नशे की खेती पर वोट की राजनीति!
संजीव कुमार सिंह,समस्तीपुर
देश को प्रथम राष्ट्रपति देने वाला बिहार बदल चुका है। यहां के नेतागण भी बदल चुके है।अब यहां नशापान की खेती पर वोट की राजनीति चल रही है। एक समाज के वोट के खातिर नशा पान करने को लेकर राजनेता सीना तानकर कहने से बाज नहीं आ रहे है कि बिहार में ताड़ी फ्री रहेगा। वर्ष 2005 में बिहार में बीजेपी एवं जेडीयू गठबंधन की सरकार बनी। सरकार ने कामकाज को पटरी पर लाने के लिए राजस्व उगाही का एक तरीका खोजा। झारखंड के बिहार से अलग हो जाने के बाद राजस्व की भरपायी के लिए पंचायत स्तर पर शराब के ठेके खोले गये। इससे होने वाले आय से विद्यालयों की शैक्षणिक कार्य को बढ़ावा दिया गया। वर्ष 2010 में पुन: इस गठबंधन की सरकार के लिए वोट डाले जाने का समय आया। राजद, लोजपा कांग्रेस जैसे दल के नेता जनता के बीच जाकर यह कहने से बाज नहंी आए की बिहार के बच्चों का भविष्य बिगाड़ने वाले को वोट न दें। शराब का ठेका खोलने वाले को वोट न दें। संयोग से जनता ने एक न मानी और यह गठबंधन सत्ता में आ गयी। मांझी के सीएम बनने के बाद भाजपा का नीतीश से मोहभंग होता चला गया। नीतीश कुमार ने भी नये साथी तलाश कर लिये। लोजपा ने राजद का दामन छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। बिहार की राजनीति में आमूल- चूल परिवर्तन हुए। इस परिवर्तन के बीच बिहार का विधानसभा चुनाव हुआ। चुनाव के दौरान जनता के बीच महिलाओं ने नीतीश के समक्ष मांग रखी की बिहार में पूर्ण शराब बंदी को लागू करिए। नीतीश ने भी सभाओं में इस मांग को मानकर वोट करने की अपील की। संयोग से राजद, जदयू तथा कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई। अब बिहार में पूर्ण शराब बंदी कानून लागू कर दिया गया। सभी ठेको को बंद कर दिया गया। ताड़ी जैसे नशापान के कारोबार को बंद करने की बात सामने आने लगी तो राजनेताओं ने इस पर आपत्ति जता कर नशापान की खेती पर वोट की राजनीति आरम्भ कर दी। ताड़ी को फ्री कर दिया गया। नीतीश इसे करने के पक्ष में थे नहीं, लेकिन गठबंधन के कारण उन्हें न चाहते हुये भी यह करना पड़ा। अब आप सोचिए, कि एक पासी समाज के व्यवसाय के लिए अन्य समाज के लोग ताड़ी पीए। ताड़ी फ्री की मांग करने वाले दलों में लोजपा, हम, राजद ने मुख्य भूमिका निभाई है। ऐसे में कहा जा सकता है कि बिहार में न चाहकर भी नीतीश की पूर्णशराब बंदी के बीच ताड़ी फ्री रह गया। क्या हमें ऐसे राजनेता चाहिए जो नशापान की खेती पर वोट की रोटी सेकने का कार्य करें? क्या पूर्ण शराब बंदी कह सकते है इन्हें? या अधूरा शराबबंदी? (संजीव कुमार सिंह, आईना समस्तीपुर के संपादक हैं. एसन्यूज डॉट इन से साभार)
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