अमित रंजन ओझा के कलम से……..

मित्रो वरीयता मिलने के बाद हमें अपनी जबाबदेही का बोध है | हम लोग ने इसका ब्लूप्रिंट बना रखा है |  उसपर समय आने पर हमारी क़ाबलियत पता चल जाएगा .

पत्र पढ़ने से ही समझ आता है कि पत्र में हर जगह स्नातकोत्तर (+2) शिक्षक शब्द आया है । जिससे लगता है कि राज्यस्तरीय स्नातकोत्तर (+2) शिक्षक संगठन बैठ कर पत्र टाइप करवाया है ।नहीं तो सरकार हर जगह उच्च माध्यमिक शब्द प्रयोग करती थी ।

बात यहाँ है की पिछले कुछ  वर्षो हमारे साथ जो हो रहा था क्या वही मानवता और नैतिकता है . उनके नैतिकता का कुछ उदाहरण प्रस्तुत करता हु .१ +२ का क्लास नहीं चलने देना २ हमें 9 और 10 का क्लास टीचर बनाना ३ +२ का कोई जानकारी नहीं देना ४ यहाँ तक की २०१७ का रिजल्ट ख़राब होने पर भी असहयोग करना ताकि हमारी गिनती नॉन परफार्मिंग के तौर पर हो ५.कॉपी मूल्यांकन में हमारी जगह माध्यमिक टीचर +२ का कॉपी जांच रहे थे .६.बस्ता का मेंबर +२ टीचर भी रहे है . क्या कभी हम लोग के लिए यूनियन को फाइट करते देखा है      मै पूछता हु की जब हमारे साथ अन्याय हो रहा था तब बाकि की नैतिकता कहा थी . क्यों नहीं बस्ता हमारे मान सामान की बात करता था .  आखिर क्यों एक नई संघ की जरुरत दिखी . मित्रो आज जो हम गोवेर्मेंट की निति में बदलाव महसूस कर रहे है इसका बहुत क्रेडिट हमारे महासचिव कृतन्जय जी को है . जो उदाहरण से बताता हु .१. सबसे पहले यह परसेप्शन बदला की उच्चा माध्यमिक एक अलग विंग है .२ आपकी समस्या को एक मात्र कृतन्जय जी ही रकते है जिसका रिजल्ट आपके सामने है .३.सेवा शर्त ड्राफ्टिंग में +२ सब्जेक्ट को एड्रेस के लिए बस्ता को न बुलाकर कृतन्जय जी को बुलाना साबित करता है की गवर्नमेंट भी अब मानने लगी की +२ बस्ता से अलग है ४ आपको टीचर न कह कर लेक्चरर कहा जाइ की फाइट भी कृतन्जय जी ही रख रहे है . और बहुत बात है आगे कहुगा .

अमित रंजन ओझा
जिला सचिव
नालंदा
SPGTO-750






Related News

  • हिंदी दिवस के लिए विशेष …
  • अमित रंजन ओझा के कलम से……..
  • बिहार में दो साल में 5 पत्रकारों की हत्या; सभी को मारी गई गोली
  • वीआईपी इलाके में सेवक के घर जैसा है ‘चौबे बाबा’ का बंग्ला
  • तार्किक एवं विवेकशील समाज के लिए
  • बिहार के लेनिन नहीं, फुले-आंबेडकर थे जगदेव प्रसाद कुशवाहा
  • जागृति से लेकर आरक्षण तक बॉलीबुड ने शिक्षकों को दमदारी से पेश किया
  • नरेन्द्र मोदी को मंत्रिमंडल से क्या काम?
  • Comments are Closed