23 मार्च : महाबलिदान दिवस : भगतसिंह : लेफ्ट एंड राइट

उमेश यादव

फांसी का फंदा भी क्रांतिकारी भगतसिंह की नास्तिकता और धार्मिक अनास्था के संकल्प को नहीं डिगा सका। इतना साहस तो केवल भगतसिंह में ही हो सकता है। हम-आप जैसों में नहीं और उनमें तो बिल्कुल भी नहीं, जो सियासी टुच्चई के लिए भगतसिंह के नाम का इस्तेमाल करते आए हैं। शहादत ने भगतसिंह को हर वर्ग के दिलों में जगह दी। उनके अनुयायी होने का दावा करने वालों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा, धार्मिक अंधत्व और अधार्मिक अंधत्व ने कभी भगतसिंह की सहृदयता को नहीं समझा। संभव है, समझने की कोशिश ही नहीं की।
चाहे वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, दोनों ने भगतसिंह के नाम को अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया। दक्षिणपंथी यह तक कहने से नहीं चूके कि भगतसिंह ने फांसी के पहले ईश्वर का स्मरण कर लिया था। वे श्रीमद् भगवद् गीता पढऩे लगे थे। मतलब साफ है कि दक्षिणपंथी यह मानने को तैयार ही नहीं रहे कि भगतसिंह नास्तिक थे। भगतसिंह ने आजादी की लड़ाई में अपने सिख धर्म की पहचान केशों को त्याग दिया। इसके बावजूद दक्षिणपंथ तो पगड़ीवाले भगतसिंह की ही रट लगाए बैठा है।
वामपंथियों ने भगतसिंह की नास्तिकता और धार्मिक अनास्था को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। वे भगतसिंह में माक्र्स और लेनिन देखने लगे। कई ने तो माओ भी देख लिया। अच्छा होता कि ये लोग भगतसिंह में केवल भगतसिंह ही देखते। भगतसिंह के खुले दिल में झांकते, लेकिन नहीं झांका। कट्टरता सिर्फ धर्म या मजहब की ही नहीं होती, राजनीतिक चालबाजी की भी होती है। वामपंथियों ने धर्म में गहरी आस्था रखने वाले कई स्वाधीनता सेनानियों की देशभक्ति को खारिज कर दिया। इनमें एक बड़ा नाम है- विनायक दामोदर सावरकर। वामपंथी कहते हैं कि सावरकर ने सजा से मुक्ति के लिए ब्रिटिश सरकार को माफीनामा लिखा था। वामपंथी शायद नहीं जानते कि भगतसिंह ने सावरकर को बड़ा देशभक्त बताया था। प्रमाण के लिए भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज जरूर पलटें। भगतसिंह की भले ही किसी धर्म में आस्था नहीं हो, लेकिन उन्होंने देशभक्ति को कभी इस तराजू में नहीं तौला।






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