Indian History

 
 

इसी नेता की रिपोर्ट से देश की राजनीति के स्टेयरिंग ने लिया मोड

बीपी मंडल  की सौंवी जयंती पर उनके बारे में जानिए पुष्य मित्र आज बिहार के एक बड़े समाजवादी नेता बीपी मंडल की जन्मशती है। वे एक ऐसे नेता हैं जिनकी बनाई रिपोर्ट ने बीसवीं सदी के आखिर में देश की राजनीति के स्टेयरिंग को उस दिशा में मोड़ दिया जिस दिशा से आज भी मुड़ना नामुमकिन लगता है। उन्हें हम आज भी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में कम द्वितीय पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष के रूप में अधिक जानते हैं। वह आयोग भी मंडल कमीशन के नाम से हीRead More


विशेष व्यक्तित्व अटल बिहारी बाजपेयी

प्रभुनाथ शुक्ल भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी आखिरकार काल से रार नहीं ठान पाए और 93 साल की जीवन यात्रा में गुरुवार 16 अगस्त शाम 5: 10 मिनट पर नई दिल्ली के एम्स में अंतिम सांस लिया। 11जन को उन्हें भर्ती कराया गया था। 65 दिनों तक नई दिल्ली के एम्स में जीवन और मौत से संघर्ष करते हुए लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था। राजनीति में एक ऐसी रिक्तता एंव शून्यता छोड़ चले गए जिसकी भराई भारतीय राजनीति के वर्तमान एवं इतिहास में संभवRead More


15 अगस्त की तारीख

Pushya Mitra वैसे तो बचपन से लेकर आज तक हमने कभी सोचा नहीं कि 15 अगस्त की तारीख का इसके सिवा और क्या महत्व हो सकता है कि यह हमारी आजादी की तारीख है। इस रोज हमने अंग्रेजों को भगा दिया था। देश पर अपना राज कायम हुआ था। मगर इस तारीख़ को कुछ और भी घटनाएं दुनिया में घटी थी। जैसे हमारे आजाद होने के एक साल बाद दोनों कोरिया भी इसी तारीख को आजाद हुआ और दोनों अलग अलग तरीके से इस दिन अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।Read More


कौन था सचिवालय गोली कांड का आठवां शहीद?

कौन था सचिवालय गोली कांड का आठवां शहीद? पुष्यमित्र आज अगस्त क्रांति दिवस है. 76 साल पहले आज ही भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई थी. पूरे देश की तरह बिहार भी इस आंदोलन में एक झटके में कूद पड़ा था और मजह दो दिन बाद 11 अगस्त को पटना सचिवालय में जो घटना घटी वह पूरे देश के लिए चकित कर देने वाली थी. सचिवालय पर झंडा फहराने की कोशिश में सात स्कूली छात्र एक-एक कर ब्रिटिश पुलिस की गोलियों का शिकार हो गये. अपने झंडे की शान केRead More


आपातकाल, स्मरण, संघर्ष और सबक

Jai Shankar Gupt इस 25-26 जून को आपातकाल की 43वीं बरसी मनाई जा रही है. इस साल भी पिछले 42 वर्षों की तरह आपातकाल के काले दिनों को याद करने की रस्म निभाने के साथ ही लोकतंत्र की रक्षा की कसमें खाई जा रही हैं। वाकई आपातकाल और उस अवधि में हुए दमन-उत्पीड़न और असहमति के स्वरों और शब्दों को दबाने के प्रयासों को न सिर्फ याद रखने बल्कि उनके प्रति चैकस रहने की भी जरूरत है ताकि देश और देशवासियों को दोबारा वैसे काले दिनों का सामना नहीं करनाRead More


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