जानिए दुनिया के सबसे बड़े बिहार के सोनपुर मेले के शुरू होने की कहानी
महीना भर चलता है विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला
मनोज पाठक.पटना.
बिहार में गंगा और गंडक नदी के संगम पर ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक महत्व वाला सोनपुर मेला एक महीना चलता है। विश्व प्रसिद्ध यह मेला शनिवार से शुरू हुआ। इस मेले को ‘हरिहर क्षेत्र मेला’ अैर ‘छत्तर मेला’ के नाम से भी जाना जाता है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले शुरू होने वाले इस मेले में लाखों देसी और विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं। यह मेला आज एशिया के सबसे बड़े पशु मेले के रूप में विख्यात है। यहां पूर्व में बाजार हुआ करता था। सोनपुर मेले की शुरुआत कब से हुई इसकी कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि पूर्व में यहां पशु बाजार लगता था। सारण और वैशाली जिले की सीमा पर लगने वाले इस मेले की प्रसिद्धि यूं तो सबसे बड़े पशु मेले की है, मगर इस मेले में आमतौर पर सभी प्रकार के सामान मिलते हैं। मेले में जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए पहुंचते हैं, वहीं विदेशी सैलानी भी यहां खिंचे चले आते हैं। हाजीपुर आऱ एऩ कॉलेज में प्रोफेसर रहे श्याम नारायण चौधरी कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में हथुआ, बेतिया, टेकारी तथा दरभंगा महाराज की तरफ से सोनपुर मेला के अंग्रेजी बाजार में नुमाइशें लगाई जाती थीं। नुमाइशों में कश्मीर, अफगानिस्तान, ईरान, मैनचेस्टर से बने बेशकीमती कपड़े एवं अन्य बहुमूल्य सामग्रियों की खरीद-बिक्री होती थी। इन बहुमूल्य सामग्रियों में सोने, चांदी, हीरों और हाथी के दांत की बनी वस्तुएं तथा दुर्लभ पशु-पक्षी का बाजार लगता था। वह बताते हैं कि इस दौरान ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रतीक के रूप में हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला एक बड़े पशु बाजार के रूप में उभरा, जिसकी चर्चा महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ में भी की है। इस मेले के इतिहास के विषय में यह भी कहा जाता है कि इस मेले में चंद्रगुप्त मौर्य सेना के लिए हाथी खरीदने के लिए यहां आते थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भी सोनपुर मेला क्रांतिकारियों के लिए पशुओं की खरीदारी के उद्देश्य से पहली पसंद रहा।

अब मेले में बार बालाओं के डांस से जमता है रंग
इस मेले को लेकर एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान के दो भक्त हाथी (गज) और मगरमच्छ (ग्राह) के रूप में धरती पर उत्पन्न हुए। कोणाहारा घाट पर जब गज पानी पीने आया तो उसे ग्राह ने मुंह में जकड़ लिया और दोनों में युद्ध शुरू हो गया। कई दिनों तक युद्ध चलता रहा। इस बीच गज जब कमजोर पड़ने लगा तो उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुदर्शन चक्र चलाकर दोनों के युद्ध को खत्म कराया। इसी स्थान पर दो जानवरों का युद्ध हुआ था, इस कारण यहां पशु की खरीददारी को शुभ माना जाता है। इसी स्थान पर हरि (विष्णु) और हर (शिव) का हरिहर मंदिर भी है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों भक्त श्रद्धा से पहुंचते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान राम ने सीता स्वयंवर में जाते समय किया था।
हरिहरनाथ मंदिर के पुजारी सुनीलचंद्र शास्त्री बताते हैं कि प्राचीन काल में हिंदू धर्म के दो संप्रदायों शैव एवं वैष्णवों में अक्सर विवाद हुआ करता था, जिससे समाज में संघर्ष एवं तनाव की स्थिति बनी रहती थी। कालांतर में दोनों संप्रदाय के प्रबुद्ध जनों के प्रयास से इस स्थल पर एक सम्मेलन आयोजित कर दोनों संप्रदायों में समझौता कराया गया, जिसके परिणामस्वरूप हरि विष्णु एवं हर शंकर की संयुक्त स्थापना हुई, जिसे हरिहर क्षेत्र कहा गया। इस मेले में हाथी, घोड़े, ऊंट, कुत्ते, बिल्लियां और विभिन्न प्रकार के पक्षी सहित कई पशु-पक्षियों का बाजार सजता है, लेकिन यह मेला केवल पशुओं का कारोबार का बाजार नहीं, बल्कि परंपरा और आस्था दोनों का मिलाजुला स्वरूप है। इस मेले में नौटंकी, पारंपरिक संगीत, नाटक, मैजिक शो, सर्कस जैसी चीजें भी लोगों के मनोरंजन के लिए होती हैं। with thanks from आईएएनएस
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