मुस्कान बिखेरती सोनपुर की सामुदायिक पुलिस

सामुदायिक पुलिस, सोनपुर मेला

साल 2008 में विदेशी सैलानियों से चार समोसे के लिए 10,000 रूपए वसूलने वाले की ठगी उजागर कर सोनपुर मेले की सामुदायिक पुलिस सुर्ख़ियों में आई थी.बिहार में लगने वाले मशहूर सोनपुर मेले में बीते आठ साल से सामुदायिक पुलिस काम कर रही है. बग़ैर वेतन काम करने वाले नौजवानों की टोली मेला घूमने आए लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेर देती है“आप नहीं होते तो पूरा मेला में अपने बचवा (बच्चे) को हम कहां ढूंढते?”, बेगूसराय की रीता देवी ने रूंधे गले से जब यह कहा तो उनके स्वर में कातरता साफ़ झलक रही थी. उनका 12 साल का बेटा मेले में बने सामुदायिक पुलिस के दफ़्तर में बीते दो घंटे से बैठा था. ठीक इसी तरह पांच साल की कुसुम अपनी मां से बिछड़ गई. सामुदायिक पुलिस टीम के सदस्य इस रोती हुई बच्ची को बहलाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं. सामुदायिक पुलिस के लोग इस बच्ची का हुलिया और उसके कपड़ों का ब्योरा माइक पर बार-बार बता रहे हैं ताकि कुसुम के रिश्तेदार पंहुच जाएं. सोनपुर मेले में सामुदायिक पुलिस की शुरूआत साल 2008 में हुई. तत्कालीन डीएसपी प्राणतोश दास ने इसकी शुरूआत की थी. सोनपुर मेले में इस बार सामुदायिक पुलिस के 451 स्वयंसेवक लगे हुए हैं.I

 

इसमें 65 लड़कियां भी शामिल हैं. रंजना सिंह उनमें से एक है. वे सोनपुर के नज़दीक डुमरी गांव की रहने वाली हैं. उन्होंने साल 2009 में महिला जेबकतरों के गैंग का भंडाफोड़ किया था. रंजना ने कहा, “उस समय सामान चोरी होने की शिकायतें लगातार आ रही थीं. देखने पर पता चला कि सारी चोरियां एक ही तरीक़े से झोला काटकर हो रही थीं.” रंजना ने दूसरे लोगों के साथ मिलकर इन महिलाओं को रंगे हाथ पकड़ा था. रंजना कहती हैं, “इस घटना के बाद लोग मुझे प्रशंसा की नज़रों से देखते थे. मेरे कम्युनिटी पुलिस में काम करने से नाराज़ मां और भाई का ग़ुस्सा भी इसके बाद शांत हो गया.”सामुदायिक पुलिस, सोनपुर मेलाI

पांच किलोमीटर के दायरे में फैले सोनपुर मेले को 18 भागों में बांटकर सामुदायिक पुलिस के लोग तैनात किए गए हैं. सामुदायिक पुलिस में बहाली की प्रकिया दशहरे के बाद ही शुरू हो जाती है. इसके लिए फ़ॉर्म निकाला जाता है, जिसके साथ वेरीफ़िकेशन के लिए प्रमाण पत्र देने होते हैं. मेला शुरू होने से पहले काम करने के तरीक़ों की ट्रेनिंग दी जाती है. इसके साथ ही शपथ भी दिलवाई जाती है कि ड्यूटी के दौरान स्वयंसेवक किसी तरह का नशा नहीं करेंगे. सामुदायिक पुलिस के संयोजक राजीव कुमार कहते है, “साल 2008 से पहले कुछ घटनाओं की वजह से सोनपुर मेले की बदनामी हो रही थी. यह डर लगने लगा था कि मेले में अगर लोगों ने आना छोड़ दिया तो एक बड़ी आबादी के सामने रोज़ी रोटी की दिक़्क़त आ जाएगी. उस संकट से निपटने के लिए ही सामुदायिक पुलिस तैयार की गई.” सामुदायिक पुलिस के स्वयंसेवक चार शिफ़्टों में काम करते हैं. स्वयंसेवकों को अपने लिए तीन घंटे की शिफ्ट चुनने की आज़ादी होती है.

बीते 25 साल से सोनपुर मेला कमेटी के सदस्य रहे माधव सिंह कहते हैं, “सामुदायिक पुलिस आने के बाद मेला चलाने में आसानी होने लगी. इसकी एक वजह यह है कि आम लोग सामुदायिक पुलिस के पास जाने से उस तरह से नहीं डरते जैसे पुलिस के पास जाने से.”अनुमान है कि मेले में हर साल 50 लाख देशी विदेशी पर्यटक आते हैं. बीते साल 3,234 बच्चों को सामुदायिक पुलिस के सहयोग से उनके अभिभावकों से मिलाया गया था. बिना किसी वेतन के मेले में महीने भर काम करने वाले स्वयंसेवक चाहते है कि सरकार अब इनकी तरफ़ ध्यान दे. (from बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम)






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