह आरोप गलत पाया गया।
    *तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले में पैंसठ वर्षीय महिला को इसलिए मार दिया गया कि उसने धार्मिक स्थल जाने का रास्ता पूछा और वहां दिखे बच्चों को चाकलेट दिया। पुलिस 30 मिनट में पहुंची लेकिन तब तक भीड़ अपना काम कर चुकी थी।
    *झारखंड में हत्यारी भीड़ ने सात लोगों की बच्चा चोर गिरोह के आरोप में हत्या कर दी। वे सब शौचालय निर्माण की केंद्र सरकार की बहुप्रचारित योजना के तहत गड्ढ़ा खोदने का काम करते थे।
    *छत्तीसगढ़ में भीड़ ने एक पागल को बच्चा चोर बताकर मार दिया क्योंकि वह उनके सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। वहां व्हाटसैप पर बच्चा चोरी की अफवाह दो महाने से चल रही थी।
    *असम के करबी एंग्लोंग जिले के पंजुरी कचारी में 500 की भीड़ ने एक कांट्रेक्टर और एक साउंड इंजीनियर को बच्चा चोर बताकर मार डाला।
    *तेलंगाना में एक आटोड्राइवर को ताड़ी दुकान के सामने पचास लोगों की भीड़ ने इसलिए मार डाला कि वह यह साबित नहीं कर सका कि वह बच्चा चोर नहीं है।
    *कर्नाटक में राजस्थान के एक मजदूर को भी भीड़ ने इसलिए मार डाला कि वह उनकी चंद सेकेंड के लिए लगी अदालत में अपने पर लगे आरोपों को खारिज नहीं कर सका।
    भीड़ ऐसा क्यों कर रही है इसकी मुकम्मल व्याख्या के लिए समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी, संचारशास्त्री, विधिशास्त्री और राजनीतिशास्त्री मददगार हो सकते हैं। निश्चित तौर पर भीड़ के इस व्यवहार की डायग्नोसिस और इलाज समस्या को पूरी तौर पर समझने में ही है। लेकिन एक बात साफ है कि इसके पीछे नए मीडिया व्दारा उत्पन्न किए जा रहे पोस्ट ट्रुथ वातावरण का भारी योगदान है। यह प्रक्रिया किसी घटना को संदर्भ से काटकर और अन्य संदर्भों से जोड़कर झूठ का ऐसा तीव्र वातावरण निर्मित करती है जिसमें समाज अपने राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक निर्णय विवेक और संयम को किनारे रखकर तेजी से लेता है। पोस्ट ट्रुथ की यह प्रक्रिया मनुष्य के व्यक्तिगत विवेक और संयम को सामूहिक भावना से इस तरह नत्थी कर देता है कि व्यक्ति तथ्य और अफवाह में फर्क नही कर पाता और उसी निर्णय में शामिल हो जाता है जो भीड़ पहले से ले चुकी होती है। व्हाटसैप, फेसबुक और ट्रिवटर से फैलाए जा रहे झूठ और उत्तेजना को नई प्रौद्योगिकी से नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन जैसे उन्नतशील देशों में भी लोग ब्रेग्जिट और ट्रंप के चयन में इन अफवाहों से प्रभावित हुए हैं। लेकिन यह भयानक रूप उन समाजों में ज्यादा प्रकट होता है जहां अभी भी समुदाय आधारित समाज है और व्यक्ति आधारित समाज का निर्माण नहीं हो पाया है। यानी मानवीय गरिमा और मानवाधिकारों की अहमियत नहीं है।
    पूर्वांचल और बिहार में इस तरह की अफवाहों के लिए एक मुहावरा चलता है कि `कौवा कान लिए जा रहा है’। उसमें यह संदेश है कि जब आपसे कोई ऐसा कहे तो पहले अपना कान टटोल कर देख लीजिए तब उसके पीछे दौड़िए। यही टटोलना विवेक, संयम और परीक्षण की सीख है।
    समाज के ऐसा करने के पीछे पारंपरिक समाज और आधुनिक समाज का वह व्दंव्द है जो संविधान व्दारा प्रदत्त कानून के राज और स्थानीय आबादी की न्याय प्रणाली के बीच भेद के कारण पैदा होता है। स्थानीय आबादी को कहीं लगता है कि अगर मामला पुलिस और अदालत तक गया तो कुछ नहीं होगा। इसलिए तुरत न्याय कर लेना चाहिए। इस मानसिकता को प्रकाश झा की गंगाजल फिल्म के आखिरी दृश्य में बहुत सशक्त तरीके से फिल्माया गया है जब भीड़ साधु यादव और बच्चा यादव को पुलिस के हाथों से छीन कर मार डालने को आमादा है।
    समाज को उत्तेजित रखने में उन संगठनों और विचारों का भी योगदान है जो चाहते हैं कि समाज कहीं न कहीं खदबदाता रहे ताकि मौका पड़ने पर उसका इस्तेमाल शासक वर्ग के पक्ष में हिंसा करने और जनमत को बदलने के लिए किया जा सके। इकबाल की बाज नामक नज्म का बड़ा मशहूर शेर है—हमामों कबूतर का भूखा नहीं मैं कि है जिंदगी बाज की जाहिदाना, पलट कर झपटना झपट कर पलटना, लहू गर्म रखने का है एक बहाना।
    निश्चित तौर पर भारतीय समाज को इस स्थिति तक पहुंचाने में उन लोगों का योगदान है जो उसे सत्य के मार्ग से च्युत करके झूठ, अंधविश्वास, अफवाह, उत्तेजना और हिंसा के मार्ग पर ले जाना चाहते हैं। महाभारत के शांति पर्व में भीष्म ने युध्दिष्ठिर को उपदेश देते हुए बताया है कि सत्य अपने को 13 रूपों में प्रकट करता हैः—निष्पक्षता, संयम, विशालहृदयता, क्षमा, शील, धैर्य, अनाशक्ति, आत्मपरीक्षण, मर्यादा, दृढ़ता, निरंतरता और निरापदता। महात्मा गांधी ने इस देश को सत्य के इन्हीं अंगों पर निर्मित करना चाहा था। सवाल है कि इस समस्या का समाधान क्या पुलिस और तकनोलाजी को चुस्त करने से हो जाएगा? या योग से विश्व विजय और फिर विश्व गुरु बनने को आतुर भारत को भीड़ से निकालकर मनुष्य और नागरिक बनाने से इसका हल निकलेगा ?





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