जूलरी के फेर में न पड़नेवाली स्त्रियां डबल कोटेड आजाद नागरिक लगती हैं
विनीत कुमार के फेसबुक टाइमलाइन से साभार
जो स्त्रियां अपने को जूलरी ( जेवर- जठिया ) से मुक्त कर लेती हैं, वो ज्यादा खुश, बिंदास और समृद्ध नज़र आती हैं. वो दुनियाभर के अपने शौक ज्यादा ढंग से पूरी कर पाती हैं.
ये बात मैं अपने आसपास की दुनिया के अनुभव पर कह रहा हूं. मैं दोनों तरह की स्त्रियों को करीब से देखता आया हूं.
एक जिसके हाथ में हजार रूपये भी आए तो सोने की इयर रिंग खरीदने का विचार जन्म ले लेता है और साल-छह महीने में लेकर दम मारती है. इस बीच वो बचत और छोटे-छोटे शौक से अपने को अलग कर लेती है, अपना मन मारती हैं. खरीद लेने पर फिर से इस चक्र में शामिल हो जाती हैं. अक्सर संबंधों और लोगों की हैसियत का आकलन इसी आधार पर करती हैं.
दूसरी जिसके हाथ में दस हजार भी आ जाय तो पहले अच्छे से दबाकर पसंद की चीजें खाती हैं. खुद को फोटो फ्रेम, कॉफी मग या बुक्स गिफ्ट करती हैं. उसके बाद एक अच्छी सी ड्रेस और चुंबक, बेस्ट साइड, फैब इंडिया या फिर पटरी से ही सही, इयर रिंग. उसके बाद एक अच्छी सी बेडशीट या सास-मां-पिता के लिए कोई चिज्जी. दो-ढाई बचा लेने पर वो बचत और किफायत में जीनेवाली स्त्री फील करके खुश हो जाती है.
मुझे जूलरी के फेर में न पड़नेवाली स्त्रियां डबल कोटेड आजाद नागरिक लगती हैं.
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