30 साल बाद आया ऐसा पृत्रपक्ष, जनिए क्या करें और क्या न करें

श्राद्ध पक्ष में पितरों के श्राद्ध के समय कुछ विशेष वस्तुओं और सामग्री का उपयोग और निषेध बताया गया है। जिसके अनुसारः-
श्राद्ध में सात पदार्थ- गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल महत्वपूर्ण हैं।
तुलसी से पितृगण प्रलयकाल तक प्रसन्न और संतुष्ट रहते हैं। मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं।
श्राद्ध सोने, चांदी कांसे, तांबे के पात्र से या पत्तल के प्रयोग से करना चाहिए।
श्राद्ध में लोहे का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है।
तर्पण विधि- पीतल की थाली में विशुद्ध जल भरकर, उसमें थोड़े काले तिल व दूध डालकर अपने समक्ष रख लें एंव उसके आगे दूसरा खाली पात्र रख लें। तर्पण करते समय दोनों हाथ के अंगूठे और तर्जनी के मध्य कुश लेकर अंजली बना लें अर्थात दोनों हाथों को परस्पर मिलाकर उस मृत प्राणी का नाम लेकर तृप्यन्ताम कहते हुये अंजली में भरा हुये जल को दूसरे खाली पात्र में छोड़ दें। एक-2 व्यक्ति के लिए कम से कम तीन-तीन अंजली तर्पण करना उत्तम रहता है।
जल के थोड़े भाग को ऑखों में लगायें
‘ऊॅत्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि, तन्नो देवी प्रचोदयात्”। इस मन्त्र की 2 माला जाप करने के पश्चात पूजन स्थान पर रखें हुये जल के थोड़े भाग को ऑखों में लगायें, थोड़ा जल घर में छिड़क दें और बचे हुये जल को पीपल के पेड़ में अर्पित कर दें। ऐसा करने से घर से नकारात्मक उर्जा निकल जायेगी और घर की लगभग हर प्रकार की समस्या से आप मुक्त हो जायेंगे।
तीन दशक बाद 14 दिनों का पितृपक्ष
गोपालगंज. पितृपक्ष इस माह के कृष्ण पक्ष में पितरों के निर्मित तर्पण. हिंदी के बारहों मासो में आश्विन मास का अपना विशिष्ट स्थान है. 27 नक्षत्रों में प्रमुख व प्रथम नक्षत्र अश्विन के नाम पर इसका नाम आश्विन पड़ा. इस बार इस मास में तिथि के क्रम में क्षय व वृद्धि दोनों का ही योग बनेगा. इस वजह से पितृपक्ष 14 दिनों का होगा. आचार्य शंभु नाथ मिश्र के अनुसार इस बार पितृपक्ष 17 सितंबर से शुरू होकर 30 सितंबर तक चलेगा, जबकि पंचमी व पष्ठी का श्राद्ध 21 सितंबर को किया जायेगा. सब मिला कर देखा जाये तो 30 तिथियों का एक मास आश्विन पूरा रहेगा. अंतर बस यह है कि आश्विन कृष्ण पक्ष में नवमी के क्षय से 14 दिन का, जबकि शुक्ल पक्ष में द्वितीया की वृद्धि से 16 दिन का होगा. शास्त्र के अनुसार सूर्योदय के बाद किसी तिथि का शुरू हो और दूसरे सूर्योंदय के पहले उसका अंत हो जाये तो उसे क्षय तिथि कहते हैं.
पितृपक्ष में तिथियों की चाल
श्राद्ध दिन तारीख
प्रतिपदा शनिवार 17 सितंबर
द्वितीया रविवार 18 सितंबर
तृतीया सोमवार 19 सितंबर
चतुर्थी मंगलवार 20 सितंबर
पंचमी-षष्ठी बुधवार 21 सितंबर
सप्तमी गुरुवार 22 सितंबर
पितृपक्ष में अपने परिजनों को एहसास कराते हैं पितर

भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं और 16 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं. शास्त्रों में बताया गया है कि पितृपक्ष के दौरान पितृगण अपने परिजनों के आसपास रहते हैं. इसलिए इन दिनों में कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हो. पितरों को खुश रखने के लिए पितृपक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए. पितृपक्ष के दौरान जामाता(दामाद), भांजा व गुरु को भोजन कराना चाहिए. इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं. भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़ कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं. इससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते. इधर, पितृपक्ष को लेकर गया आदि स्थलों पर जानेवाले कई लोग होटल व धर्मशाला की बुकिंग में लग गये हैं.






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