आपको क्या लग रहा चीन भारत से घाटे का सौदा करेगा ?

संजय तिवारी
व्यापारी का सबसे बड़ा शत्रु होता है झगड़ा। एक अच्छा व्यापारी कभी किसी से झगड़ा नहीं करता। वह सबसे अच्छा संबंध रखता है, अपना माल बेचता है और आगे बढ़ जाता है।
चीन जिस नये पूंजीवाद के उफान पर सवार है वह यही एक बात आज तक नहीं समझ पाया। भारत पाकिस्तान के सीमा विवाद पर तो वह सलाह देता है कि दोनों देश बातचीत के जरिए मामले को सुलझा लें लेकिन स्वयं आकर गलवान घाटी में उलझ जाता है।
चीन पर बहुत कुछ है जिस पर लिखा जा सकता है। लेकिन फिलहाल इतना ही साम्यवादी चीन चाहकर भी संसार की दूसरी महाशक्ति नहीं बन पायेगा। जो देश आपका सबसे विकसित बाजार हो आप उसी से सीमा विवाद पर उलझेंगे तो आप अपना बाजार चौपट करेंगे। हो सकता है चीन आंतरिक व्यवस्था के स्तर पर एक अच्छा तानाशाह हो लेकिन वाह्य व्यवस्था के मामले में वह एक अच्छा भामाशाह बिल्कुल नहीं है।
भारत से उलझकर वह एक घाटे का सौदा कर रहा है। इसका गंभीर परिणाम ये होगा कि भारत को न चाहते हुए भी अमेरिका की तरफ झुकना पड़ेगा। असल में अमेरिका यही चाहता है कि वह चीन के मुकाबले में भारत को अपने साथ खड़ा कर ले। फिर जापान, ताइवान, आष्ट्रेलिया, साउथ कोरिया चीन के खिलाफ हो रही मोर्चेबंदी में पहले ही अमेरिका के साथ हैं। भारत अगर क्षेत्रीय ताकत के रूप में चीन को चुनौती देता है तो ये सारे देश परोक्ष रूप से भारत के साथ खड़े दिखाई देंगे।
और जो नया कूटनीतिक युद्ध शुरु होगा उसमें चीन के लिए पाकिस्तान और नेपाल बहुत कमजोर मोहरे हैं। क्योंकि भारत के पूरब का कोई भी देश चीन के साम्यवादी अधिपत्य से ज्यादा भारत के लोकतंत्र के साथ सहज है। ऐसे में भारत से लड़ता हुआ दिखाई देता चीन भारत को एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में उभरने में मदद करने के अलावा और कोई नुकसान नहीं कर सकता।
मुझे नहीं लगता चीन ऐसी गलती करेगा। लेकिन अगर वह करता है तो यह भारत के लिए एक स्वर्णिम अवसर होगा। आखिर इक्कीसवीं सदी में इन्हीं दोनों को महाशक्ति बनना है। टकराव से बचेंगे भी तो कब तक?
(चित्र: ताइवान न्यूज में प्रकाशित एक रेखांकन)
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