इतना आसान नहीं है अयोध्या को मिथिला से जोड़ना

पुष्य मित्र 

कल भारत के पीएम मोदी नेपाल के जनकपुर में थे और उन्होने जनकपुर और अयोध्या के बीच एक बस सेवा की शुरुआत की और उसे एक प्रतीक बनाने की कोशिश की जैसा वे अक्सरहां करते हैं. कि वे अयोध्या को फिर से मिथिला से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने जनकपुर मंदिर के विजिटर रजिस्टर पर जय सिया राम लिखा. जिसकी स्पेलिंग गलत थी और यह एक विवाद का विषय भी बना ही. फिर भी उनका जय सिया राम लिखना मुझे पसंद आया, एक ऐसे राजनेता का जिसके गणों के झुंड का जयघोष पिछले दो दशकों से जय श्री राम बन गया है.

जय श्री राम और जय सिया राम दोनों नारों में बड़ा फर्क है. जय श्री राम किसी युद्ध का जयघोष टाइप का लगता है और जय सिया राम किसी संत की वाणी. इसलिए जय सिया राम का इस्तेमाल अक्सर किसी से मिलने पर लोग करते हैं और जय श्री राम का विरोधियों को भयभीत करने के लिए. यह बताता है कि जब राम के आगे सिया लगती है तो राम लोकोपकारी हो जाते हैं और जब राम सिया से अलग हो जाते हैं तो उनका अस्तित्व अलग ही हो जाता है. इसलिए मुझे जय श्रीराम के बदले जय सिया राम बोलना अधिक पसंद है.

हालांकि यह एक अलग सवाल है. मेरा मूल सवाल है कि क्या बस चला देने भर से मिथिला और अयोध्या जुड़ जायेंगे? यह सवाल मेरे मन में कल से है और इसके जन्मदाता सदन झा सर हैं, जिन्होंने एक स्टेटस पर कमेंट लिखकर यह पूछा था. उनके सवाल के बाद से मेरे मन में यह सवाल शोर मचा रहा है. मैंने अपने इलाके के लोगों को खूब तीर्थ पर जाते देखा है. वे देवघर जाते हैं, तारापीठ जाते हैं, गंगासागर जाते हैं, चारो धाम जाते हैं, शिव की नगरी काशी जाते हैं, पुरी जाते हैं, कन्याकुमारी जाते हैं, वैष्णोदेवी जाते हैं. मगर किसी को मैंने अयोध्या जाते नहीं देखा. हां, कारसेवकों की अयोध्या जाने में जरूर दिलचस्पी रही है, मगर तीर्थयात्रियों की नहीं रही. जबकि राम को मिथिला में दामाद माना जाता है.

दिलचस्प है कि मिथिला के लोग शिव को भी दामाद मानते हैं और बसंत पंचमी के दिन बाबानगरी देवघर पहुंचकर उनके साथ खूब होली खेलते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें दामादों से स्नेह नहीं है. मगर वे राम के जन्मभूमि की तरफ नहीं जाते. विद्वान बतायेंगे कि क्या इसकी वजह यह है कि सीता, जिसे जानकी और मैथिली भी कहा जाता है, उसे अयोध्या में कभी सुख नहीं मिला?

विवाह करके गयी ही थी कि वनवास भेज दिया गया. वन में वह खुश रही, भले रावण ने अपहरण किया और बंदी बना लिया, मगर उससे पहले वन में सीता का जीवन सुखमय था. मगर जब फिर से अयोध्या लौटीं तो एक बार फिर उसे वनवास दे दिया गया. एक धोबी के कहने पर. सीता अयोध्या में कभी ठीक से नहीं रह पायीं. भले ही वह उनका ससुराल था. क्या यह एक दंश मिथिला के मन में गड़ा है कि यहां के लोग अयोध्या नहीं जाते? पता नहीं. इसका खुलासा मिथकों के जानकार करेंगे. और यह भी बतायेंगे कि पहले वनवास, फिर अग्निपरीक्षा, फिर वनवास… आखिर अयोध्यावासी राम से विवाह करके सीता को क्या मिला…

हालांकि यह सब प्रतीक भर है. कहें तो वाल्मिकी की कल्पना भी हो सकती है. क्योंकि अभी तक कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है. मगर यह कल्पना, यह मिथक, एक साहित्यिक कृति भारत के आम जनजीवन में इतनी गहरी रची बसी है कि कोई भारतीय इनसे मुक्त नहीं हो सकता. और कोई संवेदनशील व्यक्ति, खासकर वह अगर मिथिलावासी हो तो सीता के प्रति इस अमानवीय वर्ताव के लिए राम को कभी माफ नहीं कर सकता.

एक स्त्री को, अपने प्राणों से प्रिय पत्नी, जीवनसंगिनी को एक धोबी के आक्षेप पर राम छोड़ देते हैं तो उसका मकसद सिर्फ इतना होगा कि एक राजा के तौर पर वे पोलिटिकली करेक्ट दिखना चाहते होंगे. उनकी राजनीतिक अभिलाषाएं उनके व्यक्तिगत जीवन पर हावी रही और इसकी कीमत चुकायी सीता ने.

इस देश में पुरुषों की राजनीतिक अभिलाषाओं की कीमत स्त्रियां बेवजह चुकाती हैं. यह सिर्फ त्रेतायुग की बात नहीं है. हालांकि अपनी पत्नियों की भावनाओं को सिर्फ राम ही नहीं कुचलते, रावण के साथ रहकर भी मंदोदरी दुखी होती है. ऐसे में शिव ही आदर्श पति साबित होते हैं. इसलिए मिथिला में हम उन्हें आदर्श दामाद मानते हैं. मोदी जी खुद एक आदर्श पति नहीं हैं, यह सर्वविदित है. उनकी सीता भी उनके राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की वजह से वनवास भोग रही हैं. हालांकि वे राम नहीं हैं, न शिव हैं. इसलिए जब वे अयोध्या को मिथिला से जोड़ने की बात करते हैं तो बात खोखली लगती है.

अयोध्या को मिथिला से अगर जोड़ना है तो इसके लिए सिर्फ बस चला देना पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए जनकनंदिनी सीता के साथ त्रेतायुग में किये गये अपराधों का परिमार्जन करना होगा. अयोध्या को माफी मांगनी होगी. अपना व्यवहार बदलना पड़ेगा. अयोध्या जब तक मिथिला की मैथिली को सम्मानपूर्वक रखने लायक नगर नहीं बनेगा. राम जब तक स्त्री का सम्मान नहीं सीखेंगे, अयोध्या और मिथिला का मिलन मुमकिन नहीं है. ध्यान रखियेगा कि अयोध्या यहां एक प्रतीक भर है. और सीता और राम की कहानी भी.

(वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र के टाइम लाइन से साभार )






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