क्या है ट्रेनों की लेट लतीफी का राज, ​जानिए क्यों बिहार के नेता ही रेल को चला सकते हैं बेहतर

 

अभी न कोहरे का मौसम है, न बारिश का मगर यूपी-बिहार से गुजरने वाली लम्बी दूरी की अमूमन हर ट्रेन लेट लतीफी का रिकॉर्ड तोड़ रही है। 24 घन्टे, 30 घण्टे, 40 घण्टे तक लेट रही है। ट्रेनों खुल ही रही है 10-15 घण्टे लेट। ट्रेनों की लेट लतीफी की यह हालत कभी नहीं थी। सुरेश प्रभु और पीयूष गोयल जैसे चार्टर अकाउंटेंट भी इसकी लेट लतीफी का अकाउंट ठीक नहीं कर पाए। सच पूछिये तो बुरी तरह फेल रहे और इनकी पूरी क्रेडिबिलिटी पर बट्टा लग गया। लोग लालू और रामविलास का जमाना याद करके आहें भरते हैं और सोचते हैं कि काश वह जमाना लौट आता। जब चमक दमक भले कम थी मगर ट्रेनें ठीक चलती थीं।
यह एक सच्चाई जरूर है कि यूपी-बिहार की जमीनी सच्चाइयों का समझने वाला इंसान ही रेलवे को बेहतर चला सकता है। हालांकि यह हाइपोथीसिस की बात है, पहले यह समझने की जरूरत है कि इस रूट में ट्रेन इतनी लेट क्यों होती है।
नीचे एक चार्ट है, जिसमें पिछले से पिछले हफ्ते के ट्रेनों के पंक्चुअलिटी का विवरण है। अमूमन ये आंकड़े उस धारणा के अनुरूप है कि दक्षिण और पश्चिम भारत की ट्रेनें समय से हैं और उत्तर पूर्व की लेट लतीफ। मगर आप इस चार्ट में देखेंगे कि रांची और धनबाद स्टेशन पंक्चुअल लिस्ट में हैं। इसकी वजह क्या है? अगर यह कहा जाए कि बिहार यूपी और झारखंड के रेलकर्मियों के गैर पेशेवर रवैये की वजह से इन इलाकों में ट्रेनें लेट होती हैं तो ये स्टेशन इस धारणा को गलत साबित करते हैं।
इसकी वजह यह है कि इन स्टेशनों से होकर गुजरने वाली अधिकतर ट्रेनें यूपी के मुग़लसराय-इलाहाबाद-कानपुर रूट से नहीं गुजरतीं। यही वह रूट है जहां ट्रेनें सबसे अधिक लेट होती हैं। क्योंकि यह देश का सबसे बिजी रूट बन गया है। बिहार-झारखंड-बंगाल, नार्थ ईस्ट के राज्य और कई दफा ओडिशा से दिल्ली और मुम्बई की ट्रेनें भी इस रूट से गुजरती हैं। एक अनुमान के मुताबिक रोज इस रूट से 500 ट्रेनें गुजरती हैं। इसमें गुड्स ट्रेन भी शामिल हैं।
इस तरह समझिये कि इस रूट से हर तीसरे मिनट में कोई न कोई ट्रेन पास करती है। और अगर समर वेकेशन, पूजा वगैरह पर स्पेशल ट्रेनें चलती हैं तो यह भीड़ और बढ़ जाती हैं। आप अंदाजा लगाईये कि इतनी ट्रेनों के ट्रैफिक को कैसे मैनेज किया जाता होगा। एक ट्रेन टाइम से इधर उधर हुई तो मामला गड़बड़ाने लगता है। अब चुकी ज्यादातर ट्रेनें ही टाइम टेबल से बिछड़ गयी हैं, तो रोज हर चीज नये सिरे से तय होती है। ट्रेनों की लेट लतीफी का प्रबंधन ही हर रोज होता होगा।
यह व्यवस्था लगातार गड़बड़ा रही है, क्योंकि हर साल नई ट्रेनें इस रूट पर उतार दी जाती हैं। इसके अलावा इस रूट पर लगातार मेंटेनेंस का काम चलता रहता है, पटरियां पुरानी हो गयी हैं, इसलिये बार-बार कॉशन लिया जाता है। कर्मचारी न सिर्फ गैर पेशेवर हैं, बल्कि भ्रष्ट हैं। बड़ी ट्रेनों के प्लेटफार्म की नीलामी की बात भी कई बार सुनी गई है। इस चक्कर में बड़े स्टेशनों को आउटर सिग्नल पर खड़ा कर दिया जाता है।
यह एक ऐसा मकड़जाल है जिसमें इस रूट का रेलवे बुरी तरह उलझ चुका है। इसका सबसे सटीक समाधान है कि इस रूट के पैरलल कुछ और रूट विकसित हों और इसे फोर लेन या सिक्स लेन किया जाए। जहाँ तक पैरलल रूट का सवाल है, मुरादाबाद-लखनऊ और लखनऊ-गोरखपुर के रूट हैं। मगर ये भी अधोसंरचना के मामले के पिछड़े हैं। लिहाजा इनकी हालत और बुरी है। और जहां तक इस रूट को फोर लेन और सिक्स लेन बनाने की बात है तो इस बारे में अब तक सोचा भी नहीं गया होगा। हां, ममता बनर्जी ने एक बार जरूर गुड्स ट्रेन के लिये अलग रुट बनाने की बात की थी मगर उसका क्या हुआ पता नहीं चला।
मसला यह भी है कि क्या मौजूदा निजाम रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्टर के विकास के लिये इच्छुक है या वह एक बड़ी आबादी को एयर लाइन्स में शिफ्ट कराने की तैयारी करा रहा है। और यह भी सुनने की मिलता है कि गुपचुप प्राइवेटाइजेशन की तैयारियां चल रही है।
मसला जो भी हो। मगर सरकार की उपेक्षा की वजह से रेलवे का कबाड़ा हो रहा है। यह रेलवे आज यूपी बिहार के लोगों के लिये बड़ी जरूरत बन चुका है। यहां के कम आय वाले मजदूर अभी हवाई सेवा के लिये तैयार नहीं हैं। वे बसों की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। और बसों का परिचालन भी किस तरह से हो रहा है यह मोतीहारी के हादसे से साफ हो गया। अब हमें यह तय करना है कि या तो हम सरकार को इस व्यवस्था को सुधारने के लिये मजबूर करें या झेलते रहें।
(यह आलेख पत्रकार पुष्य मित्र के फेसबुक टाइमलाइन से साभार है।)






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