बिहार में एक मुट्ठी चावल से जिंदगी संवार रहीं महिलायें

मुरली दीक्षित. जमुई. रोज परिवार के लिए भात बनाने से पहले एक मुट्ठी चावल निकालकर गुगुलडीह गांव की दर्जन भर महिलाओं ने बेहतर मैनेजमेंट की बदौलत सफलता की कहानी लिख डाली। इस प्रयास से महिलाओं को कर्ज से मुक्ति मिली है। कई महिलाएं खुद का रोजगार कर स्वावलंबन की राह पकड़ चुकी हैं। जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर स्थित बरहट प्रखंड के गुगुलडीह गांव में सामाजिक कुरीतियों व गरीबी के कारण महिलाओं की स्थिति बदतर थी। घर-गृहस्थी से लेकर बिटिया की शादी तक के लिए ज्यादातर ग्रामीण महाजनों के दुष्चक्र में फंसे हुए थे। 2001 में महिलाओं ने दांगी महिला विकास स्वयं सहायता समूह का गठन किया। शुरुआत इन्होंने समूह से जुड़ीं महिलाओं से एक-एक मुट्ठी चावल जमा करने से की। जो महिलाएं एक मुट्ठी चावल नहीं दे पाती थीं, उनसे एक रुपया लिया जाता था। इन्हीं संसाधनों की बदौलत महिलाओं ने बैंक में खाता खुलवाया। जमा किए गए पैसों को धान कूटने के काम में लगाकर महिलाओं ने लाभ हासिल किया। बाद में इन्हीं पैसों से समूह के सदस्यों को ऋण देना शुरू किया गया। अभी समूह के पास 14 लाख 93 हजार 391 रुपये की जमा पूंजी है। इनमें से 10 लाख चार हजार रुपये समूह की महिलाओं को रोजगार के लिए बतौर ऋण दिए गए। समूह की अध्यक्ष सुदामा देवी ने बताया कि एक संस्था से प्रेरणा लेकर उन्होंने इस काम की शुरुआत की। स्वर्णजयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना से भी उन्हें लाभ मिला। समूह का प्रचार-प्रसार हुआ। समूह से ऋण लेकर सुशीला देवी धान फेरी का रोजगार करती हैं। अब इन्हें महाजनों के पास हाथ नहीं फैलाना पड़ता है। 11 सदस्यीय समूह में तकरीबन सभी महिलाएं रोजगार कर स्वावलंबी बन गई हैं।
केस स्टडी एक
समूह की अध्यक्ष सुदामा देवी किराने की दुकान चला रहीं हैं। समूह में जमा पूंजी से उन्होंने ऋण लेकर दुकान खोली है। कमाई के पैसों से वह नियत समय पर कर्ज का पैसा लौटा रही हैं। साथ ही अब कर्ज के लिए उन्हें हाथ नहीं फैलाना पड़ता है। इस कार्य में उन्हें घर के पुरुष सदस्यों का भी सहयोग मिल रहा है।
केस स्टडी दो
समूह से जुड़ी प्रमिला देवी ने खेती के साथ पशुपालन का काम शुरू कर लिया है। एक साथ दोनों काम फायदेमंद साबित हुए हैं। अब वे स्वावलंबी बन गई हैं। घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए इन्हें महाजनों के पास नहीं जाना होता है।
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