ये जनता है, इसे ट्रोल मत कहो

संजय तिवारी. नई दिल्ली.
इंटरनेट पर जबसे सोशल मीडिया का जोर बढ़ा है तब से एक शब्द बहुत चलन में आ गया है। ट्रोल। अखबार और टीवी मीडिया इंटरनेट पर होने वाले विरोध को इसी ट्रोल नाम से चिन्हित करती है। अगर सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति, संगठन आदि का विरोध हुआ तो घराना कॉरपोरेट मीडिया खबर लिखते समय उसे ट्रोल कहकर संबोधित कर देती है। आखिर क्या होता है ये ट्रोल और इसका असली अर्थ क्या है?
ट्रोल स्पेनिश का शब्द है जो सत्रहवीं सदी में सबसे पहले इस्तेमाल हुआ। कैम्ब्रिज डिक्शनरी के अनुसार ट्रोल एक ऐसा कल्पनापात्र है जो बहुत भद्दा बौना या फिर बहुत लंबा होता है। मतलब ट्रोल एक तरह की शैतानी कल्पना है जिसे डराने के लिए प्रतीक रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तो क्या सोशल मीडिया पर जिन लोगों को ट्रोल नाम से संबोधित किया जा रहा है क्या वो डरानेवाले शैतान हैं? क्या उनका यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है और वो कल्पना पात्र हैं?
ऐसा नहीं है। इंटरनेट पर कॉरपोरेट मीडिया द्वारा जिन्हें ट्रोल नाम से संबोधित किया जा रहा है वो जीते जागते लोग हैं। उनका अपना अस्तित्व और अपनी पहचान है। ज्यादातर मामलों में वो किसी को डरा नहीं रहे, बल्कि अपनी असहमति दिखा रहे हैं जो कि लोकतंत्र का स्वाभाविक चरित्र होता है। हां, कुछ जगहों पर जरूर लोग असली नाम की बजाय नकली नाम और नकली पहचान धारण कर लेते हैं लेकिन ये संख्या इतनी नहीं है कि इसके आधार पर सोशल मीडिया पर असहमति के स्वर को ही ट्रोल करार दे दिया जाए।
लेकिन दुर्भाग्य से दिया जा रहा है। कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी और कॉरपोरेट मीडिया ये काम मिलकर कर रहे हैं। कुछ कम्युनिस्ट पत्रकार जो अब तक टीवी और अखबार के द्वारा एकतरफा संवाद करते थे, जब दो तरफा संवाद में फंसे तो उन्होंने अपने विरोधियों को ट्रोल बताना शुरु कर दिया। इसी तरह कॉरपोरेट मीडिया ने असहमति और विरोध को ट्रोल ठहराने का धंधा शुरु कर दिया है। वो शायद इसलिए ऐसा कर रहे हैं ताकि सोशल मीडिया पर उनकी श्रेष्ठता कायम रहे। लेकिन यह गलत है।
दो तरफा संवाद का जरिया
सोशल मीडिया दो तरफा संवाद का जरिया है। हो सकता है असहमत लोग आपसे अशिष्ट भाषा में संवाद करें लेकिन सिर्फ इतना करने भर से वो ट्रोल नहीं हो जाते। वो जनता हैं। उनकी भावनाओं का अपना महत्व है। ट्रोल बताकर उन्हें अपमानित करने या खारिज करने की बजाय, जरूरी ये है कि उनको भी सुना जाए। यही नये मीडिया में बने रहने का नया सिद्धांत है। अखबार और टीवी की तरह यह सूचनाओं का संपादित उपवन नहीं है। ये सूचनाओं का एक जंगल है जहां कही हाथी भी मिलेगा तो कहीं सांप बिच्छू भी घात लगाये बैठे होंगे। कहीं खुशबूदार फूल होंगे तो कहीं कटीलीं झाड़ियां भी। इस जंगल से बचकर निकलने की कला सीखने की जरूरत है। इसे ट्रोल बताकर इसका गला घोंटने की जरूरत नहीं है।





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