ठहाके लगाना खुशी का लक्षण नहीं

दिलीप मंडल

क्या आप उन लोगों में हैं, जो मॉर्निंग वाक के समय पार्क में ठहाके लगाते हैं. मुमकिन है कि आपने ऐसे लोगों को देखा होगा जो ऐसा करते हैं. हंसना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और इससे तनाव भी दूर होता है. लेकिन अगर आप खुश नहीं हैं, तो भी क्या आप हंस सकते हैं? हंसने को अगर आप इलाज मानते हैं तो आपको हर हाल में हंसना चाहिए. इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि आपकी अपनी दशा क्या है और आपकी तथा आसपास की परिस्थितियां कैसी हैं और आपके लिए वक्त कैसा है. लेकिन पांच मिनट के इस ठहाके को खुशी मान लेने का कोई कारण नहीं है.

भारत एक गरीब देश हैं. दुनिया के सबसे गरीब देशों में इसका नाम है. यहां सबसे ज्यादा निरक्षर रहते हैं. लोग बीमार भी खूब रहते हैं. औरतों की हालत भी अच्छी नहीं है. यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) के ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स पर भारत दुनिया का 131वें नंबर का देश है. यूएनडीपी स्वास्थ्य, शिक्षा और स्त्री समानता आदि मानकों पर यह इंडेक्स हर साल तैयार करता है. ये आंकड़े बताते हैं कि भारत सुखी देश नहीं है. आबादी का एक हिस्सा सुखी है, लेकिन ज्यादातर आबादी सुखी नहीं है.

ये जो लोग सुखी नहीं हैं, क्या वे खुश रह सकते हैं?

इस बारे में अलग अलग राय है. संयुक्त राष्ट्र ने जब हैप्पीनेस इंडेक्स बनाने की सोची तो इसके लिए एक सर्वे प्लान किया गया. इसमें 14 तरह के सवाल पूछे गए. ये सवाल अर्थव्यवस्था, नागरिकों की हिस्सेदारी, संचार और टेक्नोल़जी, सामाजिक विविधता, शिक्षा और परिवार, अच्छा महसूस करने का एहसास, पर्यावरण और ऊर्जा, भोजन और रहने की जगह, सरकार और नीतियां, कानून और व्यवस्था, स्वास्थ्य, धर्म और नैतिकता, आने जाने की सुविधा और रोजगार से जुड़े थे.

यानी अगर किसी देश में नागरिकों के जीवन में ये तमाम पहलू ठीक हैं, तो उस देश के नागरिकों को खुश माना जाएगा. जाहिर है कि भारत इनमें से ज्यादातर मानकों पर बेहतर स्थिति में नहीं है. यही वजह है कि वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स पर भारत 133वें नंबर का देश है. ह्यूमन डेवलपमेंट और हैप्पीनेस के इंडेक्स पर भारत का लगभग एक ही पायदान पर होना बताता है कि बिना विकास और मानवीय सुख सुविधाओं और बेहतर परिस्थितियों के खुशी नहीं मिल सकती.

लेकिन एक विचार यह भी है कि सुख और खुशी का ऐसा कोई संबंध नहीं है. यह विचार कहता है कि आपके जीवन में चाहे जितनी तकलीफ हो, आपको खुश रहना चाहिए. देश और समाज में सब कुछ वैसा ही बना रहे, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल रहें, रोजगार के अवसर कम हो जाएं. प्रदूषण बढ़ता जाए, सामाजिक विविधता का अभाव हो, कानून और व्यवस्था बदहाल रहे, रहने को हवादार मकान न हो, और भी तमाम समस्याएं हों, फिर भी आदमी को खुश रहना चाहिए.

इस विचार को मानने वाले कम नहीं हैं. कई धार्मिक और पंथिक विचार और तमाम तरह के बाबा और महात्मा यह बताते हैं कि हर हाल में खुश रहना चाहिए, संतुष्ट रहना चाहिए. ये लोग खुशी को वस्तुगत स्थितियों से परे की चीज मानते हैं. इनका लगभग अकाट्य सा दिखने वाला तर्क होता है कि सबसे अमीर आदमी भी नाखुश हो सकता है. सोने के पलंग पर भी नींद न आने की समस्या हो सकती है और पत्थर पर लेटा आदमी भी चैन की नींद लेता है…आदि.

कोई संत-महात्मा-वेलनेस एक्सपर्ट यह कह सकता है कि दीन-दुनिया को भूलकर अगर आप आश्रम या इनके रिसॉर्ट में आ जाएंगे तो आपको खुशी का एहसास होगा. आपके जीवन की स्थितियां स्थायी तौर पर नहीं बदलेगी, लेकिन आपके मानसिक कष्ट दूर हो जाएंगे. ऐसे प्रोग्राम में शामिल होने के दौरान आप किसी के संपर्क में नहीं होंगे. आप अखबार नहीं पढ़ेंगे, टीवी-रेडियो से दूर रहेंगे, मोबाइल फोन और इंटरनेट आपके पास नहीं होगा. आप यहां अपने आप के साथ रहेंगे. इस तरह आपके सारे तनाव दूर हो जाएंगे और आपके जीवन के मानसिक कष्ट दूर हो जाएंगे.

हालांकि एक या दो हफ्ते के बाद जब वही व्यक्ति अपने मूल स्थान यानी ओरिजनल पोजिशन पर लौटता है, तो यह कह पाना मुश्किल है कि उसकी मानसिक स्थिति का बदलाव कितना स्थायी रह पाता है. अपने आप से साक्षात्कार और खुद से संवाद एक अच्छी चीज है, लेकिन यह कह पाना मुश्किल है कि इससे खुश होने की स्थायी स्थितियां पैदा हो जाती हैं.

यह विचार कि सुखी हुए बिना खुश रहा जा सकता है अपने आप में एक छल भी है. यह विचार कहता है कि गरीबी और अमीरी की खाई के बने रहते हुए भी गरीबों को खुश रहना चाहिए. या कि सरकार अगर स्वास्थ्य पर पर्याप्त खर्च न करे और लोग बीमार रहें, तो भी खुश रहना मुमकिन है. अगर शिक्षा का समुचित बंदोबस्त नहीं है, रोजगार घट रहे हैं, और जीवन में घनघोर अनिश्चय है तो भी खुश रहना चाहिए. कानून और व्यवस्था खराब हो और महिलाओं का जीवन असुरक्षित हो तो भी खुश रहना मुमकिन है. राजकाज में जिन समुदायों की हिस्सेदारी नहीं है और जो आर्थिक-सामाजिक जीवन में अलग थलग पड़े हुए हैं, उन्हें भी खुश रहना चाहिए. हवा बेहद प्रदूषित हो और सांस लेना मुश्किल हो रहा है और सरकारी नीतियों से हालात सुधरने की जगह बिगड़ रहे हों, तो भी ठहाके लगाए जाएं.

दरअसल स्थितियों को दुरुस्त किए बिना खुश रहने का विचार यथास्थिति को बनाए रखने का विचार है. मानव सभ्यता आगे इसलिए बढ़ी है और बेहतर करने और पाने की लालसा है. असंतोष इस मायने में एक सकारात्मक मानवीय गुण है. जो जैसा चल रहा है, वह काफी नहीं है और इसे और बेहतर होना चाहिए. इस एक विचार ने दुनिया को बेहतर दिशा में बदला है.

अनावश्यक दुखी नहीं रहना चाहिए. लेकिन जब हालात तकलीफदेह हों तो उन हालात को बदलने की जरूरत होती है. न कि यह कहने कि हालात कैसे भी हों, हम तो खुश हो लेंगे. ठहाके लगा लेंगे. क्योंकि पार्क में ठहाका लगाकर जब आप घर लौटेंगे तो देश और काल की तमाम समस्याएं मुंह बाए आपका इंतजार कर रही होंगी.

सुख की तलाश कीजिए, खुशी पीछे-पीछे चलकर आएगी.

(नवभारत टाइम्स में)






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