क्या बलात्कारियों को जीने का हक़ है ?

Dhruv Gupt

उत्तर प्रदेश के बलिया में छुट्टियों से लौट रही एक सत्रह साल की छात्रा की बलात्कार के बाद हत्या की त्रासद खबर अभी ठंढी भी नहीं पड़ी थी कि मध्यप्रदेश के मंदसौर में आठ साल की एक नन्ही बच्ची के साथ बलात्कार और उसके साथ अमानुषिक सलूक की खबर देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति भीतर तक हिल गया होगा। देश के कोने-कोने से जिस तरह नन्ही बच्चियों और किशोरियों के साथ बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और उनकी नृशंस हत्याओं की खबरें आ रही हैं, उससे पूरा देश सदमे में है। आज यह सवाल हर मां-बाप के मन में है कि इस वहशी समय में वे कैसे बचाएं अपनी बहनों-बेटियों को ? उन्हें घर में बंद रखना समस्या का समाधान नहीं। अपनी ज़िंदगी जीने का उन्हें पूरा हक़ है। वे सड़कों पर, खेतों में, बसों और ट्रेनों में निकलेंगी ही। पुलिस और क़ानून का डर अब अपराधियों को रहा नहीं। वैसे भी हमारे देश के क़ानून में जेल, बेल, रिश्वत और अपील का इतना लंबा खेल है कि न्याय के इंतज़ार में एक जीवन खप जाता है। दरिंदों के हाथों बलात्कार की असहनीय शारीरिक, मानसिक पीड़ा और फिर अमानवीय मौत झेलने वाली देश की हमारी बच्चियों और किशोरियों के लिए हमारे भीतर जितना भी दर्द हो, हमारी व्यवस्था के पास उस दर्द का क्या उपचार है ? संवेदनहीन पुलिस, सियासी हस्तक्षेप, संचिकाओं में वर्षों तक धूल फांकता दर्द, भावनाशून्य न्यायालय, बेल का खेल और तारीख पर तारीख का अंतहीन सिलसिला। सालों की मानसिक यातना के बाद निचले कोर्ट का कोई फैसला आया भी तो उसके बाद उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय। और यह सब कुछ हो जाने के बाद देश के महामहिम के पास ऐसे मामलों में होने वाले राजनीतिक नफ़ा-नुकसान की पड़ताल के लिए लंबे अरसे तक लंबित दया याचिकाएं ! इक्का-दुक्का चर्चित मामलों को छोड़ दें तो देश के थानों और न्यायालयों में बलात्कार के लाखों मामलों की संचिकाएं बरसों, दशकों से धूल फांक रही हैं।

स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। लोगों का धैर्य भी जवाब देने लगा है। आज की बेहद डरावनी परिस्थितियों में इस्लामी कानूनों के मुताबिक़ एकदम संक्षिप्त सुनवाई के बाद बीच चौराहों पर लटकाकर इन हैवानों को मार डालना एक कारगर क़दम हो सकता है, पर दुर्भाग्य से हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संभव नहीं। यह मत कहिए कि मां-बाप द्वारा बच्चों को नैतिक शिक्षा और अच्छे संस्कार देना इस समस्या का हल है। मोबाइल और इन्टरनेट के दौर में ज्यादातर बच्चे मां-बाप से नहीं, यो यो हनी सिंह, सनी लिओनी और गूगल पर मुफ्त में उपलब्ध असंख्य अश्लील वीडियो क्लिप से ही प्रेरणा ग्रहण करेंगे। गूगल पर बलात्कार के लिए उकसाते ब्लू फिल्मों पर प्रतिबन्ध लगाने की इच्छाशक्ति और साहस हमारी कायर सरकार में नहीं है। क़ानून की अपनी सीमाएं हैं। तो क्या करें हम ? देश की अपनी बहनों-बेटियों के साथ पाशविकता का यह खेल चुपचाप देखते रहें और सोशल मीडिया पर अपडेट डालते रहें ? कुछ लोग गुस्से में यहां तक सोचने लगे हैं कि लड़कियों को गर्भ में या उनके पैदा होते ही मार डाला जाय। समझा जा सकता है कि ऐसी प्रतिक्रियाओं के पीछे बेटियों के मां-बाप का का डर और गुस्सा है। देश में अब इंतज़ार का धैर्य नहीं बच गया है ! क्या अब क़ानून हाथ में लेकर जनता द्वारा बलात्कारियों को पकड़कर सरेआम मार डालने का समय आ गया है ? इससे समाज में थोड़ी अराजकता ज़रूर फैलेगी, लेकिन अपनी बच्चियों को नरपिशाचों से बचाने की यह कीमत कुछ ज्यादा नही !






Related News

  • ओबीसी नरेंद्र मोदी ने ‘ओबीसी’ के लिए क्या किया ?
  • बौद्धिक स्वच्छता अभियान से कौन डरा ?
  • कौन है जो देश बांटना चाहता है!
  • हिन्दीमय हो रहा पूर्वोत्तर भारत
  • कामसूत्र के देश में मीटू
  • लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण क्यों खत्म होना चाहिए
  • सेक्शन-497 : सेक्स करके पांच-दस मिनट में फारिग हो सकते हैं, विवाह में नहीं!
  • अंत का आरम्भ ?
  • Comments are Closed

    Share
    Social Media Auto Publish Powered By : XYZScripts.com