फिसलन भरी ढलान पर यात्रा कर रही बसपा
दिलीप सी मंडल
मान्यवर कांशीराम के भाषणों की बहुजन संगठक में रिपोर्टिंग पढ़ रहा हूं. आप भी पढ़िए.
उनकी हर सभा में जिस जाति का आदमी अध्यक्षता करता था, उस जाति का आदमी मंच संचालन नहीं करता था, स्वागत भाषण तीसरी जाति का आदमी देता था तो धन्यवाद ज्ञापन चौथी जाति का आदमी करता था.
अमूमन हर सभा में सात से आठ जातियों के वक्ता होते थे. मुसलमान जरूर होते थे. किस जाति की कितनी संख्या है, ये जरूरी बात नहीं होती थी. सबको जोड़ने का ख्याल होता था.
हर सभा में कम से कम 12 से 15 जातियों के हाथ में माइक होती थी. आज की तरह एक नेता का भाषण नहीं होता था.
कहां गए वो लोग?
दस साल में देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी खड़ी कर देना कोई मजाक नहीं है! उसके लिए एक दृष्टि चाहिए जो मान्यवर में थी.
उसके बाद को अब फिसलन भरी ढलान पर यात्रा चल रही है.
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