झकझोर देने वाली एक बलात्कार पीड़िता की आत्मकथा. . .

निर्भया कांड में सुप्रीम कोर्ट पर फैसले के बहाने नवभारत टाइम्स के ब्लॉग सेक्शन में निरेंद्र नागर की प्रकाशित एक दुष्कर्म पीड़िता का दर्द ज्यो का त्यो साभार…. 

रेप और उसके बाद… रोज़ जीना, रोज़ मरना!

May 29, 2015, 11:21 am IST नीरेंद्र नागर in एकला चलो | सोसाइटी

शुरुआत में ही बता दूं कि यह ब्लॉग भले ही मेरे नाम से जा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि यह ब्लॉग मेरा नहीं है। इसमें लिखा गया एक-एक शब्द किसी और का कहा हुआ है और हर शब्द से उभरती व्यथा किसी और की झेली हुई है। जिस समय उसने यह सब जिया, तब और उसके बाद के महीनों में भी उसके साथ कोई नहीं था। सबकुछ उसने अकेले झेला। वह अपने माता-पिता को भी इस गम में शरीक नहीं कर पाई क्योंकि उसे डर था कि वे शायद अपनी लाड़ली बेटी के साथ हुए इस हादसे का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। और जिस पर उसे भरोसा था, पूरा भरोसा था, वह – उसका प्रेमी जो उसका मंगेतर भी था – वह इस घटना के बाद अचानक इंसान से शैतान बन गया। आइए, गुज़रते हैं एक निजी अनुभव से – एक कालरात्रि से – निर्भया के साथ जो हुआ, उससे ठीक एक साल पहले वैसा ही कुछ हुआ था अनामिका के साथ। जगह वही – दिल्ली। महीना भी वही – दिसंबर।

दिसंबर की वह रात, वीरान-सा खाली पड़ा मैदान, और नीचे चुभती घास और भी न जाने क्या-क्या। नीचे जो चुभ रहा था, उसकी तकलीफ़ उतनी ज्यादा नहीं थी जितनी उसकी जो उसके शरीर पर चुभ रहा था। 5 फुट 5 इंच की लंबाई वाला उसका अपना शरीर भी इतना ही बड़ा लग रहा था जितना बड़ा वह मैदान। आम तौर पर एक शरीर में इतनी ही जगह होती है जितनी कि एक दूसरे शरीर के लिए काफी हो। लेकिन उन तीनों को उसी शरीर में खुद के लिए कैसे इतनी जगह एकसाथ मिल गई थी, इसी बात की हैरानी होती है। अगर किसी लड़की की रज़ामंदी के बगैर कोई उसे छुए, तब उसे कितनी खीझ होती है, इसका अंदाज़ा  लड़कियां तो लगा सकती हैं मगर पुरुष शायद नहीं लगा सकें। और अगर कोई किसी लड़की के बार-बार मना करने के बावज़ूद, उसकी ना को बिना कोई तवज़्जो दिए, बस अपनी इच्छा और मतलब के मुताबिक उसके शरीर का इस्तेमाल करे, तब उसकी खीझ और पीड़ा किस कदर बढ़ जाती होगी, ज़रा कल्पना करके देखिए।

उस रात से पहले उसने हालांकि इस स्थिति की कल्पना कभी नहीं की थी। कम-से-कम अपने-आपके ऐसी हालत में होने की कल्पना तो उसने कभी नहीं की थी। करता भी कौन है? किसको पता होता है कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी जीते हुए एक दिन कुछ ऐसा होगा कि उसकी आने वाली तमाम ज़िंदगी पर उसका असर बना रहेगा। रोज़ की तरह घर से दफ़्तर जाना, हंसना-बोलना-खाना सब रोज की तरह और रात होने पर अपने वक्त से रोज़ की तरह घर लौट आना… यही उसकी आम ज़िंदगी थी। उस दिन बाकी सब अपने ढंग से हो गया था, बाकी था बस घर लौट आना। लेकिन वही नहीं हो सका। बस से उतरी, कि तभी उसकी एक दोस्त का फोन आया। फोन पर बात करते हुए उसने अपने आसपास के अंधेरे को एक बार भी शक की नज़र से नहीं देखा। पता ही नहीं था उसको कि रोज़ के उस रास्ते पर अभी 5 मिनट बाद वह उन तीन लोगों के साथ होगी जिन्हें उसने अब से पहले कभी-कहीं नहीं देखा। सोचने का मौका ही नहीं दिया उन तीनों ने उसको। पीछे से अचानक एक जोड़ी हाथ आए। एक हाथ उसके मुंह पर और दूसरा घूमकर उसकी कमर के चारों तरफ, किसी दूसरे हाथ ने उसका फोन छीना और किसी तीसरे हाथ ने उसके कंधे पर पड़ा काला बैग। सड़क के इस हिस्से से घसीटते हुए सड़क के उस कोने तक लेकर गए उसको, और दीवार के उस पार फैले मैदान पर उसको भी पटककर फैला दिया। उसको तब भी कुछ समझ नहीं आया था। घिसटते वक्त दूर खड़े जिस ऑमलेट वाले को वह साफ-साफ देख पा रही थी, उसने उसे किस तरह नहीं देखा, यह आज भी उसकी समझ में नहीं आता। उसके बाद पता नहीं कितने घंटे – शायद ढाई या तीन, वे चारों वहीं थे। तीन अपनी मर्ज़ी से अपनी पसंद का काम करते हुए। एक ज़बरदस्ती और अपनी सबसे नापसंदगी का काम झेलती हुई। उन तीन के लिए वह रात शायद उनकी ज़िंदगी की सबसे यादगार और खूबसूरत रात थी, और उसके लिए वह उसकी ज़िंदगी की सबसे डरावनी-सबसे भद्दी रात थी। उस रात को याद करके शायद अब भी वे तीनों एक अजीब-सी सनसनाहट और रोमांच महसूस करते होंगे। वहीं उस रात को याद कर उसको आज भी वही घुटन, वही घबराहट और वही घृणा महसूस होती है।

अपने कपड़े उसने नहीं उतारे थे। याद नहीं कि कब, लेकिन उस मैदान में फेंके जाने के कुछ मिनटों के भीतर ही उसके कपड़े शरीर से उतरकर एक तरफ लावारिस से पड़े थे। उस सर्द रात में उन तीनों के सामने उसकी नुमाइश लगी थी। जिस शरीर को नहाते समय भी उसने खुद इतने गौर से नहीं  देखा था, वही शरीर उन तीनों के सामने नंगा पड़ा था। जो हाथ आज तक उसकी मर्ज़ी से काम करते आए थे, वही हाथ अपनी मर्ज़ी से खुद को उन तीनों से नहीं छुड़ा पाए। पैर दौड़कर दूर भाग जाना चाहते थे, लेकिन वहीं ठिठके खड़े रहे। जिस ज़ुबान से आज तक अपनी मर्ज़ी से खूब बकबक करती आई थी, वही ज़ुबान चुप थी। रो रही थी वह। खुद को ऐसे नंगा कर दिए जाने से शर्म आ रही थी उसको। लेकिन उसके सामने जो तीन चेहरे थे, उनको ऐसा लग रहा था कि मुफ़्त में एकाएक खज़ाना हाथ आ गया हो। जितना भोगना था, उसी रात को भोग लेना था। एकसाथ तीन लोग उसके साथ सेक्स जैसा कुछ कर रहे थे। एक ही साथ तीनों को उसके साथ सबकुछ करना था। कोई ऊपर, कोई नीचे कुछ करता हुआ। एक ही शरीर में कोई यहां, कोई वहां तो कोई कहीं और कुछ टटोलता हुआ। मारते-पीटते और बेहूदगी से सेक्स करते हुए उन्होंने शायद अपनी कोई बरसों पुरानी ख़्वाहिश पूरी कर ली थी। जब गए तो उसकी जैकेट साथ लेते गए। जाते-जाते, जैकेट के नीचे जो गुलाबी और हल्के बैंगनी रंग की टी-शर्ट उसने पहनी हुई थी, उसको भी फाड़ते गए।

उन तीनों के जाने के बाद पता नहीं कितनी देर तक, शायद रात के तीन बजे तक, वह वहीं रही। घर कैसे जाती? कुछ पहनने को तो था ही नहीं उसके पास। घर लौटने के लिए इंतज़ार किया उसने कि सड़क पर कोई न बचे, बाहर निकला हर आख़िरी इंसान भी घर के अंदर चला जाए तब लौट जाएगी घर। आख़िर में, अपने उस काले बैग को सामने की ओर रखकर घर लौट आई। लौटते समय कोई नहीं टकराया उससे। अगर टकराता तो क्या पता, उस एक रात में एक बार फिर उसका बलात्कार करता हुआ जाता। और इस बार तो गलती भी उसकी ही होती। इतनी देर रात सड़क पर अधनंगी चलती दिखेगी तो बलात्कार तो होगा ही ना।

अगर फिल्मों में बलात्कार के बाद आप लड़की को लंगड़ाते चलते देखकर सोचते हैं कि ओवर-ऐक्टिंग हो रही है, तो यकीन मानिए कि आपको उस रात उसे चलते हुए देखना चाहिए था। एक-एक कदम इतनी मुश्किल से घसीटकर, पता नहीं कैसे खुद को एक टुकड़े में जोड़ कर चल पा रही थी। कभी अपनी कलाई खुद मरोड़कर देखिएगा। और फिर महसूस कीजिएगा कि पूरे तीन घंटे तक जिसको हर जगह से मरोड़ा गया हो, बार-बार और लगातार मारा-पटका गया हो, अनहद दर्द होते हुए भी चीखने तक की इजाज़त न दी गई हो और एक ही साथ पूरे शरीर पर रेंगते हुए तीन हैवानों का बोझ बर्दाश्त करवाया गया हो उसको, उस रात कैसा लग रहा होगा। सोचिएगा एक बार कि उसको कैसा लगा होगा तब।

घर पर कोई नहीं था। अकेली रहती थी वह। उस दिन के बाद का तीन महीने का वक्त कैसे बीता, इसका कोई हिसाब नहीं है। कोई ऐसा भी नहीं था जिससे बिना झिझके बात कर सके। अपनी हर तकलीफ़ को खुद ही सहा उसने। क्या किया और कैसे किया, इसका हिसाब भी बस उसके ही पास है। उसने अपनी उल्टी खुद साफ की। कभी घंटों जगी रहती, कभी घंटों सोती रहती। जब जगी होती तब अक्सर रोती रहती थी। परंतु जो हुआ वह यदि बुरा था तो बहुत बुरा होना अभी बाकी था।

करीब तीन महीने बाद उसको एहसास हुआ कि वह पीरियड्स मिस कर रही है। अकेली एक केमिस्ट की दुकान पर जाकर प्रेगनैंसी टेस्ट किट लेकर आई। घर आकर बहुत देर तक हाथ में उस किट को लेकर बैठी रही। टेस्ट करते वक्त उसको जितना डर लग रहा था, उतना शायद उस रात भी नहीं लगा था जिस रात की वज़ह से टेस्ट करने की नौबत आई थी। टेस्ट पॉजिटिव हुआ तो क्या करूंगी, इस सवाल को दिमाग में आने से रोक नहीं सकती थी और जो जवाब दिमाग दे रहा था, उसको बर्दाश्त भी नहीं कर पा रही थी।

शायद आप और मैं कभी अंदाजा भी न लगा सकें कि उस दिन उस टेस्ट स्ट्रिप के पॉजिटिव निशान ने उसको कितने अंदर तक मारा था। आज भी पता नहीं क्यों वह टेस्ट किट उसने इतने जतन से संभाल कर रखी है! प्रेंगनेंट थी वह। तीन महीने पहले की उस रात ने एक बच्चा छोड़ा था उसके अंदर। इतने दिनों तक की उसकी हर तकलीफ़ अनजाने में उस बच्चे ने भी बांटी थी। उसकी भूख-प्यास, आंसू-शून्य, नींद-दर्द… हर एक चीज को अनचाहे ही उस बच्चे ने भी झेला था। उस वक्त से पूरे एक दिन तक एक बार भी नहीं रोई वह। रोने का मन ही नहीं किया उसका। बल्कि खुश थी वह। अजीब-सी, एक बेमतलब सी खुशी थी। ऐसे जैसे कि कलेजे में बहुत अंदर तक एक ठंडे पानी का घूंट उतर गया हो और जलता हुआ सबकुछ एकाएक शांत होकर बुझ गया हो। उसके अंदर उसका अपना बच्चा था। लेकिन क्या सच में उसका ही बच्चा था? बच्चा बेशक उसके अंदर था, लेकिन क्या सच में उस बच्चे का एक कतरा भी उसका अपना था? क्या उस बच्चे को हक़ था इस दुनिया में आने का? या फिर ऐसे समझें कि क्या उन तीनों को कोई हक़ था उस बच्चे को इस दुनिया में लाने का। ऐसे तमाम सवाल थे जिसके जवाब के लिए अभी उसको खुद से अनगिनत बार लड़ना बाकी था। फिलहाल तो सोचना यही था कि आगे क्या होगा।

अनामिका को मैं लंबे समय से जानता हूं हालांकि जब घटना घटी, तब उसने मुझे भी नहीं बताया था। बहुत बाद में बताया। और जिस शाम उसने मुझे बताया, उस शाम मेरी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। अब भी जब-जब उस रात का सीन आंखों के सामने तैर जाता है तो आंखें छलक आती हैं। ऐसी फूल-सी बच्ची के साथ ऐसी ज्यादती। मैं जानता हूं कि अपने साथ हुए रेप से ज्यादा दुख उसे इस बात का है कि उसे एक बच्चे की हत्या करने का फैसला करना पड़ा। वह लड़की जो कभी पेड़ से एक फूल तक नहीं तोड़ती, उसने किन हालात में एक जीवन को मारने का फैसला किया होगा, यह मैं समझ सकता हूं।

अस्पताल में जब गायनेकलॉजिस्ट के पास गई तो एंट्री फॉर्म पर मजबूरन खुद के शादीशुदा होने की बात लिखी उसने। डॉक्टर ने पूछा कि अबॉर्शन क्यों करवाना चाहती हो। ऐसे जैसे कि प्रारब्ध खुद उससे आगे की नियति बुलवा रहा हो, उसने झूठ ही कहा कि मेरे पति इस वक्त बच्चे के लिए तैयार नहीं हैं। डॉक्टर ने पूछा कि पति कहां हैं, साथ क्यों नहीं आए, तो उसने कहा कि वह बाहर गए हैं। डॉक्टर ने पूछा कि एडमिट होना चाहती हो या फिर दवा लोगी। उसने जानना चाहा कि दोनों में फ़र्क क्या है। डॉक्टर ने बताया कि एडमिट होने पर एक पंप जैसी मशीन से बच्चे को वैक्यूम बनाकर खींच लिया जाएगा, और दवा लेने पर बच्चा खुद ही गलकर निकल जाएगा।

उस बच्चे को ख़त्म करने के लिए दिए गए इन दोनों तरीकों में से कैसे एक तरीका उसने चुना और अपनी रज़ामंदी दी, इसका अंदाजा तक लगा पाना मेरे लिए नामुमकिन है। नामुमकिन तो मेरे लिए यह सोचना भी है कि वह वहां गई कैसे और ये सारी बातें भी किस तरह कर सकी। उसकी तकलीफ़ की बराबरी कर सके, ऐसा कोई शब्द मेरे पास नहीं है। खैर, उसने दवा के तरीके के लिए हामी भरी। डॉक्टर ने कहा कि अगर दवा से पूरी तरह साफ नहीं हुआ तो हमें आपको एडमिट करना होगा। इसके बाद डॉक्टर ने बिस्तर पर लिटाकर उसको जो दिखाया, उसे शायद वह कभी भूल नहीं सकेगी। सामने एक कंप्यूटर की स्क्रीन पर काले-नीले धब्बे जैसी, झिलमिलाती हुई एक आकृति उभरी। उसका बच्चा। उसके अंदर चैन से लेटा बच्चा स्क्रीन पर तैर-सा रहा था। बच्चे के सीने से आ रही धक-धक की आवाज से जैसे उसके सीने की आवाज रुक गई। वह लम्हा एक पूरा फ्रेम बनकर हमेशा-हमेशा के लिए उसकी याद्दाश्त में छप गया। हमेशा-हमेशा के लिए उसको कोंचने को तैयार वह धड़कन उसकी हर रग में-हर नस में-हर कोने में ठहरकर बैठ गई। डॉक्टर ने कहा कि बच्चे में धड़कन आ चुकी है। बड़े इत्मीनान से डॉक्टर बताती रही कैसे उस बच्चे की पलकें तैयार हो रही हैं। डॉक्टर को नहीं पता था कि उसके बताने का असर यह होगा कि आने वाली तमाम ज़िंदगी में एक जोड़ी अनदेखी, मगर सगी पलकों का बोझ उसके पूरे वज़ूद को सालता रहेगा। उसको हमेशा लगेगा कि एक जोड़ी भीगी पलकें उसपर झुककर पथरा गई हैं। कि भले उसका खुद का ज़िंदा दिल रुक जाए, लेकिन उस धड़कन की धक-धक तमाम उम्र  धौंकनी की तरह चलती रहेगी।

बाहर काउंटर से सफेद लिफाफे में चार गोलियां मिलीं। डॉक्टर ने कहा था कि एक गोली शाम को खाकर, बाकी की तीन गोलियां 24 घंटे बाद खानी हैं। डॉक्टर ने कहा था कि दर्द होगा, और इसलिए एक पेनकिलर का नाम भी लिखकर दिया था जिसे बाहर केमिस्ट की दुकान से खरीदना था। जाने क्या सोचकर उसने पेनकिलर नहीं खरीदा। बहुत देर तक उस शाम वह रोती रही। बहुत देर तक इस उम्मीद में उस अजन्मे बच्चे से बात करती रही कि वह सुन रहा होगा। पता नहीं क्या-क्या कहकर माफी मांगती रही। शाम को दवा खाई और थोड़ी देर में पीरियड्स शुरू हो गए। और 24 घंटे बाद बाकी की तीन गोलियां खाकर बिस्तर पर लेट गई। बच्चा पैदा करने में कितना दर्द होता है यह तो नहीं पता, लेकिन बच्चे को इस तरह मारने में बहुत तकलीफ़ होती है। बच्चा जैसे-जैसे आपके अंदर ज़िंदा से मुर्दा होता जाता है, मौत की उतनी ही तकलीफ़ आपको देता जाता है। लोथड़ों में कटकर उसका शरीर मांस की गीली लाल चिंदियों की शक्ल में जब उसी रास्ते बाहर निकलता है जिस रास्ते उसको जन्म लेना होता है, तब होने वाले दर्द की कल्पना वही कर सकता है जिसने इसे महसूस किया होगा। पूरी रात इतनी असहनीय पीड़ा हो रही थी उसे लग रहा था अब मर जाए तो बेहतर है। अगले एक सेकंड तक जीना भी नामुमकिन लग रहा था। और आज, इस दर्द-इस तकलीफ़ में कोई नहीं था उसके साथ। बच्चा जा चुका था। मर चुका था।

ज़िंदगी के गणित का यही नियम है कि उसका कोई गणित नहीं होता। सवाल खुद ही बनते रहते हैं, और जवाब भी खुद ही मिल जाते हैं। जिन सवालों का कभी जवाब नहीं मिलता, उसी को असल में हमेशा-से-हमेशा-तक का दर्द कहते हैं।

आपमें से कुछ पाठक शायद सोच रहे होंगे कि मैं यह सब आज क्यों लिख रहा हूं? करीब साढ़े तीन साल पहले की यह घटना जिसमें न कोई मेडिकल सबूत है, न कोई गवाह, न ही गुनहगारों की कोई पहचान, आज उसे बताकर क्या होगा? मैं यह सब इसलिए बता रहा हूं कि कुछ लोग रेप को बहुत ही मसालेदार विषय समझते हैं। वे रेप की खबरें पढ़ते समय कल्पना में ही एक हिंसक सेक्स कृत्य का दृश्य तैयार कर लेते हैं और फिर मन ही मन उसका आनंद लेते हैं। मैं यह भी जानता हूं कि कुछ पाठक, कम ही सही, ऐसे भी हैं जो हर रेप की खबर पढ़ने के बाद बहुत-बहुत उदास हो जाते हैं। इन दोनों ही तरह के पाठकों के साथ शेयर करना चाहता था अनामिका का वह अनुभव। मुझे यकीन है कि आप यदि भावुकहृदय होंगे तो अनामिका के इस अनुभव ने आपको अंदर तक भिगो दिया होगा। लेकिन यदि आप उन पाठकों में है जिन्हें रेप की खबरों को पढ़कर आनंद आता है तो मेरी बस यही इल्तज़ा है कि आप इस वाकये – और रेप के हर वाकये – में पीड़िता की जगह पर अपने परिवार की किसी सदस्या को एक पल के लिए रख लीजिएगा। शायद तब आप उसके भोगे को महसूस कर सकें।

अनामिका उसका असली नाम नहीं है, यह आप जान ही गए होंगे। कानूनी तौर पर नाम बताना अपराध है और नाम बताने या न बताने से भी कुछ बदलेगा नहीं। बिना नाम लिए भी यह सबकुछ उतना ही सच और ईमानदार रहेगा जितना कि असल में है।

जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कह दिया था, इस ब्लॉग का एक-एक शब्द उसका है,  भोगी गई पीड़ा भी उसकी है। बस पन्ना मेरा है। उसकी तकलीफ़ों की बराबरी कर सके, ऐसा शब्द न मुझे मिला, और न ही वह खुद बता सकी। आज यह ब्लॉग लिखने का मकसद यही है कि आप सब जान सकें कि बलात्कार सिर्फ बलात्कार पर खत्म नहीं हो जाता है। एक बलात्कार किसी की पूरी ज़िंदगी स्याह बना सकता है। कुछ लड़कियां भूलकर आगे बढ़ जाती हैं, और कुछ अपने वज़ूद का सबसे कीमती हिस्सा हमेशा-हमेशा के लिए उस लम्हे से मिले दर्द के नाम सौंप आती हैं। ऐसी लड़कियां, अनामिका जैसी लड़कियां, कभी आगे नहीं बढ़ पातीं। आप शायद ऐसे एकाएक देखकर न जान सकें, लेकिन असल में वे अपनी ज़िंदगी फिर से कभी नहीं सुलझा पातीं।

मैं जानता हूं कि कैसे अनामिका हर दिन किसी-न-किसी बहाने उस बच्चे की मौत के लिए वह खुद को कोसती है। दिन-महीने-साल जोड़कर सोचती है कि अगर वह होता तो कैसा होता, क्या करता। किसी को प्रेगनेंट देखती है और देखती है कि उसके परिवार वाले उसका ख़्याल रख रहे हैं, तो खीझती है। सोचती है कि क्यों उसकी किसी ने देखभाल नहीं की। वह आज भी वहीं, कैलेंडर की उन पुरानी तारीखों से लड़ रही है। साल-दर-साल दुनिया के लिए कैलेंडर की तारीखें बदल रही हैं, लेकिन उसका वक्त वहीं कहीं पीछे अटका हुआ है। उस बलात्कार के बाद उसने न केवल अपना सुकून खोया, बल्कि अपने कई कीमती रिश्ते भी खोए। सबकुछ ईमानदारी से बता दिया इसलिए 8 साल लंबा रिश्ता भी बस यूं ही ख़त्म हो गया। जिससे प्यार करती थी, उसने न केवल उसको छोड़ दिया, बल्कि यह कहकर छोड़ा कि तेरे साथ जो भी हुआ वह इसलिए हुआ कि तू उसी के लायक थी। यह भी कहा कि, ‘तुझे छूते हुए भी घिन आएगी मुझे।’ ये शब्द आज भी उसको साल रहे हैं। एक घाव है उसके अंदर जो खुरच-खुरच कर खुद ही हरा-भरा बना रहता है। शायद वह घाव ही इकलौती चीज है उसके अंदर जो ज़िंदा है, और ज़िंदा रहेगी। तीन साल बीत गए उस हादसे को, लेकिन आज भी उसके आंसू उतने ही ताज़ा हैं। दिसंबर की वह रात कभी उसका पीछा नहीं छोड़ती।

 डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं
with thanks from http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/ekla-chalo/%E0%A4%95-%E0%A4%AF-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%95-%E0%A4%AD-%E0%A4%AE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%B9-%E0%A4%B0-%E0%A4%AA-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8-%E0%A4%95/





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