नीतीश सरकार में क्या होगी कांग्रेस की भूमिका?
नीतीश को अच्छे से मालूम था कि अगर चुनाव बाद आरजेडी की सीटें जेडीयू से ज्यादा हुईं तो भुजंग के बीच चंदन बने रहना संभव न होगा. नीतीश ने अपने लिए डबल बेनिफिट कदम उठाया था.
मृगांक शेखर
तब जनता परिवार आखिरी सांसें गिन रहा था. महागठबंधन का अभी जन्म नहीं हुआ था. लालू प्रसाद और नीतीश कुमार एक दूसरे का हाथ तो पकड़े हुए थे, लेकिन दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े थे. महागठबंधन के नेता पर मामला अटका था. नेता का मतलब मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार. लालू कह रहे थे कि इस पर चुनाव बाद फैसला हो. नीतीश उस पर तत्काल घोषणा चाह रहे थे. मौका देख कर लालू ने जीतन राम मांझी को भी साथ लेने की चर्चा छेड़ दी. मांझी, नीतीश की जगह खुद के लिए मुख्यमंत्री पद मांगने लगे. नीतीश को ए बात जमी नहीं. हजम होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.
नीतीश ने मुलायम सिंह से मिलकर इस पर आपत्ति जताई. मुलायम ने उन्हें भरोसा दिलाया लेकिन नीतीश का मन नहीं भरा. नीतीश, राहुल गांधी से मिलने चले गए. ए बात मुलायम को भी हजम नहीं हुई – और महागठबंधन छोड़ने के उनके फैसले का बाकी बातों के अलावा यही मजबूत आधार भी बना.माना गया कि राहुल गांधी के दबाव में ही लालू ने नीतीश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने को मंजूरी दी. नीतीश के नाम की घोषणा भी इसीलिए मुलायम ने ही की. लालू तो बस जहर पीने की बात कर के रह गए.
सीटों के बंटवारे का वक्त आया. नीतीश ने महागठबंधन में कांग्रेस को 40 सीटें दिलवाईं – और जब एनसीपी ने इंकार कर दिया तो कांग्रेस को एक और सीट देकर उसे 41 करा दिया. तो क्या नीतीश ने इस तरह सिर्फ राहुल गांधी के अहसानों का बदला चुकाया था? या इसमें भी कोई चाणक्य चाल या दूरदृष्टि जैसी बात रही? नीतीश को अच्छे से मालूम था कि अगर चुनाव बाद आरजेडी की सीटें जेडीयू से ज्यादा हुईं तो भुजंग के बीच चंदन बने रहना संभव न होगा. नीतीश ने अपने लिए डबल बेनिफिट कदम उठाया था. कांग्रेस के अहसानों का बदला भी, और भविष्य के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम भी. बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी और नीतीश के काफी करीबी रिश्ते हैं. कांग्रेस के नीतीश के करीब आने में भी कहीं न कहीं उनकी बड़ी भूमिका रही. विधानसभा चुनाव में नीतीश के पास 71 सीटें हैं, जबकि लालू के पास 80 सीटें हैं. ऐसे में 27 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की भूमिका बढ़Þ जाती है. अब कांग्रेस ही नीतीश सरकार में बैलेंसिंग फैक्टर की भूमिका निभाएगी. जो कांग्रेस चुनाव से पहले लालू की जगह नीतीश को तरजीह दे रही थी वो अब भला लालू का सपोर्ट क्यों करेगी? और कुछ ऊंच-नीच हुआ और लालू ने दबाव बनाने की कोशिश की तो नीतीश, कांग्रेस का नंबर जोड़ कर बीस तो पड़ेंगे ही. नीतीश को चाणक्य यूं ही नहीं कहा जाता!
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